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September 4, 2026
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अमेरिका-भारत टैरिफ विवाद

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में टैरिफ बम फोड़कर सभी को बेचैन कर दिया। लेकिन ट्रंप अब इसी अपने फैसले को लेकर यू-टर्न लेते नजर आ रहे हैं। अपने ही देश में घिर चुके डोनाल्ड ट्रंप अब धीरे धीरे अपने फैसले से पीछे हट रहे हैं। हालांकि ट्रंप वजह अपनी दे रहे हैं। लेकिन फिर भी पूरी दुनिया के सामने इसे यू टर्न ही माना जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जापान को लेकर बड़ा ऐलान किया है। जिस बीच भारत और जापान एक दूसरे के और करीब आ रहे थे। अपनी साझेदारी को बढ़ा रहे थे। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जापान पर लगाए गए टैरिफ को घटा दिया है। जानकारी के अनुसार अमेरिका और जापान के बीच व्यापार समझौता हुआ है। जिसके लिए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते को ट्रंप ने अमेरिका जापान व्यापार संबंधों के एक नए युग की शुरुआत बताया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोमवार को दावा किया कि भारत ने अब अमेरिका पर टैरिफ कम करने की पेशकश की है, लेकिन काफी देर हो चुकी है। उन्होंने भारत के साथ व्यापार संबंधों को ‘एकतरफा’ बताते हुए कहा कि भारत अमेरिका को बहुत सारा सामान बेचता है, लेकिन अमेरिका भारत को बहुत कम सामान बेच पाता है। 

ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि भारत ने अमेरिकी सामानों पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगाए, जिससे अमेरिकी कंपनियों को भारत में सामान बेचना मुश्किल हो गया। यह पूरी तरह से एकतरफा आपदा रही है!

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल और मिलिट्री उपकरण रूस से खरीदता है, न कि अमेरिका से। ट्रम्प ने इसे सालों पुरानी दिक्कत बताया और कहा कि भारत को पहले ही टैरिफ कम कर देना चाहिए था।

ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब कुछ घंटे पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने एण्ध् समिट के दौरान चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की है।

अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत-ळए दोस्ती को खास रिश्ता बताया

दूसरी तरफ अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि भारत-अमेरिका की साझेदारी २१वीं सदी की सबसे खास साझेदारी है। उन्होंने कहा कि इस महीने दोनों देश अपने लोगों, तरक्की और नई संभावनाओं पर ध्यान दे रहे हैं। नई तकनीक, कारोबार, रक्षा और आपसी रिश्तों से यह दोस्ती और गहरी हो रही है।

मार्को रुबियो ने कहा- यह दोस्ती दोनों देशों के लोगों के प्यार और विश्वास से चलती है। दोनों देश मिलकर नए मौके तलाश रहे हैं, जैसे तकनीक, रक्षा और संस्कृति में एक-दूसरे का साथ देना।

ट्रम्प के सलाहकार बोले-रूसी तेल से भारतीय ब्राह्मणों को मुनाफा

ट्रम्प के बयान से कुछ देर पहले ही उनके ट्रेड सलाहकार पीटर नवारो ने भारतीय ब्राह्मणों पर रूसी तेल खरीद कर मुनाफाखोरी का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि भारत के ब्राह्मण रूसी तेल से मुनाफा कमा रहे हैं, जिसकी कीमत पूरा भारत चुका रहा है। नवारो ने कहा कि भारत रूस से तेल खरीदकर उसे यूक्रेन पर हमला करने के लिए पैसे दे रहा है। इसलिए सबसे ज्यादा टैरिफ झेल रहा है। इससे रूस और अमेरिका को नुकसान नहीं हो रहा है, बल्कि आम भारतीयों को हो रहा है। यह बात उन्हें समझनी चाहिए। नवारो ने भारत को ‘रूस की धुलाई मशीन’ कहा और आरोप लगाया कि भारत न सिर्फ व्यापार असंतुलन बढ़ा रहा है, बल्कि ऐसे गठजोड़ भी मजबूत कर रहा है, जो अमेरिका के हितों के खिलाफ हैं। 

