बरसात की बूंदें खपरैल पर लगातार गिर रही थीं। कहीं तेज़, कहीं धीमी। उनके बीच-बीच में झींगुरों की आवाज़ सुनाई देती, फिर अचानक सब कुछ शांत हो जाता। आरव टॉर्च हाथ में लिए आँगन में खड़ा था। भीगी मिट्टी पर बने छोटे-छोटे पैरों के निशान अब भी साफ़ दिखाई दे रहे थे। वे सीधे पुराने अनाजघर तक जाते थे। जहाँ वह बचपन में जाने से डरता था। दादी कहती थीं—'पुराने घरों में चीज़ें सिर्फ़ रखी नहीं रहतीं, यादें भी वहीं बस जाती हैं।' तब वह हँस देता था। आज वही वाक्य अनायास उसके भीतर गूँज उठा। उसने टॉर्च की रोशनी दरवाज़े पर डाली। दरवाज़ा सचमुच आधा खुला था। लकड़ी पानी सोखकर फूल चुकी थी। लोहे की कुंडी पर जंग जम चुकी थी। आरव ने धीरे से उसे धक्का दिया। चर्रर... दरवाज़ा कराहता हुआ खुला। भीतर से सीलन, पुरानी बोरियों और भीगी मिट्टी की मिली-जुली गंध बाहर आई। कमरा छोटा था, लेकिन वर्षों की धूल ने उसे और भी संकरा बना दिया था। दीवार से टिके कुछ टूटे हल, लकड़ी के औज़ार, पुराने पीतल के बर्तन और बाँस की टोकरियाँ रखी थीं।
‘मनुष्य चाहे कितनी भी दूर चला जाए, सकी स्मृतियाँ अक्सर वहीं लौटती हैं जहाँ उसकी पहली साँसों ने दुनिया को पहचाना था।’ जुलाई की पहली बारिश थम चुकी थी। आसमान पर अब भी बादलों के बिखरे हुए टुकड़े तैर रहे थे। सूरज की किरणें कभी बादलों से झाँकतीं, कभी फिर ओझल हो जातीं। गाँव की कच्ची सड़क पर पानी के छोटे-छोटे गड्ढे बने थे। कहीं बैलगाड़ी के पहियों के निशान पानी से भर गए थे, तो कहीं बच्चों के नंगे पैरों के ताज़ा पदचिह्न दिखाई दे रहे थे। भीगी हुई मिट्टी की सोंधी महक हवा में घुली थी। यह वही खुशबू थी जिसे पहचानने के लिए किसी परिचय की ज़रूरत नहीं होती। वह सीधे स्मृतियों तक पहुँचती है।लेकिन उस सड़क पर धीरे-धीरे बढ़ती काली एसयूवी के भीतर बैठा आदमी इस खुशबू से अनजान-सा था। उसकी निगाह मोबाइल की स्क्रीन पर थी।'हाँ, संजीवष्ठ मैं गाँव पहुँच गया हूँ।'दूसरी ओर से आवाज़ आई—'सर, बिल्डर वाले लोग दो दिन बाद आ रहे हैं। अगर कागज़ों पर साइन हो गए तो पहली किश्त उसी दिन ट्रांसफ़र हो जाएगी।''ठीक है।''औरष्ठ भावनात्मक मत हो जाइएगा। गाँव वाले तरह-तरह की बातें करेंगे। बिज़नेस में इमोशन नहीं चलता।'आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—'इसीलिए तो मैं पच्चीस साल बाद यहाँ आया हूँष्ठ भावनाएँ पीछे छोड़कर।'फोन कट गया।कार धीरे-धीरे गाँव के प्रवेश द्वार पर आकर रुकी। पत्थर की पुरानी शिला पर अब भी लिखा था— 'देवलपुर ग्राम पंचायत में आपका स्वागत है।' कुछ अक्षर मिट चुके थे। शिला पर काई जम गई थी। आरव ने एक नज़र उस पर डाली और फिर आगे बढ़ गया।देवलपुर।यही उसका गाँव था।यहीं उसका बचपन बीता था।यहीं उसने पहली बार बारिश में मिट्टी के घरौंदे बनाए थे। यहीं पहली बार पेड़ पर चढ़ना सीखा था। और यहीं उसने आख़री बार अपने पिता को जीवित देखा था।उसके बादष्ठवह कभी वापस नहीं आया।