तेज होती गर्मी और बढ़ते तापमान के बीच बांधों तथा जलाशयों का पानी तेजी से वाष्प बनकर उड़ जाना दुनिया के कई गर्म क्षेत्रों के सामने बड़ी चुनौती है। अब वैज्ञानिक एक ऐसी आधुनिक नैनो-तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो पानी की सतह पर बेहद हल्की सुरक्षात्मक परत बनाकर सूर्य की गर्मी को रोक सकती है। सवाल यह है कि क्या भविष्य में यह तकनीक महाराष्ट्र जैसे गर्म राज्यों के बांधों के लिए ‘सनस्क्रीन’ साबित हो सकती है?
गर्मी के दिनों में जब सूरज की तपिश लगातार बढ़ती है, तब केवल जमीन ही नहीं जलाशयों का पानी भी तेजी से कम होने लगता है। बांधों में जमा पानी का एक हिस्सा सिंचाई, पेयजल और उद्योगों के लिए इस्तेमाल होता है, लेकिन एक बड़ा नुकसान ऐसा भी है, जिस पर आमतौर पर कम ध्यान दिया जाता है—बाष्पीभवन। सूर्य की तेज गर्मी पानी की सतह को गर्म करती है और धीरे-धीरे पानी वाष्प बनकर वातावरण में चला जाता है। जल संकट वाले क्षेत्रों के लिए यह एक गंभीर चुनौती है, क्योंकि जिस पानी को इकट्ठा करने में वर्षों की योजना और करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, उसका एक हिस्सा केवल गर्मी के कारण हवा में उड़ जाता है। अब इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई नैनो-टेक्नोलॉजी आधारित फ्लोटिंग कवर विकसित करने की दिशा में प्रयोग शुरू किए हैं। इसका विचार बेहद दिलचस्प है—बांध या जलाशय के पानी पर एक ऐसा हल्का आवरण रखा जाए, जो सूर्य की गर्मी को रोक सके लेकिन जरूरी रोशनी को पानी तक पहुंचने दे।
इस तकनीक में हल्की और लचीली प्लास्टिक शीट के ऊपर ट्रांसपेरेंट कंडक्टिंग ऑक्साइड नामक पदार्थ की अत्यंत पतली नैनो-परत लगाई जाती है। यह परत इतनी सूक्ष्म होती है कि इसकी मोटाई कुछ सौ नैनोमीटर तक हो सकती है। इसका उद्देश्य सूरज की पूरी रोशनी को रोकना नहीं है। वैज्ञानिकों ने ऐसा आवरण तैयार करने की कोशिश की है जो दृश्य प्रकाश का बड़ा हिस्सा पानी तक पहुंचने दे, लेकिन सूर्य की गर्मी ले जाने वाली इन्प्रâारेड किरणों को काफी हद तक वापस परावर्तित कर दे। प्रयोगों में इस नैनो-कोटेड आवरण ने औसतन ६० प्रतिशत से अधिक दृश्य प्रकाश को गुजरने दिया, जबकि ८० प्रतिशत से अधिक इन्प्रâारेड विकिरण को वापस परावर्तित किया। इससे आवरण के नीचे का पानी तेज धूप के समय अपेक्षाकृत ठंडा बना रहा और बाष्पीभवन में कमी देखी गई।
सवाल उठ सकता है कि पानी को साधारण प्लास्टिक से ढंककर भी तो बाष्पीभवन रोका जा सकता है। लेकिन वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी समस्या है। यदि पानी की सतह तक सूर्य का प्रकाश पूरी तरह पहुंचना बंद हो जाए तो जलाशय के प्राकृतिक पर्यावरण, जलीय पौधों और जीव-जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। नई नैनो-तकनीक की विशेषता यही है कि यह सिद्धांत रूप में गर्मी को कम करने वाली किरणों को रोकते हुए उपयोगी प्रकाश को गुजरने दे सकती है। इसके अलावा यह आवरण हल्का और जल-विकर्षी होने के कारण पानी की सतह पर तैर सकता है।