ट्रम्प ने भारत पर कुल ५०ज्ञ् टैरिफ लगाया है

ट्रम्प ने भारतीय प्रोडक्ट्स पर कुल ५०ज्ञ् टैरिफ लगाया है। यह टैरिफ २५ज्ञ् बेस टैरिफ और २५ज्ञ् एक्स्ट्रा टैरिफ को मिलाकर बना है। भारत पर २५ज्ञ् एक्स्ट्रा टैरिफ को लेकर ट्रम्प का कहना है कि भारत रूस से तेल खरीद कर खुले बाजार में बेच रहा है। इससे पुतिन को यूक्रेन के खिलाफ जंग जारी रखने में मदद मिल रही है। वहीं, न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत और अमेरिका के बीच तनाव की असल वजह ट्रम्प की नोबेल प्राइज की ख्वाहिश है। रिपोर्ट के मुताबिक, १७ जून को ट्रम्प ने मोदी से कहा था कि पाकिस्तान उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट करने वाला है। ट्रम्प ने इशारों में भारत से भी ऐसा करने को कहा। मोदी इससे नाराज हो गए थे।

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'भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ जीरो करने की पेशकश की है लेकिन', ट्रंप ने किया बड़ा दावा

मोदी ने जापान और चीन की पूर्वी यात्राएं की हैं, और रूस के साथ दशकों पुराने संबंधों पर जोर दिया है। यह वैश्विक व्यापार शक्तियों के संभावित पुनर्गठन का संकेत देता है। चीन से लौटने के कुछ ही घंटों बाद, ट्रंप ने अपने ‘ट्रुथ सोशल’ पोस्ट में कहा: ‘बहुत कम लोग समझते हैं कि हम भारत के साथ बहुत कम व्यापार करते हैं, लेकिन वे हमारे साथ बहुत अधिक व्यापार करते हैं… इसका कारण यह है कि भारत ने हम पर अब तक इतने उच्च शुल्क लगाए हैं… कि हमारी कंपनियाँ भारत में बेच नहीं पा रही हैं। यह पूरी तरह से एकतरफा आपदा रही है!’ अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, २०२४ में भारत ने अमेरिका से ४१.५ बिलियन डॉलर का सामान आयात किया, जबकि अमेरिका को ८७.३ बिलियन डॉलर का निर्यात किया। इसका मतलब भारत के पक्ष में ४५.८ बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष था। २०२५ के पहले छह महीनों में, अमेरिका को भारतीय निर्यात ५६.३ बिलियन डॉलर था, जबकि आयात २२.१ बिलियन डॉलर का हुआ। 

ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा कि भारत ‘अपना अधिकांश तेल और सैन्य उत्पाद रूस से खरीदता है, अमेरिका से बहुत कम।’ उन्होंने फिर से इस कारक (विशेषकर कच्चे तेल) का उल्लेख किया, जिसे उन्होंने भारतीय उत्पादों पर लगाए गए कुल ५०ज्ञ् टैरिफ के २५ज्ञ् ‘जुर्माना’ वाले हिस्से का मूल कारण बताया था। उन्होंने दावा किया: ‘उन्होंने (भारत) अब अपने शुल्कों को शून्य करने की पेशकश की है, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। उन्हें ऐसा कई साल पहले करना चाहिए था।’ उन्होंने कहा कि वह ‘लोगों के सोचने के लिए कुछ सरल तथ्य’ प्रस्तुत कर रहे हैं। ट्रंप इस व्यापार घाटे से कथित तौर पर नाराज हैं, क्योंकि उनका दावा है कि अमेरिकी वस्तुओं पर भारत द्वारा बहुत अधिक कर लगाया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, वे इस बात से भी नाराज हो सकते हैं कि भारत ने उनके इस दावे को स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने मई में पाकिस्तान के खिलाफ अपने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ सैन्य कार्रवाई को ‘बंद करवा दिया’। कई ज्ञात और अनुमानित कारणों के बीच, भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी शुल्क पिछले महीने के अंत तक ५०ज्ञ् तक पहुँच गया, जो २५ज्ञ् लागू होने के तीन सप्ताह बाद हुआ। ये शुल्क विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे कपड़ा, रत्न और आभूषण, जूते और चमड़े के सामान, झींगा और अन्य उत्पादों को प्रभावित करते हैं। फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कुछ क्षेत्रों को फिलहाल काफी हद तक छूट दी गई है। पूर्वानुमानों से पता चलता है कि अमेरिका को भारतीय निर्यात २०२४ में लगभग ८७ बिलियन डॉलर से २०२६ तक लगभग ५० बिलियन डॉलर तक नाटकीय रूप से गिर सकता है, जिससे सकल घरेलू उत्पाद पर लगभग १ज्ञ् का संभावित प्रभाव और महत्वपूर्ण नौकरी नुकसान हो सकता है।

जिनपिंग का सीक्रेट लेटर...

