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May 21, 2026

हास्य कहानी: झबरू का भूत और बर्मा का अचार

झबरू का भूत और बर्मा का अचार हास्य कहानी

“झबरू का भूत और बर्मा का अचार” एक बेहद मज़ेदार हास्य कहानी है। शर्मा जी की जिंदगी में दो ही चीजों का सबसे बड़ा खौफ था—एक उनकी धर्मपत्नी विमला देवी का गुस्सा…, और दूसरा उनके पड़ोसी गुप्ता जी का ‘झबरू’। झबरू कोई इंसान नहीं, बल्कि एक बेहद बदतमीज, गोल-मटोल और लालची किस्म का अल्सेशियन कुत्ता था, जो अक्सर शर्मा जी के घर के सामने ही अपनी दैनिक दिनचर्या पूरी करता था।

किस्सा उस दिन शुरू हुआ जब विमला जी ने बर्मा (म्यांमार) से आई अपनी मौसी के हाथों भेजा हुआ ‘स्पेशल कटहल का अचार’ धूप में सूखने के लिए आंगन की मुंडेर पर रखा। विमला जी ने कड़े शब्दों में शर्मा जी को हिदायत दी थी, “देखिए जी, इस अचार पर अपनी गिद्ध जैसी नजरें मत डालना। इसे अगले महीने बिटिया की शादी में मेहमानों के लिए सहेज कर रखना है। अगर एक पीस भी कम हुआ, तो रात का खाना भूल जाना।”

शर्मा जी ने अपनी लार घोंटते हुए आज्ञाकारी पति की तरह सिर हिला दिया। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।

दोपहर में जब विमला जी सो रही थीं, शर्मा जी ने देखा कि गुप्ता जी का झबरू मुंडेर के पास मँडरा रहा है। इससे पहले कि शर्मा जी उसे भगाते, झबरू ने छलांग लगाई और अचार की पूरी बरनी नीचे गिरा दी। बरनी टूटी नहीं, लेकिन उसका ढक्कन खुल गया और झबरू ने पलक झपकते ही आधा अचार चट कर लिया।

शर्मा जी के हाथ-पांव फूल गए। विमला जी जाग गईं तो उनका ‘अचार-विस्फोट’ पूरे मोहल्ले को ले डूबेगा। उन्होंने आनन-फानन में झबरू को डांटा, “हट पापी!” झबरू ने उन्हें एक ऐसी सुस्ती भरी नजर से देखा जैसे कह रहा हो—‘मसाला थोड़ा कम था, अगली बार नमक तेज रखना’—और वहां से टहलते हुए निकल गया।

अब शर्मा जी के सामने यक्ष प्रश्न था—बरनी को वापस कैसे भरा जाए? उन्होंने अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ाए। वे चुपके से रसोई में गए, बाजार से लाया हुआ आम का सस्ता अचार निकाला, उसमें थोड़ा गरम मसाला और सिरका मिलाया, और उसे बर्मा वाले कटहल के अचार के साथ मिक्स करके बरनी में ठूंस दिया। ऊपर से ढक्कन बंद करके ऐसे रख दिया जैसे कुछ हुआ ही न हो।

शाम को विमला जी जागीं। उन्होंने मुंडेर पर जाकर बरनी देखी। वे कुछ बुदबुदाईं, “अजी सुनते हो, इस बर्मा के अचार का रंग थोड़ा बदला-बदला क्यों लग रहा है? और इसमें आम की गुठली कहाँ से आई? कटहल के अचार में आम?”