सड़क के दोनों ओर फैले खेतों में धान की नई रोपाई हुई थी। किसान घुटनों तक पानी में खड़े काम कर रहे थे। दूर कहीं हल की नोक मिट्टी चीर रही थी।एक बुज़ुर्ग किसान ने कार को देखा।पहले पहचान नहीं पाया।फिर अचानक उसकी आँखें फैल गईं।'अरेष्ठ ये तोष्ठ'वह कुछ कहता, इससे पहले कार आगे निकल गई। गाँव में खबर हवा से भी तेज़ फैलती है। कुछ ही मिनटों में चौपाल पर बैठे लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई।'सुना तुमने?''कौन?''मास्टर दयानंद का लड़का आया हैष्ठ''अरे, वही जो विदेश चला गया था?''हाँष्ठ वही।''इतने साल बाद?''कहते हैं ज़मीन बेचने आया है।'कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।फिर किसी ने धीमे से कहा—'बाप की मिट्टी भी बिकेगी अब?'किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया।आरव की कार पुराने पुश्तैनी घर के सामने आकर रुक गई। लोहे का बड़ा फाटक जंग से लाल पड़ चुका था। दीवारों पर बेलें चढ़ आई थीं।छत की कुछ खपरैलें टूट चुकी थीं। आँगन में उगी घास बता रही थी कि यहाँ वर्षों से किसी ने कदम नहीं रखा। आरव कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा। उसने जेब से चाबी निकाली। यह वही चाबी थी जो उसकी माँ ने मरने से पहले उसे दी थी।'कभी लौटनाष्ठ तो इस घर को खोल लेना।'तब उसने सिर हिलाया था।लेकिन लौटने में बीस साल लग गए।ताला जाम हो चुका था।काफी कोशिश के बाद जब ताला खुला तो दरवाज़ा चरमराहट के साथ खुला। भीतर बंद हवा की बासी गंध थी। धूल की महीन परत हर चीज़ पर जमी हुई थी। दीवार पर एक पुरानी घड़ी बंद पड़ी थी। उसकी सूइयाँ चार बजकर बीस मिनट पर रुकी थीं।उसी समयष्ठजिस समय उसके पिता की मृत्यु हुई थी।आरव ने अनायास घड़ी की ओर देखा।उसने कुछ नहीं कहा।लेकिन उसकी उँगलियाँ अनजाने में काँप गईं।कमरे के बीचोंबीच रखी लकड़ी की मेज़ पर अब भी एक टूटा हुआ मिट्टी का गुल्लक रखा था।आरव मुस्कराया। उसे याद आया— वह बचपन में हर रविवार उसमें दो रुपये डालता था।साइकिल खरीदने का सपना था। साइकिल कभी नहीं खरीदी जा सकी। पिता बीमार पड़ गए। गुल्लक तोड़कर दवाइयाँ खरीदी गईं।उसे लगा था कि वह बात वह भूल चुका है।लेकिन स्मृतियाँ भूलती नहीं...बस शांत बैठी रहती हैं।सामने दीवार पर पिता की तस्वीर टंगी थी।सफेद कुर्ता।हल्की मुस्कान।गंभीर आँखें।तस्वीर पर धूल जमी थी।आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।फिर नज़रें फेर लीं।'अब इन सब बातों का कोई मतलब नहींष्ठ'उसने स्वयं से कहा।लेकिन भीतर कहीं कोई आवाज़ थी—'अगर कोई मतलब नहीं, तो तू लौटकर आया ही क्यों?' उसने उस आवाज़ को अनसुना कर दिया। शाम ढलने लगी थी।बिजली अभी तक नहीं आई थी। आरव बरामदे में बैठा था। तभी बाहर से आवाज़ आई— 'कोई है?'एक दुबला-पतला वृद्ध दरवाज़े पर खड़ा था।कंधे पर पुराना गमछा। धोती। मिट्टी से सने पैर। चेहरे पर समय की लंबी रेखाएँ। 'पहचाना?'आरव ने ध्यान से देखा। फिर धीरे से बोला—'...गोपाल काका?'बूढ़े के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। 