आज के समय में किसी इंसान की सबसे कीमती चीज उसका पैसा नहीं, उसकी पहचान है। पासवर्ड चोरी हो जाए तो बदला जा सकता है। बैंक खाता बंद किया जा सकता है। मोबाइल नंबर बदल सकता है। लेकिन अगर किसी ने आपकी पूरी डिजिटल पहचान चुरा ली, तो वह सिर्फ आपका पैसा नहीं लेता। वह आपकी जिंदगी का एक हिस्सा अपने नाम कर लेता है। और कभी-कभी, इससे पहले कि आपको पता चले कि कोई आपके पीछे चल रहा है, आपकी स्क्रीन पर वह आखिरी शब्द आ चुका होता है— ऑनलाइन
मुंबई में उस रात बारिश कुछ ज्यादा ही तेज थी। अगस्त की उमस भरी शाम के बाद अचानक आसमान जैसे फट पड़ा था। सड़कों पर पानी भर चुका था और गाड़ियों की लाल-पीली रोशनियाँ पानी की सतह पर टूटकर लंबी लकीरों में बदल रही थीं। ऊँची इमारतों की खिड़कियों में जलती-बुझती रोशनियों के बीच शहर हमेशा की तरह जाग रहा था, लेकिन नैना को उस रात पहली बार महसूस हुआ कि इतनी बड़ी भीड़ में भी आदमी कितना अकेला हो सकता है। वह अपने फ्लैट की खिड़की के पास खड़ी बार-बार मोबाइल की स्क्रीन देख रही थी। रात के ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट हो चुके थे और उसके छोटे भाई अभिषेक का कोई पता नहीं था।
अभिषेक मुंबई की एक बड़ी फिनटेक कंपनी में साइबर प्रâॉड एनालिस्ट था। उसका काम भारत और विदेशों में होने वाले संदिग्ध डिजिटल लेन-देन की जाँच करना था। वह अक्सर मजाक में कहता था, ‘आजकल चोर जेब नहीं काटते दीदी, डेटा काटते हैं।’ नैना हँसकर जवाब देती, ‘और तुम?’ वह मुस्कराता, ‘मैं उनकी गर्दन पकड़ता हूँ।’ दोनों के बीच सात साल का अंतर था। माता-पिता के निधन के बाद यही भाई-बहन एक-दूसरे का पूरा परिवार रह गए थे। लेकिन पिछले कुछ सप्ताह से अभिषेक का व्यवहार बदल गया था। वह देर रात तक काम करता, फोन पर धीमी आवाज में बातें करता और कई बार अचानक घर से निकल जाता। नैना पूछती तो उसका वही जवाब होता, ‘ऑफिस का मामला है।’ तीन दिन पहले उसने जिद करके पूछा भी था, ‘क्या ऑफिस में कोई परेशानी है?’ अभिषेक ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर मुस्कराकर कहा था, ‘तुम बहुत सवाल पूछती हो।’ नैना ने भी हँसते हुए कहा था, ‘और तुम बहुत कुछ छिपाते हो।’ उस दिन अभिषेक ने कोई जवाब नहीं दिया था।
अब नैना ने फिर उसका नंबर मिलाया। फोन बंद था। वह मोबाइल मेज पर रखने ही वाली थी कि स्क्रीन चमकी। अभिषेक के नंबर से एक संदेश आया था—‘अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरा फोन मत देखना। उसमें जो है, वह तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।’ नैना के हाथ काँप गए। उसने तुरंत फोन किया। इस बार घंटी गई। एक, दो, तीन बार। फिर कॉल कट गई। कुछ सेकंड बाद उसी नंबर से दूसरा संदेश आया—‘सो जाओ। मैं ठीक हूँ।’ नैना ने संदेश को ध्यान से पढ़ा। उसे कुछ गलत लगा। अभिषेक उसे कभी सिर्फ ‘सो जाओ’ नहीं लिखता था। वह हमेशा ‘दीदी, सो जाओ’ लिखता था। उसने जवाब दिया, ‘तुम कहाँ हो?’ कोई उत्तर नहीं आया। उसने फिर लिखा, ‘मुझे सच बताओ।’ स्क्रीन पर कोई जवाब नहीं आया। वह पूरी रात सो नहीं सकी।