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका और ट्रंप को पहला झटका तब दिया था, जब ट्रंप ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान का सीजफायर मैंने कराया है। दूसरा झटका एससीओ समिट में शामिल होकर दिया। एससीओ समिट से जो तस्वीरें निकलकर सामने आई उसे दुनियाभर में देखा गया। अपने अपने हिसाब से उस पर चर्चाएं भी की गई। अब तीसरा झटका भारत सरकार की तरफ से दिया गया है। यूएस ट्रेजरी बिल में निवेश को भारत सरकार लगातार कम कर रही है। इसके बजाए सोने के भंडार को बढ़ाने पर भारत का फोकस है। आपको बताते चले कि जब रूस और यूक्रेन के बीच २०२२ में शुरू हुआ था। उस वक्त रूस का लगभग २०० बिलियन डॉलर ट्रेजरी बिल या फिर डॉलर के रूप में अमेरिकी बैंकों में जमा था। उस पैसे को अमेरिका के द्वारा प्रâीज कर दिया गया था। आज अमेरिका और भारत के बीच जैसे हालात चल रहे हैं। भारत का लगभग ७०० अरब रुपए अमेरिकी बैकों में ट्रेजरी बिल्स और बाकी चीजों में जमा है। उसे अब भारत कब कर रहा है। 

क्या होती है ट्रेजरी बिल

ट्रेजरी बिल्स अप्लपाकालिक सरकारी प्रतिभूतियां हैं। जिनकी परिपक्वता अवधि (मैच्यूरिटी पिरीयड) एक वर्ष या उससे कम होती है। आमतौर पर ४ सप्ताह, १३ सप्ताह, २६ सप्ताह या ५२ सप्ताह इसकी अवधि होती है। ये डिस्काउंड पर बेचे जाते हैं। यानी आप इन्हें अंकित मूल्य से कम कीमत पर खरीदते हैं और परिपक्वता पर आपको पूरा अंकित मूल्य प्राप्त होता है। अंतर ही आपका लाभ (ब्याज) होता है। ट्रेजरी बिल्स को लगभग जोखिम मुक्त माना जाता है क्योंकि इन्हें अमेरिकी सरकार का समर्थन प्राप्त है और डिफॉल्ट की संभावना नगण्य है। अगर इसे आसान भाषा में समझें तो एक तरह का कर्ज होता है। अमेरिका को पैसे चाहिए। वो आपसे पैसे लेकर उसके बदले एक कागत दे रहा है, जिसमें वादा किया जा रहा है कि आपको एक साल के बाद १०० रुपए देगा,…   (शेष पृष्ठ ५५ पर)

आप आज हमें ९७ रुपए दे दो। अमेरिका सुपरपावर है। डॉलर सबसे पावरफुल करेंसी है। उसे पूरे फाइनेंस इंस्टीट्यूशन में रिस्क प्रâी एसेट कहा जाता है। अमेरिका के पास इतना कर्जा है कि उस कर्ज को चुकाने के लिए और कर्ज ले रहा है। 

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज़ के धारक

 देश जून २०२४ जून २०२५

 जापान १०९१.४० ११४७.६०

 यूनाइटेड किंगडम ७४६.५० ८५८.१०

 चीन ७८०.२० ७५६.४०

 बेल्जियम ३१८.०० ४३३.४०

 प्रâांस ३०५.४० ३७४.९०

 भारत २४१.९० २२७.४०

 ब्राजील २२७.०० २१५.३०

 सऊदी अरब १४०.२० १३०.६०

 इजरायल ६९.७० १०१.७०

 जर्मनी ९०.८० १००.७०

भारत की अमेरिकी ट्रेजरी बिल होल्डिंग्स में कमी

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, आँकड़े दर्शाते हैं कि जून में भारत के अमेरिकी ट्रेजरी बिल निवेश में पिछले वर्ष की तुलना में गिरावट आई है, जबकि इस दौरान उसके स्वर्ण भंडार में वृद्धि हुई है। फिर भी, भारत सऊदी अरब और जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए, अमेरिकी ट्रेजरी बिलों में शीर्ष २० निवेशकों में अपनी स्थिति बनाए हुए है। जून २०२५ में इसकी होल्डिंग्स का मूल्य २२७ बिलियन डॉलर था, जो पिछले वर्ष जून में २४२ बिलियन डॉलर था। डॉलर होल्डिंग्स में गिरावट, भू-राजनीतिक तनावों और व्यापार विवादों के कारण, विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने की व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति का संकेत देती है।