'अच्छा है... विदेश जाकर सब कुछ नहीं भूले।' आरव ने उन्हें अंदर बुलाया। कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे। गोपाल काका ने घर के चारों ओर देखा। धीरे से बोले— 'घर भी इंसान जैसा होता है बेटा...' 'जितने दिन अकेला छोड़ दो... उतना बूढ़ा हो जाता है।' आरव ने वâोई उत्तर नहीं दिया। कुछ क्षण बाद गोपाल काका ने सीधा प्रश्न किया—'सुना है... ज़मीन बेचने आए हो?' 'हाँ।' 'पक्का सोच लिया?' 'जी।' 'क्यों?'आरव ने सहज स्वर में कहा— 'यहाँ मेरा कौन है?' गोपाल काका ने उसकी आँखों में देखा। फिर बहुत शांत आवाज़ में बोले— 'यही सवाल अगर यह मिट्टी तुझसे पूछ ले... तो क्या जवाब देगा?' बरामदे में फिर सन्नाटा उतर आया। दूर कहीं बादल गरजे। पहली ठंडी हवा चली। उस हवा के साथ फिर वही सोंधी खुशबू आई। गोपाल काका ने गहरी साँस ली। 'जानता है...' उन्होंने धीरे से कहा— 'मिट्टी की सबसे बड़ी बात क्या होती है?' आरव चुप रहा। 'यह कभी किसी को रोकती नहीं...''...लेकिन जो इसे छोड़कर चला जाता है, उसे जीवन में कभी न कभी वापस बुला ज़रूर लेती है।' आरव ने मुस्कराकर बात टाल दी। 'काका, मैं भावुक होने नहीं आया हूँ।' गोपाल काका भी मुस्कराए। 'अच्छा है।' 'भावनाएँ जबरदस्ती नहीं आतीं...' 'वे तो बारिश की तरह होती हैं।' 'समय आने पर खुद बरसती हैं।'इतना कहकर वे उठ गए। जाते-जाते उन्होंने बरामदे के कोने में रखे पुराने चाक (कुम्हार का पहिया) की ओर देखा, जो वर्षों पहले आरव ने खेलते-खेलते माँगा था और बाद में यहीं छोड़ गया था। 'कल समय मिले... तो मेरे घर आ जाना।' 'क्यों?' 'कुछ दिखाना है।''क्या?' गोपाल काका मुस्कराए। 'मिट्टी...' और बिना कुछ और कहे बारिश की भीगी पगडंडी पर धीरे-धीरे चलते हुए अँधेरे में खो गए। उस रात आरव देर तक सो नहीं पाया। बरसात फिर शुरू हो गई थी। छत से कहीं-कहीं पानी टपक रहा था। रात के लगभग बारह बजे...उसे लगा जैसे आँगन में कोई चल रहा हो। पहले उसने सोचा—शायद कोई जानवर होगा। लेकिन फिर... उसे मिट्टी पर पड़ते नंगे पैरों की बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी। वह टॉर्च लेकर बाहर निकला। आँगन खाली था। सिर्फ़ बारिश थी। और भीगी मिट्टी पर बने थे, छोटे-छोटे पैरों के ताज़ा निशान। वे निशान आँगन से शुरू होकर घर के पिछले हिस्से की ओर जा रहे थे। जहाँ वर्षों से बंद पड़ा पुराना अनाजघर था। आरव कुछ पल ठिठककर उन निशानों को देखता रहा। उसने टॉर्च की रोशनी आगे डाली। अनाजघर का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। जबकि उसे पूरा विश्वास था— शाम को उसने उसे बंद देखा था।