सुबह छह बजकर दस मिनट पर उसके फ्लैट की घंटी बजी। दरवाजा खोलते ही सामने दो पुलिस अधिकारी दिखाई दिए। एक अधिकारी ने पूछा, ‘आप नैना शर्मा हैं?’ उसने सिर हिलाया। अधिकारी ने कुछ क्षण उसकी ओर देखा और कहा, ‘हमें आपसे आपके भाई अभिषेक के बारे में बात करनी है।’ नैना ने कुछ नहीं पूछा। अधिकारियों के चेहरे देखकर ही उसे समझ आ गया था कि रात के संदेश झूठ थे।
अभिषेक की कार शहर के बाहरी इलाके में एक सुनसान सड़क के किनारे मिली थी। ड्राइविंग सीट का दरवाजा खुला था। कार के अंदर उसका लैपटॉप नहीं था, मोबाइल भी गायब था, लेकिन पर्स सीट के नीचे पड़ा था और उसमें लगभग पंद्रह हजार रुपये थे। उसकी कलाई पर महंगी घड़ी भी थी। पुलिस को देखकर पहली नजर में लूट का मामला नहीं लगा। सड़क से कुछ दूर अभिषेक की लाश मिली थी। नैना ने शव की पहचान की तो उसके भीतर जैसे कुछ टूट गया। पुलिस अधिकारी कबीर राठौड़ ने उसे धीरे से बताया कि मौत लगभग रात दस बजकर पचपन मिनट से ग्यारह बजकर दस मिनट के बीच हुई होगी।
नैना ने काँपती आवाज में पूछा, ‘लेकिन उसने मुझे ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर मैसेज किया था।’
कबीर ने मोबाइल की स्क्रीन देखी। ‘आपके भाई का फोन कहाँ है?’
‘उसके साथ नहीं मिला।’
कबीर ने कुछ क्षण संदेशों को देखा और कहा, ‘तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आपके भाई को किसने मारा। सवाल यह भी है कि उसकी मौत के बाद उसके फोन से आपको मैसेज किसने भेजा।’ यही वह क्षण था जब मामला साधारण हत्या से कहीं बड़ा हो गया।
अभिषेक के ऑफिस से पता चला कि वह पिछले दो महीनों से अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्रâॉड के एक बड़े नेटवर्क की जाँच कर रहा था। यह नेटवर्क भारत, दुबई, सिंगापुर और ब्रिटेन तक फैला हुआ था। अपराध का तरीका बेहद जटिल नहीं था, लेकिन उसका पैमाना बड़ा था। अलग-अलग लोगों के बैंक खातों में छोटी-छोटी रकम जमा होतीं, फिर कई खातों से गुजरते हुए वही पैसा विदेशी डिजिटल वॉलेट और फर्जी कंपनियों तक पहुँच जाता। कई भारतीय नागरिकों की पहचान का इस्तेमाल विदेशों में कंपनियाँ खोलने और बैंक खाते चलाने में किया जा रहा था, जबकि उन लोगों को इसकी भनक तक नहीं थी।