शर्मा जी के माथे पर पसीना आ गया, पर उन्होंने एक मंझे हुए वकील की तरह पासा फेंका, “अरे भाग्यवान! तुम्हें बर्मा के भूगोल का अंदाज़ा नहीं है। वहाँ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कटहल के पेड़ पर ही आम उगने लगे हैं। इसे ‘हाइब्रिड अचार’ कहते हैं। तुम भी न, बस शक करती रहती हो।”

विमला जी ने उन्हें घूरकर देखा, पर बात आई-गई हो गई। असली ट्विस्ट अगली सुबह आया।

गुप्ता जी रोते-बिलखते शर्मा जी के घर आए। उनकी आँखों में आंसू थे। “शर्मा भाईसाहब! अनर्थ हो गया। हमारा झबरू… वह अब इस दुनिया में नहीं रहा। कल रात से ही वह सुस्त था, और आज सुबह उसने दम तोड़ दिया।”

यह सुनते ही शर्मा जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके दिमाग में बिजली कौंधी—‘हे भगवान! इसका मतलब मौसी का वह बर्मा वाला अचार असल में जहरीला था? और वही हाइब्रिड अचार कल मैंने विमला को भी चखाया था और खुद भी एक टुकड़ा खाया था!’

शर्मा जी को अपनी छाती में एक हल्का सा दर्द महसूस होने लगा। उन्हें लगा कि यमराज अपनी भैंस पर बैठकर उनके लिविंग रूम में दाखिल हो चुके हैं। वे हांफते हुए सोफे पर गिर पड़े।

“क्या हुआ जी?” विमला जी दौड़कर आईं।

“विमला… मुझे माफ कर देना,” शर्मा जी ने कांपती आवाज में कहा, “वह बर्मा का अचार… वह शापित था। झबरू उसे खाकर मर गया। और कल… कल मैंने भी उसमें से एक पीस खाया था। मेरी वसीयत… अलमारी के तीसरे दराज में…”

विमला जी ने अपना सिर पकड़ लिया, “अरे छोड़ो वसीयत को! डॉक्टर को फोन लगाओ।”

पूरे मोहल्ले में हंगामा मच गया। गुप्ता जी झबरू के लिए रो रहे थे और शर्मा जी अपनी आने वाली मौत के गम में दहाड़ें मार रहे थे। तभी वहां मोहल्ले के आवारा लड़कों का लीडर, ‘राजू’ आया।

राजू ने गुप्ता जी से कहा, “अरे गुप्ता अंकल, आप झबरू के लिए क्यों रो रहे हो? कल रात को हमारी क्रिकेट की बॉल आपकी छत पर गई थी। मैंने देखा था कि झबरू ने हलवाई की दुकान से चुराया हुआ पूरा का पूरा ढाई किलो का ‘शाही घेवर’ अकेले ही साफ कर दिया था। डॉक्टर कह रहे हैं कि वह मरे डिप्रेशन या जहर से नहीं, ‘ओवर-ईटिंग’ और भयंकर शुगर अटैक से मरा है!”

माहौल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

शर्मा जी, जो अब तक मरने की एक्टिंग (या डर) में आँखें बंद किए हुए थे, उन्होंने धीरे से एक आँख खोली। “क्या? घेवर से मरा?”

“हाँ अंकल!” राजू ने कहा।

शर्मा जी सीधे उठकर बैठ गए। उनका छाती का दर्द गायब हो चुका था। उन्होंने विमला जी की तरफ देखा, जो अब हाथ में बेलन लिए उन्हें यमराज से भी ज्यादा खौफनाक नजरों से घूर रही थीं।

“तो… ग्लोबल वार्मिंग… हाइब्रिड अचार… कटहल के पेड़ पर आम?” विमला जी की आवाज में ज्वालामुखी फटने के संकेत थे।

शर्मा जी ने एक बार फिर सूझबूझ दिखाई। वे फौरन सोफे से उठे, अपने दोनों कान पकड़े और बोले, “भाग्यवान, झबरू तो ढाई किलो घेवर खाकर मरा, लेकिन अगर मैं यहाँ एक सेकंड और रुका, तो मैं बिना कुछ खाए ही मारा जाऊँगा।” और इससे पहले कि बेलन हवा में लहराता, शर्मा जी ‘बर्मा के अचार’ की रफ्तार से घर से बाहर भाग खड़े हुए। पीछे पूरा मोहल्ला और खुद गुप्ता जी भी अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे थे।

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