रात जैसे किसी अदृश्य रहस्य को अपनी काली चादर में छिपाए बैठी थी। बरसात की बूंदें खपरैल पर लगातार गिर रही थीं। कहीं तेज़, कहीं धीमी। उनके बीच-बीच में झींगुरों की आवाज़ सुनाई देती, फिर अचानक सब कुछ शांत हो जाता। आरव टॉर्च हाथ में लिए आँगन में खड़ा था। भीगी मिट्टी पर बने छोटे-छोटे पैरों के निशान अब भी साफ़ दिखाई दे रहे थे। वे सीधे पुराने अनाजघर तक जाते थे। जहाँ वह बचपन में जाने से डरता था। दादी कहती थीं—'पुराने घरों में चीज़ें सिर्फ़ रखी नहीं रहतीं, यादें भी वहीं बस जाती हैं।' तब वह हँस देता था। आज वही वाक्य अनायास उसके भीतर गूँज उठा। उसने टॉर्च की रोशनी दरवाज़े पर डाली। दरवाज़ा सचमुच आधा खुला था। लकड़ी पानी सोखकर फूल चुकी थी। लोहे की कुंडी पर जंग जम चुकी थी। आरव ने धीरे से उसे धक्का दिया। चर्रर... दरवाज़ा कराहता हुआ खुला। भीतर से सीलन, पुरानी बोरियों और भीगी मिट्टी की मिली-जुली गंध बाहर आई। कमरा छोटा था, लेकिन वर्षों की धूल ने उसे और भी संकरा बना दिया था। दीवार से टिके कुछ टूटे हल, लकड़ी के औज़ार, पुराने पीतल के बर्तन और बाँस की टोकरियाँ रखी थीं।टॉर्च की रोशनी धीरे-धीरे घूमती हुई कमरे के कोने तक पहुँची। वहाँ एक पुराना संदूक रखा था। उस पर मोटी धूल जमी थी। लेकिन संदूक के ठीक सामने की ज़मीन पर धूल नहीं थी। मानो किसी ने अभी-अभी वहाँ कदम रखे हों। आरव कुछ पल चुप खड़ा रहा। 'शायद कोई गाँव का बच्चा इधर आ गया होगा।' उसने खुद को समझाया। पर अगले ही क्षण उसे एहसास हुआ—इस कमरे का दरवाज़ा तो वर्षों से बंद था।तो फिर। अंदर आया कौन? उसने संदूक की ओर कदम बढ़ाए। जैसे ही हाथ बढ़ाया, बाहर बिजली चमकी। पूरे कमरे में एक पल के लिए सफेद रोशनी फैल गई। उसी क्षण उसे लगा जैसे दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा हो। वह तेजी से मुड़ा। लेकिन बाहर केवल बारिश थी। उसने गहरी साँस ली और संदूक का ढक्कन उठाया।भीतर कपड़े नहीं थे। कुछ पुराने कागज़ थे। पीले पड़ चुके।एक तांबे की छोटी डिबिया। और ऊपर रखा था। एक मिट्टी का घोड़ा। घोड़े का एक कान टूटा हुआ था। रंग लगभग मिट चुका था। आरव के हाथ जैसे वहीं ठहर गए। उसने घोड़ा उठाया।उसकी उँगलियाँ अनायास काँप गईं। यह वही घोड़ा था, जो बचपन में गोपाल काका ने उसके लिए बनाया था। उसे याद आया उसने जिद करके कहा था— 'मुझे ऐसा घोड़ा चाहिए जो असली घोड़े से भी तेज़ दौड़े।' गोपाल काका हँसे थे। 'मिट्टी के घोड़े उड़ते नहीं बेटा... लेकिन सपने ज़रूर दौड़ाते हैं।' वह घोड़ा कई वर्षों तक उसके सिरहाने रखा रहा। फिर एक दिन अचानक गायब हो गया।उसने समझा था कि टूटकर फेंक दिया गया होगा। लेकिन वह यहाँ कैसे पहुँचा? आरव ने संदूक के भीतर फिर देखा। तभी उसे एक मुड़ा हुआ कागज़ दिखाई दिया। उस पर धूल जमी थी। उसने सावधानी से खोला। अंदर केवल एक पंक्ति लिखी थी—'जिस दिन मिट्टी की कीमत रुपये से बड़ी लगे, उस दिन यह संदूक फिर खोलना।'नीचे हस्ताक्षर थे—दयानंद त्रिवेदी।उसके पिता।आरव देर तक उस कागज़ को देखता रहा।'पापा...'शब्द होंठों तक आए, मगर आवाज़ नहीं बनी। सुबह जब उसकी आँख खुली, बारिश थम चुकी थी। खिड़की से आती धूप आँगन में फैली हुई थी। मुर्गे की बाँग, मंदिर की घंटी और दूर से आती बैलों की घंटियों की आवाज़ें मिलकर एक ऐसी सुबह रच रही थीं, जिसे उसने वर्षों से नहीं सुना था। मोबाइल पर लगातार मिस्ड कॉल थे।सब संजीव के। उसने वापस फोन मिलाया।'