अभिषेक ने इस नेटवर्क में एक ऐसा पैटर्न पकड़ लिया था, जिससे लगभग उन्नीस करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन का पता चल रहा था। उसके वरिष्ठ अधिकारी राहुल मेहरा ने कबीर से कहा, ‘वह बहुत करीब पहुँच गया था।’ कबीर ने पूछा, ‘क्या उसे किसी से खतरा था?’ राहुल ने नजरें चुराते हुए कहा, ‘हमें शक था।’ ‘किस पर?’ कबीर ने पूछा। राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया। कबीर ने उसी समय तय कर लिया कि इस आदमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नैना ने घर लौटकर अभिषेक का लैपटॉप खोला। पासवर्ड उसे मालूम था। उसने कई फोल्डर देखे। बैंक स्टेटमेंट, विदेशी कंपनियों के दस्तावेज, संदिग्ध खातों की सूची और कुछ एन्क्रिप्टेड फाइलें थीं। एक फोल्डर का नाम था—‘इघ्र्Aथ्ञ्ण्प्Eण्ख्।’ वह पासवर्ड से बंद था। नैना को अभिषेक की पुरानी आदत याद आई। वह महत्वपूर्ण पासवर्ड में उनकी माँ की जन्मतिथि इस्तेमाल करता था। पासवर्ड डालते ही फोल्डर खुल गया।
अंदर एक एक्सेल शीट थी। सैकड़ों नाम और बैंक खातों की सूची। रकम छोटी-छोटी थी—पाँच सौ, बारह सौ, सत्रह सौ, ढाई हजार। लेकिन आखिरी कॉलम में सभी लेन-देन एक विदेशी डिजिटल वॉलेट की तरफ जा रहे थे। नैना ने यह फाइल कबीर को भेज दी। कबीर ने फाइल देखते ही कहा, ‘यह हत्या का कारण हो सकता है।’
तभी नैना के मोबाइल पर संदेश आया। वही नंबर। अभिषेक का नंबर।
‘दीदी, कबीर पर भरोसा मत करना।’
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कबीर ने संदेश पढ़ा और तुरंत तकनीकी टीम को बुलाया। जाँच से पता चला कि संदेश किसी इंटरनेट-आधारित सेवा के जरिए भेजा गया था। फोन नंबर अभिषेक का था, लेकिन संदेश सीधे उसके फोन से नहीं भेजा गया था। किसी ने उसके नंबर की पहचान का इस्तेमाल किया था।
कबीर ने पूछा, ‘आपके भाई का फोन अभी भी नहीं मिला?’
‘नहीं।’
‘तो जिसने भी यह किया है, वह सिर्फ अभिषेक की हत्या के बारे में नहीं जानता। वह उसके डिजिटल जीवन को भी नियंत्रित कर रहा है।’ अगले दिन पुलिस ने अभिषेक के ऑफिस और आसपास के ण्ण्ऊन्न् फुटेज खंगाले। रात दस बजकर इक्कीस मिनट पर अभिषेक ऑफिस से निकला। दस मिनट बाद एक सफेद कार उसके पीछे निकली। पेट्रोल पंप के फुटेज में अभिषेक दिखाई दिया। वह अकेला था, लेकिन सफेद कार कुछ दूरी पर खड़ी थी। पुलिस ने नंबर प्लेट का हिस्सा साफ किया। कार राहुल मेहरा की थी।
राहुल को हिरासत में लिया गया। पूछताछ में उसने माना कि वह अभिषेक का पीछा कर रहा था। ‘क्यों?’ कबीर ने पूछा। राहुल ने काफी देर तक चुप रहने के बाद कहा, ‘मैं उसे रोकना चाहता था।’ ‘किसलिए?’ ‘क्योंकि उसने जिस नेटवर्क का पता लगाया था, उसमें मेरा नाम भी था।’ कमरे में बैठे अधिकारियों ने उसकी ओर देखा। ‘क्या तुमने उसे मारा?’
‘नहीं।’
‘फिर वहाँ क्यों गए थे?’
राहुल ने सिर झुका लिया। ‘मैंने गलती की थी। कुछ महीने पहले मैंने एक विदेशी कंपनी के लिए कंसल्टेंसी का काम किया था। मुझे नहीं पता था कि वह कंपनी फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर रही है। जब अभिषेक ने मुझे बताया कि मेरे बैंक खाते और हस्ताक्षर भी जाँच में आ रहे हैं, तो मैं डर गया। मैं उससे सबूत मिटाने को कहने गया था। उसने मना कर दिया।’
‘फिर?’
