नेपाल में चीन-तिब्बत सीमा के पास आई भीषण बाढ़ और मलबे के सैलाब ने भारी तबाही मचा दी है। नेपाल में बाढ़ रासुवा और आसपास के इलाकों में अचानक आई फ्लैश फ्लड ने गांवों, सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। ताजा रिपोर्टों के अनुसार नेपाल में मृतकों की संख्या बढ़कर कम से कम 162 पहुंच गई है, जबकि नेपाल और तिब्बत क्षेत्र में करीब 1,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है और इनमें कम से कम 133 भारतीय नागरिक भी शामिल बताए गए हैं। यह हादसा भोटे कोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्र में हुआ, जहां पानी और मलबे का बहाव इतनी तेजी से आया कि लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। कई जगह पानी का स्तर कुछ ही समय में कई मीटर बढ़ गया और अपने रास्ते में आने वाली इमारतों, वाहनों और अन्य ढांचों को बहा ले गया। रासुवा जिला इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है।
शुरुआत में इलाके में नेपाल में बाढ़ महसूस हुए तेज झटकों के कारण इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया था। हालांकि बाद की वैज्ञानिक जांच में सामने आया कि तबाही के पीछे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटना और उसके बाद बर्फ, चट्टान तथा मलबे का भारी सैलाब प्रमुख कारण रहा। इस मलबे ने नदी के प्रवाह को अचानक रोककर फिर बड़े पैमाने पर पानी और मलबे को नीचे की ओर धकेला, जिससे विनाशकारी फ्लैश फ्लड पैदा हुई। हादसे के बाद सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा या तिब्बत की ओर जाने वाले भारतीय तीर्थयात्रियों और दूसरे देशों के पर्यटकों की बड़ी संख्या बताई जा रही है। नेपाल के साथ तिब्बत क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में लोग लापता हैं। विदेशी नागरिकों में भारत के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा के नागरिक भी शामिल हैं।
भूस्खलन, बर्फ और मलबे से सड़कें तथा पुल क्षतिग्रस्त होने के कारण राहत और बचाव अभियान बेहद मुश्किल हो गया है। नेपाल की सेना और सुरक्षा एजेंसियां प्रभावित क्षेत्रों में तलाशी अभियान चला रही हैं। खराब मौसम और दुर्गम पहाड़ी इलाका बचाव कार्य में बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत समेत कई देशों ने नेपाल के साथ एकजुटता जताई है और राहत सहायता की पेशकश की है। भारत ने नेपाल के लिए राहत सामग्री भी भेजी है। विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और तेजी से पिघलते ग्लेशियर भविष्य में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों के कमजोर होने से अचानक ग्लेशियल कोलैप्स और उससे जुड़ी बाढ़ की घटनाएं गंभीर आपदा का रूप ले सकती हैं। नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन की चुनौती को सामने ला दिया है। फिलहाल राहत और खोज अभियान जारी है और अधिकारियों को आशंका है कि मृतकों तथा लापता लोगों की संख्या आगे और बढ़ सकती है। तबाही का पूरा आकलन बचाव अभियान आगे बढ़ने और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच बनने के बाद ही संभव होगा।