सर! आप फोन क्यों नहीं उठा रहे थे?' 'सो रहा था।' 'आज दोपहर बिल्डर का आदमी गाँव देखने आ रहा है।''ठीक है।''और सुनिए... अगर गाँव वाले भावुक बातें करें तो ध्यान मत दीजिएगा। आखिर ज़मीन से भावनाएँ नहीं, पैसा मिलता है।'आरव ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा—'हाँ...'लेकिन यह 'हाँ' उतनी दृढ़ नहीं थी जितनी कल थी। करीब नौ बजे कोई दरवाज़े पर आया।'राम-राम!' गोपाल काका थे।उनके साथ लगभग बारह वर्ष की एक दुबली-पतली लड़की भी थी। सांवला चेहरा। बड़ी-बड़ी चमकती आँखें। दो चोटियाँ। हाथ में मिट्टी से सना कपड़ा। 'यह मेरी पोती है...' गोपाल काका ने कहा। 'चंदा।'लड़की ने दोनों हाथ जोड़ दिए।'नमस्ते।'आरव मुस्कराया।'नमस्ते।'चंदा की नज़र अचानक उसके हाथ में रखे मिट्टी के घोड़े पर पड़ी। वह उत्साह से बोली—'अरे!' 'दादाजी... आपने इसे ढूँढ़ लिया?'गोपाल काका मुस्कराए। 'नहीं...' 'इसने खुद ढूँढ़ लिया।' आरव ने आश्चर्य से पूछा—'मतलब?'गोपाल काका ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने केवल कहा— 'चलो बेटा...' 'आज तुम्हें मेरा घर दिखाता हूँ।'गोपाल काका का घर गाँव के आख़री छोर पर था। छोटा-सा आँगन। एक नीम का पेड़।बगल में मिट्टी गूँधने का चौकोर गड्ढा।और सामने... एक पुराना कुम्हार का चाक।चाक धीरे-धीरे घूम रहा था। लेकिन उसे कोई हाथ नहीं घुमा रहा था। हवा के हल्के झोंकों से वह अपनी बची हुई गति में चल रहा था। आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा। गोपाल काका ने मिट्टी का एक ढेला उठाया। उसे चाक पर रखा। फिर दोनों हाथों से उसे सहलाने लगे। कुछ ही क्षणों में वह ढेला एक सुंदर सुराही का आकार लेने लगा। आरव मंत्रमुग्ध होकर देखता रहा।'इतनी आसानी से...' उसके मुँह से निकला।गोपाल काका मुस्कराए। 'आसानी?' उन्होंने हाथ रोके बिना कहा— 'मिट्टी कभी आसानी से आकार नहीं लेती बेटा।' 'पहले उसे गूँधना पड़ता है...''फिर दबाना पड़ता है...''फिर बार-बार बिगड़ने देना पड़ता है...''तब कहीं जाकर वह घड़ा बनती है।'उन्होंने सुराही की गर्दन को हल्का-सा सहारा दिया। 'इंसान भी कुछ ऐसा ही होता है।' आरव अनायास चुप हो गया। उसे लगा— गोपाल काका मिट्टी की नहीं... उसकी बात कर रहे हैं। उसी समय आँगन के बाहर एक सफेद एसयूवी आकर रुकी। उसमें से दो आदमी उतरे। साफ़ इस्त्री किए हुए कपड़े। चमकते जूते। एक ने चारों ओर नज़र दौड़ाई और मुस्कराकर कहा— 'यही ज़मीन है?' दूसरे ने नक्शा खोलते हुए उत्तर दिया—'हाँ...''अगर यह सौदा हो गया, तो यहाँ रिसॉर्ट बनेगा।' आरव ने उनकी बात सुन ली। गोपाल काका के हाथ अचानक रुक गए। चाक धीरे-धीरे घूमता रहा... लेकिन मिट्टी का वह अधबना घड़ा हल्का-सा डगमगाया। गोपाल काका ने उसे संभाल लिया। धीरे से बोले— 'देखा बेटा...''चाक का संतुलन ज़रा-सा बिगड़े...''...तो घड़ा टूटने में देर नहीं लगती।'आरव ने पहली बार उन दोनों लोगों की ओर देखा। और न जाने क्यों— उसे लगा कि आज बात केवल ज़मीन की नहीं है। कुछ और भी दाँव पर लगा है...