‘मैं वहाँ से लौट आया।’
राहुल के फोन की लोकेशन ने उसकी बात की पुष्टि कर दी। हत्या के समय वह घटनास्थल से दूर था। लेकिन पुलिस को यह भी पता चल गया कि अभिषेक के पीछे कोई और था।
तीन दिन बाद पुलिस को एक काली एळन्न् का फुटेज मिला। वह कार घटनास्थल के पास कुछ देर रुकी थी। नंबर प्लेट दुबई की थी। जाँच में पता चला कि कार एक भारतीय नागरिक अरमान खान के नाम पर दर्ज थी। लेकिन समस्या यह थी कि अरमान खान की मृत्यु छह महीने पहले दुबई में हो चुकी थी।
अब मामला और गहरा गया। एक मृत आदमी के नाम पर कार चल रही थी। उसी नाम से डिजिटल वॉलेट सक्रिय था। और अभिषेक के बैंक रिकॉर्ड में पिछले सप्ताह उसी नेटवर्क से जुड़े एक विदेशी खाते से पैसा आया था। कबीर ने नैना से पूछा, ‘क्या आपके भाई का विदेश में कोई करीबी था?’
नैना ने कहा, ‘मेरा चचेरा भाई विवेक लंदन में रहता है। अभिषेक उससे बात करता था।’
विवेक से वीडियो कॉल पर बात हुई। कबीर ने पूछा, ‘अभिषेक ने आपसे आखिरी बार कब बात की थी?’
विवेक ने कहा, ‘तीन दिन पहले।’
‘क्या कहा था?’
‘उसने कहा था कि अगर वह गायब हो जाए तो मैं भारत मत आना।’
कबीर ने भौंहें सिकोड़ लीं। ‘क्यों?’
विवेक कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला, ‘उसने कहा था—‘जिसे तुम अपना परिवार समझते हो, हो सकता है वह तुम्हारा परिवार न हो।’’
कॉल खत्म होने के कुछ ही मिनट बाद विवेक का फोन बंद हो गया। उसी रात नैना को अभिषेक के लैपटॉप में एक वीडियो मिला। वीडियो सिर्फ उन्नीस सेकंड का था। अभिषेक कैमरे के सामने बैठा था। उसका चेहरा थका हुआ था और आँखों में ऐसा डर था जिसे नैना ने पहले कभी नहीं देखा था। उसने कहा, ‘दीदी, अगर तुम यह देख रही हो तो शायद मैं तुमसे बात नहीं कर पाया। जिस नेटवर्क को हम ढूँढ़ रहे हैं, वह सिर्फ पैसा नहीं चुराता। यह लोगों की पहचान चुराता है—पासपोर्ट, बैंक खाते, सिम कार्ड, कंपनियाँ… और कभी-कभी मौत भी।’
वीडियो अचानक बंद हो गया।
नैना ने उसे कई बार चलाया। फिर उसकी नजर पीछे लगे शीशे पर गई। शीशे में एक आदमी की परछाईं दिखाई दे रही थी। उसके हाथ में मोबाइल था और स्क्रीन पर दो शब्द चमक रहे थे—‘प्E ख्र्ध्ेंए।’
कबीर ने त्ास्वीर को बड़ा किया। आदमी की कलाई पर तीन तिरछी रेखाएँ दिखाई दीं।
नैना का चेहरा बदल गया।
‘यह निशानष्ठ’
‘क्या?’