सोने के भंडार पर फोकस कर रहा भारत

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि भारतीय मुद्रा भंडार में लगातार वृद्धि देखी गई है, जिसके साथ-साथ विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में विविधता भी आई है। यही कारण है कि कुछ देशों, खासकर भारत, चीन और ब्राज़ील में इस स्तर पर उतार-चढ़ाव देखा गया है। पिछले बारह महीनों में डॉलर में देखी गई अस्थिरता के बीच टी-बिलों का बकाया स्टॉक डॉलर के मूल्यांकन को दर्शाता है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, इस समयावधि में उसने लगभग ३९.२२ मीट्रिक टन सोना अर्जित किया। ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता ने कहा कि  यूएसटी प्रतिफल में गिरावट के बावजूद, भारत की यूएसटी होल्डिंग एक वर्ष में १४.५ बिलियन डॉलर कम हो गई है, जो दर्शाता है कि यूएसटी से दूर विदेशी मुद्रा भंडार होल्डिंग में विविधीकरण हुआ है। इसी अवधि में, स्वर्ण भंडार में वृद्धि हुई है। यह बदलाव विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और अमेरिका-विशिष्ट कारकों के कारण पुनर्मूल्यांकन हानि के जोखिम को कम करने के प्रयास को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी सरकार के बिगड़ते राजकोषीय मानकों ने प्रतिफल को ऊंचा बनाए रखा है। 

ट्रंप २.० में अमेरिकी ट्रेजरी बिल होल्डिंग्स अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंची

डोनाल्ड ट्रंप के पदभार ग्रहण करने से पहले दिसंबर में भारत की अमेरिकी ट्रेजरी बिल होल्डिंग्स अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच गई थीं। २२७ अरब डॉलर के ट्रेजरी बिलों का अधिकांश हिस्सा विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा है, जो २२ अगस्त, २०२५ तक ६९० अरब डॉलर हो गया। जापान और ब्रिटेन के बाद, चीन तीसरा सबसे बड़ा अमेरिकी ट्रेजरी बिल धारक है और उसने अपनी हिस्सेदारी कम कर ली है। मुख्यभूमि चीन की होल्डिंग्स जून २०२५ में ७५६ अरब डॉलर पर आ गईं, जो जून २०२४ के ७८० अरब डॉलर से कम है। इसके विपरीत, इस अवधि के दौरान इज़राइल ने इस श्रेणी में अपने निवेश का उल्लेखनीय विस्तार किया है।

