आज नेपाल दुख और संकट के दौर से गुजर रहा है। वहां जिन परिवारों ने अपने घर खोए हैं, उनके लिए यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है। नेपाल की त्रासदी: प्रकृति की चेतावनी, किसी के लिए वर्षों की मेहनत से बनाया गया घर एक ही पल में मलबा बन गया होगा, किसी बच्चे ने शायद पहली बार अपने गांव को पहचान से बाहर देखा होगा और किसी मां ने अपने परिवार को बचाने के लिए पूरी रात भय और अनिश्चितता में बिताई होगी। किसी बुजुर्ग के सामने जीवनभर की कमाई और उससे जुड़ी अनगिनत यादें पानी के साथ बह गई होंगी। आपदा के आंकड़े हमें नुकसान का अनुमान दे सकते हैं, लेकिन आंकड़े दर्द को कभी पूरी तरह बयान नहीं कर सकते। किसी रिपोर्ट में यह लिखा जा सकता है कि कितने घर नष्ट हुए, कितनी सड़कें टूटीं और कितना आर्थिक नुकसान हुआ, लेकिन कोई आंकड़ा यह नहीं बता सकता कि एक व्यक्ति अपने पूरे परिवार को खोने के बाद किस तरह जीवन के साथ आगे बढ़ता है। कोई रिपोर्ट यह नहीं माप सकती कि मलबे के सामने खड़ा बच्चा अपने पुराने घर को याद करके कितनी बार रोता होगा और कोई आर्थिक गणना उन सपनों की कीमत नहीं लगा सकती, जिन्हें एक बाढ़ या भूस्खलन कुछ घंटों में समाप्त कर देता है।
कुछ तस्वीरें खबर नहीं होतीं, वे इतिहास के चेहरे पर दर्ज एक दर्दनाक सवाल बन जाती हैं। बाढ़ में बहते घर, मलबे के नीचे दबे सपने, अपनों की तलाश में भटकते लोग, बच्चों की डरी हुई आंखें और देखते ही देखते उजड़ते परिवार—नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा की तस्वीरें केवल एक पड़ोसी देश की त्रासदी नहीं हैं। यह पूरी मानव सभ्यता के सामने खड़ी एक कठोर और भयावह चेतावनी है। जब पहाड़ टूटते हैं, नदियां अपना रौद्र रूप दिखाती हैं और धरती इंसानी बस्तियों को निगलने लगती है, तब हमें अचानक प्रकृति की शक्ति का एहसास होता है। कुछ दिन तक हम दुखी होते हैं, राहत सामग्री भेजते हैं, सोशल मीडिया पर संवेदनाएं व्यक्त करते हैं और फिर धीरे-धीरे अपनी सामान्य जिंदगी में लौट जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर त्रासदी के बाद हमारी संवेदना भी मलबे के नीचे दब जाती है? क्या हम अगली आपदा का इंतजार इसलिए करते हैं कि फिर से मोमबत्ती जलाकर दुख व्यक्त कर सकें?
नेपाल की यह त्रासदी कोई अकेली घटना नहीं है। हमारे सामने उत्तराखंड की केदारनाथ आपदा की भयावह यादें हैं। हिमाचल प्रदेश में हर वर्ष बारिश और भूस्खलन से तबाही की खबरें आती हैं। असम और बिहार की नदियां लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती रही हैं। कहीं भूकंप शहरों को मलबे में बदल देता है, कहीं चक्रवात समुद्री तटों को उजाड़ देता है, तो कहीं जंगलों की आग हजारों किलोमीटर तक जीवन और पर्यावरण को निगल जाती है। घटनाएं अलग हैं, भूगोल अलग है, लेकिन प्रकृति का संदेश एक है—अब भी संभल जाओ। सच यह है कि हम केवल प्रकृति को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। पहाड़ों को काटकर होटल खड़े करना, नदियों के किनारों और जलमार्गों पर कंक्रीट के जंगल बसाना, जंगलों को विकास के नाम पर समाप्त करना और पर्यावरणीय चेतावनियों को नजरअंदाज करना—क्या यह सब हमारी बनाई हुई त्रासदियों का हिस्सा नहीं है? विकास के नाम पर हमने प्रकृति से बहुत कुछ लिया है, लेकिन उसे लौटाने की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की। हमने नदियों को बांधने की कोशिश की, पहाड़ों को काट दिया, जंगलों को सिकोड़ दिया और जमीन पर इतना बोझ डाल दिया कि प्रकृति का संतुलन लगातार कमजोर होता गया। समस्या विकास की नहीं है; समस्या उस विकास मॉडल की है जिसमें सड़क तो दिखाई देती है, लेकिन उसके नीचे दबा जंगल दिखाई नहीं देता; इमारत दिखाई देती है, लेकिन उसके लिए बदला गया नदी का रास्ता दिखाई नहीं देता।
नेपाल और भारत का हिमालयी क्षेत्र केवल दो देशों की भौगोलिक सीमा नहीं है। यह पूरे दक्षिण एशिया की जीवनरेखा है। यहां की नदियां, जंगल, पहाड़ और हिमनद करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़े हुए हैं। इसलिए नेपाल की आपदा को केवल नेपाल की समस्या मान लेना एक बड़ी भूल होगी। जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं पासपोर्ट देखकर सीमाएं पार नहीं करतीं। एक देश की पर्यावरणीय लापरवाही का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है। आज जरूरत है कि दक्षिण एशिया के देश प्राकृतिक आपदाओं को केवल राहत और बचाव का विषय न मानें। हमें साझा चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक निर्माण नीति, पर्यावरण संरक्षण, हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशेष विकास मॉडल और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर गंभीरता से काम करना होगा। आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है आपदा आने से पहले खतरे को समझना।
प्रकृति को जीतने की हमारी महत्वाकांक्षा शायद हमारी सबसे बड़ी भूल है। इंसान ने विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन आज भी एक भूकंप, एक बाढ़ या एक भूस्खलन हमें याद दिला देता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं हैं। हम केवल उसके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले एक छोटे से हिस्से हैं। नेपाल की पीड़ा आज हमसे केवल सहानुभूति नहीं मांग रही। वह हमसे जवाब मांग रही है। जवाब हमारी सरकारों से भी है, हमारी विकास नीतियों से भी और हम सबकी जीवनशैली से भी। अब समय आ गया है कि हम हर प्राकृतिक आपदा को केवल ‘दुर्भाग्य’ कहकर आगे न बढ़ जाएं। हमें ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि प्रकृति की कई चेतावनियों को हमने खुद अनसुना किया है।
आज नेपाल रो रहा है। कल कोई और शहर, कोई और राज्य, कोई और देश हो सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी। असली प्रश्न यह है कि क्या अगली आपदा आने से पहले हम अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का साहस करेंगे? क्योंकि जब प्रकृति चेतावनी देती है तो उसके शब्द नहीं होते—वह अपने संकेतों से बोलती है। और जब इंसान उन संकेतों को लगातार अनसुना करता है, तब इतिहास केवल एक ही बात दर्ज करता है—‘चेतावनी समय पर मिली थी, लेकिन हमने उसे गंभीरता से नहीं लिया।’
-मंगला नटराजन
Read also: खडीबोली हिन्दी के जन्मदाता