‘अभिषेक की कलाई पर भी था।’
बचपन में साइकिल से गिरने के बाद अभिषेक की कलाई पर तीन टांके लगे थे। वही तीन छोटी रेखाएँ जीवन भर उसके हाथ पर रह गई थीं।
कबीर ने तुरंत अभिषेक की पुरानी तस्वीरें निकालीं। वीडियो की परछाईं का कद और शरीर लगभग अभिषेक जैसा ही था। लेकिन चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी लंदन से एक नया ण्ण्ऊन्न् फुटेज आया। एक भारतीय रेस्तराँ के बाहर एक आदमी दिखाई दे रहा था।
चेहरा साफ था।
नैना ने तस्वीर देखते ही कहा, ‘यह अभिषेक है।’ कबीर ने कहा, ‘लेकिनष्ठ’

कॉल खत्म होने के कुछ ही मिनट बाद विवेक का फोन बंद हो गया। उसी रात नैना को अभिषेक के लैपटॉप में एक वीडियो मिला। वीडियो सिर्फ उन्नीस सेकंड का था। अभिषेक कैमरे के सामने बैठा था। उसका चेहरा थका हुआ था और आँखों में ऐसा डर था जिसे नैना ने पहले कभी नहीं देखा था। उसने कहा, ‘दीदी, अगर तुम यह देख रही हो तो शायद मैं तुमसे बात नहीं कर पाया। जिस नेटवर्क को हम ढूँढ़ रहे हैं, वह सिर्फ पैसा नहीं चुराता। यह लोगों की पहचान चुराता है—पासपोर्ट, बैंक खाते, सिम कार्ड, कंपनियाँ… और कभी-कभी मौत भी।’ वीडियो अचानक बंद हो गया।
‘मैं अपने भाई को पहचानती हूँ।’
फेस रिकग्निशन सिस्टम ने भी मिलान की पुष्टि की। संभावना ९८ प्रतिशत से अधिक थी।
पुलिस के पास सड़क किनारे मिली लाश का Dर्A अभिषेक का था। तो फिर लंदन में दिखाई देने वाला आदमी कौन था?
कबीर ने पुराने रिकॉर्ड निकलवाए। अभिषेक की मौत से एक दिन पहले उसका पासपोर्ट सिस्टम में इस्तेमाल हुआ था। उसकी डिजिटल पहचान का उपयोग करके किसी ने लंदन की यात्रा का रिकॉर्ड बनाया था। और तभी एक बात सामने आई जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी। जिस शव को अभिषेक का समझा गया था, उसका चेहरा दुर्घटना और चोटों के कारण स्पष्ट नहीं था। Dर्A रिपोर्ट सही थी, लेकिन रिपोर्ट जिस सैंपल पर आधारित थी, वह घटनास्थल से मिला रक्त था। पुलिस ने शरीर से लिए गए दूसरे नमूने की जाँच करवाई।
रिपोर्ट आई—
शव अभिषेक का नहीं था।
नैना को जैसे बिजली का झटका लगा।
‘तो मेरा भाई जिंदा है?’
कबीर ने कहा, ‘बहुत संभव है।’
उसी रात नैना के मोबाइल पर एक ईमेल आया। कोई विषय नहीं था।
अंदर सिर्फ एक वीडियो था।
इस बार अभिषेक साफ दिखाई दे रहा था।
‘दीदी, मुझे माफ करना। मैंने अपनी मौत का नाटक इसलिए किया क्योंकि मुझे पता चल गया था कि मेरी निगरानी हो रही है। जिस आदमी पर मुझे सबसे ज्यादा भरोसा था, वही इस पूरे खेल का हिस्सा निकला।’
नैना ने वीडियो रोक दिया।
उसने कबीर की ओर देखा।
‘कौन?’
वीडियो फिर चलाया गया।
अभिषेक ने कहा, ‘मैंने तुम्हें इसलिए नहीं बताया क्योंकि अगर मैंने बताया होता तो वे तुम्हें भी निशाना बनाते।’
फिर उसने एक नाम लिया—
‘विवेक।’
नैना के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।
उसका अपना चचेरा भाई।
लंदन में रहने वाला विवेक।
अभिषेक ने आगे कहा, ‘विवेक सिर्फ नेटवर्क का हिस्सा नहीं है। वह उन लोगों की पहचान खरीदता है जिनके दस्तावेज चोरी हो चुके हैं। उसने मेरी डिजिटल पहचान भी कॉपी की। मेरी आवाज, मेरे दस्तावेज, मेरे बैंक रिकॉर्ड—सब। अगर मैं मर जाता, तो वह मेरे नाम से महीनों तक काम कर सकता था।’
नैना ने वीडियो रोक दिया।
लेकिन रहस्य अभी बाकी था।
अभिषेक कहाँ था?