रूस ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि हालात अनुकूल रहे तो त्रिपक्षीय बैठक यानी भारत-रूस और चीन का साझा मंच भी देखने को मिल सकता है। ये वही सीन होगा जिसका ख्वाब ट्रंप कभी नहीं देखना चाहते थे। अगर ये तीन ताकतें आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर साथ खड़ी हो गई तो अमेरिका की टैरिफ डिप्लोमेसी का खेल वहीं ध्वस्त हो जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों कूटनीति के उस विसात पर चालें चल रहे हैं। जिस पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नींद उड़ चुकी है। मोदी पहले जापान पहुंच रहे हैं, जहां १५वें भारत-जापान शिखर सम्मेलन को लेकर टोक्यो में बड़ी बैठक हो रही है। लेकिन असली हलचल तब मचेगी जब वो सीधे चीन पहुंचकर एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। ३१ अगस्त को पीएम मोदी और शी जिनपिंग आमने सामने बैठेंगे। वहीं १ सितंबर को पुतिन से भी उच्चस्तरीय बातचीत होगी। यानी एक ही मंच पर भारत, रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्ष एक साथ होंगे। ऐसा मौका सालों बाद आया है और यही तस्वीर ट्रंप के माथे पर पसीना लाने वाली है। दरअसल, रूस ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि हालात अनुकूल रहे तो त्रिपक्षीय बैठक यानी भारत-रूस और चीन का साझा मंच भी देखने को मिल सकता है। ये वही सीन होगा जिसका ख्वाब ट्रंप कभी नहीं देखना चाहते थे। अगर ये तीन ताकतें आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर साथ खड़ी हो गई तो अमेरिका की टैरिफ डिप्लोमेसी का खेल वहीं ध्वस्त हो जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मार्च में टैरिफ वॉर शुरू किया, तब इसके नकारात्मक प्रभाव भांपकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राष्ट्रपात द्रौपदी मुर्मु को गोपनीय पत्र भेजा था और संबंधों में सुधार की संभावनाएं टटोली थीं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, ट्रेड वार्ता बेपटरी होने और ट्रम्प के भारत-पाक संघर्ष में मध्यस्थता के दावों के बाद भारत-चीन के संबंधों में सुधार तेज हुआ। दोनों देशों ने सीमा विवादों को सुलझाने के प्रयास दोगुने कर दिए हैं। ये जानते हुए कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन पहल उसने की है तो नाराज भी नहीं करना है। कहा जाता है कि अजित डोभाल को उसकी जिम्मेदारी दी गई। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल विशेष प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि मोदी ने शी से कहा है कि सीमा तनाव किसी भी देश के हित में नहीं है। इससे शी सहमत हुए और दोनों नेताओं ने कहा कि वे राजनयिकों से समाधान पर काम करने के लिए कहेंगे। इसके बाद से गतिरोध दूर होने लगा।
ट्रोइका से अमेरिका भी डरता है
यूएस टैरिफ के खिलाफ न सिर्फ चीन, रूस, बल्कि ब्राजील के राष्ट्रपति जिस तरह से सामने आए उसने ब्रिक्स के देशों के विरोध को आरआईसी मेकेनिजम के जरिए रखने की भी एक संभावना को सामने रखा है। हाल के वक्त मे भारत की ओर से आरआईसी मैकेनिजम को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता दिखी नही है। साथ ही शांति की कथित कोशिशों को लेकर अमेरिका की भूमिका के चलते फिलहाल रूस भी यूएस के खिलाफ पहले जैसा आक्रामक रुख दिखाने से परहेज करेगा। पूर्व रूसी पीएम प्रिमकोव ने सबसे पहले १९९८ में इस फोरम के विचार को प्रस्तावित किया था, लेकिन ये साल २००१ में ही अस्तित्व में आया था। दूसरे बहुपक्षीय मंचों की ही तरह ये फोरम भी तीनों में से हर देश को अपनी विदेश नीति को ज्यादा अच्छे से समझाने का मौका देता है। हालांकि भारत और चीन के बीच विश्वास कायम करने को लेकर ये फोरम ज्यादा कामयाब नहीं रहा है।
ग्लोबल साउथ का सूत्रधान भारत
अमेरिका ने अपनी क्रेडिब्लिटी को खो दिया है। अब उसपर कोई विश्वास करे तो कैसे करे। लेकिन हिंदुस्तान के ऊपर कोई सवाल नहीं उठा सकता। हिंदुस्तान किसी भी मुल्क के साथ कभी भी तलवार कि जोर पर अपना काम नहीं करते हैं। हम एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर के साथ मिलकर चीजों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हिंदुस्तान कितना भी ताकतवर था, दुनिया की ५० प्रतिशत आर्थिक गतिविधियां हिंदुस्तान से होती थी, लेकिन फिर भी हमने कहीं जाकर कब्जा नहीं किया। म्युअल रिस्पेक्ट के साथ हिंदुस्तान डिप्लोमेसी करता है। लेकिन ये बात डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग में नहीं गई। भारत ने दुनिया में जिसके पास आवाज नहीं थी ग्लोबल साउथ उसे खड़ा किया।
४० देशों का गठबंधन
भारत ने टैरिफ के बदले एक अलग किस्म का परस्पर ४० देशों का गठबंधन तैयार किया। अमेरिका ने भारत पर ५० फीसदी का टैरिफ लगाया। इस मुसीबत से निपटने के लिए रणनीति में बदलाव करते हुए ग्लोबल मार्केट में कपड़े के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। कुल ४० देशों में डेडिकेटेड आउटरीच प्रोग्राम चलाएगा। इन देशों में ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, प्रâांस, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, पोलैंड, बेल्जियम, कनाडा, मेक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस, तुर्किए, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। इस पहल से भारत गुणवत्तापूर्ण टिकाऊ और इनोवेशन बेस्ड क्लोथ प्रोडक्ट का सप्लाई चेन स्थापित करने की कोशिश करेगा।

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