दोपहर का सूरज बादलों से आँख-मिचौली खेल रहा था।बारिश थम चुकी थी, लेकिन हवा में अब भी नमी घुली हुई थी। गोपाल काका के आँगन में मिट्टी की सौंधी गंध ताज़ा बनी हुई थी। चाक पर आधा बना घड़ा धीरे-धीरे घूम रहा था। उसके गोल आकार पर पानी की बूँदें चमक रही थीं। उधर सड़क के किनारे खड़ी सफेद एसयूवी से उतरे दोनों आदमी अब सीधे आरव की ओर बढ़ रहे थे।उनमें से एक ने आगे बढ़कर हाथ बढ़ाया।'मिस्टर आरव त्रिवेदी?' 'जी।' 'मैं विक्रम मल्होत्रा... क्षितिज इंप्रâा डेवलपर्स से।' दूसरे ने अपना परिचय दिया— 'और मैं कंपनी का लीगल एडवाइज़र हूँ।' आरव ने औपचारिक मुस्कान के साथ हाथ मिला लिया।गोपाल काका चुपचाप उन्हें देख रहे थे। विक्रम ने चारों ओर नज़र दौड़ाई। 'लोकेशन शानदार है। सामने पहाड़ी... पीछे नदी... और यह पूरा इलाका अभी अनछुआ है।' उसने जेब से टैबलेट निकाला और स्क्रीन पर एक थ्री-डी डिज़ाइन दिखाया।'देखिए...' कुछ ही सेकंड में स्क्रीन पर रंग-बिरंगा दृश्य उभर आया। स्विमिंग पूल।लक्ज़री कॉटेज। ग्लास रेस्टोरेंट।म्यूज़िक लाउंज। घुड़सवारी का ट्रैक। और बीच में चमकता हुआ नाम— 'अर्थ हेवन नेचर रिज़ॉर्ट'विक्रम की आवाज़ में उत्साह था।'यहाँ देश-विदेश के पर्यटक आएँगे। गाँव वालों को रोजगार मिलेगा। ज़मीन की कीमत कई गुना बढ़ जाएगी।' आरव स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए रहा। गोपाल काका ने केवल एक बार उस नक्शे को देखा। फिर अपनी नज़र वापस चाक पर टिक गई। विक्रम ने मुस्कराते हुए कहा—'आपको पता है, आपकी ज़मीन इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके बिना काम शुरू नहीं हो सकता।''क्यों?''क्योंकि यहीं मुख्य प्रवेश द्वार बनेगा।''और पीछे?' 'झील...' विक्रम ने सहजता से कहा। 'छोटी-सी कृत्रिम झील बनाएँगे।'यह सुनते ही गोपाल काका के हाथ जैसे ठिठक गए। उन्होंने पहली बार सीधा प्रश्न किया—'बेटा...' 'झील बनाओगे...' 'या जो है उसे मिटाओगे?' विक्रम ने हल्की हँसी हँसी। 'बाबा, विकास में थोड़ा-बहुत बदलाव तो करना पड़ता है।' गोपाल काका ने कोई उत्तर नहीं दिया। उनकी आँखों में ऐसी चुप्पी उतर आई, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता था। एक अनदेखा चेहरा उसी समय आँगन के बाहर से एक बूढ़ी महिला आई। सिर पर लकड़ियों का गट्ठर। वह गोपाल काका को देखकर बोली—'राम-राम।'फिर उसकी नज़र आरव पर पड़ी।वह कुछ पल उसे देखती रही।अचानक उसकी आँखें भर आईं।'अरे...' 'ये तो दयानंद मास्टर का लड़का है...' आरव ने विनम्रता से सिर झुका दिया।'जी।' महिला ने उसके सिर पर हाथ रखा।'तेरे पिता जैसे लोग अब कहाँ होते हैं बेटा...''हमारे घर में अनाज नहीं था...''तो आधी रात को बोरी रख जाते थे...''कभी किसी को पता भी नहीं चलने दिया।'आरव स्तब्ध रह गया। उसने कभी यह बात नहीं सुनी थी। महिला आगे बोली— 'मरते दम तक कहते रहे...' 'नेकी का हिसाब मत रखना।'वह धीरे-धीरे चली गई। आरव देर तक उसे जाता हुआ देखता रहा। उसे लगा— क्या वह अपने पिता को सचमुच जानता था? चंदा का स्कूल 'भैया...'