वीडियो में उसने कोई लोकेशन नहीं बताई थी। फिर एक शब्द दिखाई दिया—
दुबई
कबीर ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से संपर्क किया। पता चला कि पिछले छह महीनों में भारत से जुड़े कई लोग दुबई पहुँचने के बाद अचानक गायब हुए थे। उनमें से कुछ के नाम से विदेशों में कंपनियाँ खुलीं, कुछ के बैंक खाते सक्रिय हुए और कुछ की पहचान का इस्तेमाल डिजिटल अपराधों में किया गया।
अभिषेक ने खुद को मरा हुआ घोषित करके इस नेटवर्क को भ्रमित किया था। लेकिन उसने एक गलती कर दी थी—उसने अपनी बहन को बचाने के लिए उसे पूरी सच्चाई नहीं बताई।
नैना को अचानक एक नंबर से कॉल आया।
दूसरी तरफ अभिषेक था।
‘दीदी।’
उसकी आवाज सुनते ही नैना की आँखों में आँसू आ गए।
‘तू जिंदा है।’
‘हाँ।’
‘कहाँ है?’
‘तुम्हारे बहुत करीब।’
‘मुझसे मिलने आ।’
कुछ सेकंड चुप्पी रही।
‘दुबई आ सकती हो?’
नैना ने कबीर की ओर देखा।
कबीर ने सिर हिलाकर मना किया।
लेकिन नैना ने उसी रात टिकट बुक कर लिया। उसे लगा कि अगर अभिषेक सचमुच खतरे में है तो वह उसे अकेला नहीं छोड़ेगी।
दुबई एयरपोर्ट पर उतरते ही उसके फोन पर संदेश आया—
‘पार्किंग लेवल तीन।’
वह वहाँ पहुँची तो एक आदमी दूर खड़ा दिखाई दिया।
दाढ़ी बढ़ी हुई।
थका हुआ चेहरा।
लेकिन वही आँखें।
अभिषेक।
दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे से लिपटे रहे।
नैना रोते हुए बोली, ‘तूने मुझे इतना डराया क्यों?’ अभिषेक ने कहा, ‘मेरे पास समय नहीं था।’ ‘अब सब खत्म?’
अभिषेक ने उसकी ओर देखा।
‘नहीं।’ ‘क्या बाकी है?’
‘वह आदमी अभी भी जिंदा है।’
‘विवेक?’
अभिषेक ने सिर हिलाया।
‘और वह अकेला नहीं है।’
उसी समय नैना के फोन पर एक संदेश आया।
‘ोंत्म्दस ूद Dल्ंaग्.’
नीचे एक तस्वीर थी।
तस्वीर में नैना और अभिषेक पार्किंग में खड़े दिखाई दे रहे थे।
तस्वीर अभी-अभी ली गई थी।
नैना ने चारों ओर देखा।
अभिषेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।
‘भागो।’
दोनों दौड़ पड़े।
कुछ दूर जाकर अभिषेक ने कहा, ‘यहाँ से निकलना होगा।’
‘लेकिन कौन पीछा कर रहा है?’
‘जिसे हमने समझा था कि वह मर चुका है।’ नैना ने पूछा, ‘कौन?’
अभिषेक ने जवाब देने से पहले पीछे देखा।
एक काली एळन्न् उनकी तरफ बढ़ रही थी।
कार का दरवाजा खुला।
अंदर बैठा आदमी बाहर आया।
चेहरा साफ था। नैना ने उसे देखते ही पहचान लिया। वह विवेक नहीं था।
वह राहुल भी नहीं था। वह वही आदमी था जिसकी तस्वीर अभिषेक ने वीडियो में दिखाई थी। लेकिन सबसे बड़ा झटका यह था कि उसकी कलाई पर तीन तिरछी रेखाएँ थीं।
अभिषेक ने धीरे से कहा, ‘यह मेरा जुड़वाँ भाई है।’ नैना कुछ समझ नहीं पाई।
‘क्या?’