प्रयोगशाला परीक्षणों में नैनो-कोटेड आवरण के नीचे पानी का स्तर लगभग स्थिर रहने के संकेत मिले, जबकि बिना ढके पानी और सामान्य प्लास्टिक से ढके पानी में अपेक्षाकृत अधिक कमी दर्ज की गई। हालांकि अभी इसे बड़े बांधों पर सफलतापूर्वक लागू मान लेना जल्दबाजी होगी। महाराष्ट्र जैसे राज्य में गर्मी के दौरान जलाशयों से होने वाला बाष्पीभवन जल प्रबंधन की एक वास्तविक चुनौती है। २०२६ की गर्मियों में राज्य के बांधों के जलस्तर में तेज गिरावट दर्ज की गई थी। वहीं विदर्भ क्षेत्र को लेकर जल संसाधन विभाग के एक अनुमान में अत्यधिक गर्मी के कारण बड़ी मात्रा में पानी के बाष्पीभवन की आशंका भी जताई गई थी।
मराठवाड़ा के जायकवाड़ी और बीड के माजलगांव जैसे जलाशयों के संदर्भ में भी गर्मी के दौरान पानी के तेजी से वाष्पित होने की समस्या सामने आती रही है। ऐसे में यदि भविष्य में यह तकनीक बड़े पैमाने पर प्रभावी और किफायती साबित होती है, तो यह महाराष्ट्र के जल संरक्षण प्रयासों के लिए उपयोगी हो सकती है। इस तकनीक को लेकर उत्साह जरूर है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है। वैज्ञानिकों को इसे वास्तविक झीलों और विशाल बांधों में आजमाना बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल इसकी लागत का है। हजारों या लाखों वर्गमीटर क्षेत्रफल वाले जलाशय को ऐसे आवरण से ढंकना कितना महंगा होगा? तेज हवा, बारिश और बदलते जलस्तर के बीच यह आवरण कितना टिकाऊ रहेगा? कई वर्षों तक तेज धूप में रहने के बाद प्लास्टिक सामग्री टूटकर पर्यावरण को नुकसान तो नहीं पहुंचाएगी? वैज्ञानिकों के अनुसार, बड़े स्तर पर प्रयोग से पहले इसकी मजबूती, पर्यावरणीय प्रभाव, रखरखाव और लागत का विस्तृत परीक्षण जरूरी है। नैनो-सामग्री को पानी में सीधे नहीं डाला जा रहा है, बल्कि उसे एक शीट पर कोटिंग के रूप में इस्तेमाल करने का विचार है, फिर भी लंबे समय के पर्यावरणीय प्रभावों की जांच आवश्यक होगी।
दुनिया भर में जल संरक्षण के लिए नई तकनीकों पर काम हो रहा है। फ्लोटिंग सोलर पैनल भी एक ऐसा विकल्प है, जो बिजली उत्पादन के साथ पानी की सतह को ढंककर बाष्पीभवन कम करने की क्षमता रखता है। २०२६ के एक शोध में जलाशयों पर फ्लोटिंग फोटोवोल्टिक सिस्टम के माध्यम से पानी की हानि कम करने और ऊर्जा उत्पादन को साथ जोड़ने की संभावनाओं का अध्ययन किया गया है। नैनो-टेक्नोलॉजी आधारित यह नया ‘वाटर सनस्क्रीन’ इसी दिशा में एक अलग और रोचक प्रयोग है। इसका लक्ष्य केवल पानी काे ढंकना नहीं, बल्कि सूर्य की गर्मी और प्रकाश के बीच वैज्ञानिक संतुलन बनाना है।
बांधों पर नैनो-टेक्नोलॉजी का उपयोग सुनने में भविष्य की तकनीक जैसा लगता है और संभव है कि आने वाले वर्षों में यह जल संरक्षण की दिशा बदल दे। लेकिन फिलहाल इसे किसी चमत्कारी समाधान के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। यह तकनीक अभी प्रयोगशाला के परिणामों से वास्तविक दुनिया की परीक्षा की ओर बढ़ रही है। यदि बड़े पैमाने के परीक्षणों में यह सस्ती, टिकाऊ और पर्यावरण के लिए सुरक्षित साबित होती है, तो भविष्य में गर्म क्षेत्रों के बांधों और जलाशयों के लिए यह वास्तव में विज्ञान का ‘सनस्क्रीन’ बन सकती है। तेज होती गर्मी और बढ़ते जल संकट के दौर में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ नया पानी खोजने का नहीं है, बल्कि हमारे पास मौजूद पानी को बचाने का भी है। शायद भविष्य की सबसे बड़ी जल-क्रांति इसी सोच से शुरू हो।