‘माँ ने कभी तुम्हें नहीं बताया।’
अभिषेक की आँखें नम थीं।
‘हम दो भाई थे। तुमसे पहले। वह जन्म के कुछ दिनों बाद मर गया था—कम से कम हमें यही बताया गया था।’
‘लेकिनष्ठ’
‘वह मरा नहीं था।’ काली एळन्न् उनके सामने रुक चुकी थी। आदमी मुस्कराया।
‘बहुत देर कर दी, अभि।’
अभिषेक ने नैना को पीछे किया। ‘तुमने मेरी पहचान चुराई।’ आदमी ने कहा, ‘नहीं। मैंने सिर्फ वह पहचान वापस ली है जो हमारी होनी चाहिए थी।’
‘तुमने लोगों को मारा।’
‘लोगों ने अपनी पहचान बेच दी थी।’
‘वे मजबूर थे।’
‘और तुम?’
आदमी हँसा।
‘तुम भी अब मजबूर हो।’
दूर से पुलिस सायरन की आवाज सुनाई दी। अभिषेक ने पहले ही कबीर को लोकेशन भेज दी थी।
कुछ ही मिनटों में पुलिस ने इलाके को घेर लिया। विवेक को भी लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया। महीनों तक चली जाँच में सामने आया कि यह नेटवर्क मृत या लापता लोगों की पहचान का इस्तेमाल करके अंतरराष्ट्रीय डिजिटल अपराध करता था। लोगों के नाम पर कंपनियाँ खोली जातीं, उनके दस्तावेजों से खाते बनाए जाते और फिर उन्हें अपराधों के लिए इस्तेमाल किया जाता। कई लोग बिना जाने अपराधी बन चुके थे।
अभिषेक बच गया।
लेकिन वह पहले जैसा नहीं रहा।
भारत लौटने के बाद उसने नौकरी छोड़ दी और डिजिटल पहचान की सुरक्षा पर काम करने वाली संस्था के साथ जुड़ गया।
नैना ने उससे एक दिन पूछा, ‘तुझे सबसे ज्यादा डर किस चीज से लगा था?’
अभिषेक ने कुछ देर सोचकर कहा, ‘मौत से नहीं।’
‘फिर?’
‘इस बात से कि अगर मैं मर जाता तो मेरी पहचान जिंदा रहती और कोई दूसरा आदमी मेरी जिंदगी जीता रहता।’
नैना ने खिड़की से बाहर देखा।
मुंबई में फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।
उसने अपना मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे।
एक अजनबी नंबर से संदेश भी आया था।
उसने संदेश खोला।
सिर्फ एक पंक्ति थी—
‘हर कहानी का अंत नहीं होता।’
नैना ने तुरंत नंबर ब्लॉक कर दिया।
फिर मोबाइल मेज पर रख दिया।
अभिषेक ने पूछा, ‘क्या था?’
नैना मुस्कराई।
‘कुछ नहीं।’
वह खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
बाहर शहर अपनी रफ्तार से भाग रहा था।
लाखों लोग अपने-अपने फोन में व्यस्त थे। किसी को पता नहीं था कि उनकी स्क्रीन के पीछे कितनी दुनिया छिपी है। नैना ने उस दिन एक बात हमेशा के लिए समझ ली थी— आज के समय में किसी इंसान की सबसे कीमती चीज उसका पैसा नहीं, उसकी पहचान है।
पासवर्ड चोरी हो जाए तो बदला जा सकता है। बैंक खाता बंद किया जा सकता है। मोबाइल नंबर बदल सकता है। लेकिन अगर किसी ने आपकी पूरी डिजिटल पहचान चुरा ली, तो वह सिर्फ आपका पैसा नहीं लेता। वह आपकी जिंदगी का एक हिस्सा अपने नाम कर लेता है। और कभी-कभी, इससे पहले कि आपको पता चले कि कोई आपके पीछे चल रहा है, आपकी स्क्रीन पर वह आखिरी शब्द आ चुका होता है
— ऑनलाइन -नेहा झा