चंदा ने धीरे से आवाज़ दी। 'आप मेरे साथ चलेंगे?' 'कहाँ?''स्कूल।''अभी?''हाँ...''आज छुट्टी है।' आरव मुस्कराया। 'छुट्टी में स्कूल?' चंदा ने मासूमियत से कहा—'जब स्कूल अपना हो...''...तो छुट्टी नहीं होती।'गोपाल काका ने सिर हिलाया।'जा बेटा...' 'देख आ।'गाँव का प्राथमिक विद्यालय पुराने ज़माने की इमारत था। दीवारों पर उखड़ा हुआ रंग। टूटी हुई खिड़कियाँ। आँगन में विशाल बरगद। चंदा सीधे सबसे पीछे वाले कमरे में गई। वहाँ एक टूटी मेज़ पर कुछ पुरानी किताबें रखी थीं। उसने उनमें से एक मोटी किताब निकाली। कवर पर लिखा था—'भारत के महान अभियंता'आरव ने आश्चर्य से पूछा—'तुम यह पढ़ती हो?''हाँ।''समझ आती है?''सब नहीं...''लेकिन तस्वीरें देखकर समझने की कोशिश करती हूँ।' 'बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो?'चंदा ने बिना सोचे उत्तर दिया— 'इंजीनियर।'आरव मुस्करा पड़ा। 'क्यों?''ताकि गाँव का तालाब कभी सूखे नहीं...'आरव चौंका। 'तालाब?'चंदा ने खिड़की से बाहर इशारा किया।दूर घने पेड़ों के पीछे ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा दिखाई दे रहा था। 'दादाजी कहते हैं...''उसके नीचे पूरा तालाब सो रहा है।''एक दिन उसे जगाना है।'आरव ने कुछ क्षण उसे देखा।'सोता हुआ तालाब?'चंदा ने गंभीर होकर कहा—'हर चीज़ आँखों से नहीं दिखती भैया।''कुछ बातें मिट्टी के अंदर भी रहती हैं।'उसकी आवाज़ में बचपना था।लेकिन शब्द... जैसे किसी बहुत बूढ़े आदमी के हों। पुरानी लाइब्रेरी स्कूल के एक कोने में छोटी-सी लाइब्रेरी थी। दरवाज़ा बंद था। चंदा ने जेब से चाबी निकाली। 'मास्टर जी ने दी है।'अंदर धूल से भरी अलमारियाँ थीं। किताबों की गंध पूरे कमरे में फैली थी। आरव की नज़र अचानक एक फ़ोटो पर गई। पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर। गाँव के स्कूल का उद्घाटन। बीच में उसके पिता— दयानंद त्रिवेदी।बगल में...गोपाल काका।दोनों मुस्करा रहे थे।पीछे लिखा था—'ग्राम पुस्तकालय निर्माण समिति – वर्ष १९८९' आरव ने तस्वीर उतार ली। 'ये दोनों साथ काम करते थे?' चंदा ने कहा— 'हाँ।' 'दादाजी कहते हैं...''मास्टर जी किताबें बनाते थे...''...और दादाजी बच्चों के सपने।'आरव के चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गई। एक अजीब खोज लाइब्रेरी से निकलते समय आरव की नज़र फ़र्श पर पड़ी। एक कोना बाकी जगहों से अलग था। सीमेंट नया लग रहा था। उसने झुककर हाथ फेरा। तभी उसे महसूस हुआ— नीचे कुछ खोखला है। उसने हल्के से थपथपाया। ठक... ठक...आवाज़ अलग थी। मानो नीचे कोई खाली जगह हो। 'यह कब बना?' उसने पूछा।चंदा ने कंधे उचकाए। 'पता नहीं।''मैंने तो हमेशा ऐसा ही देखा।'आरव कुछ देर वहीं खड़ा रहा।फिर बाहर निकल आया।लेकिन उसके मन में पहला सवाल जन्म ले चुका था— क्या इस गाँव में केवल ज़मीन ही नहीं... इतिहास भी दबा हुआ है? शाम का एक वाक्य सूरज ढल रहा था।
गोपाल काका फिर चाक के पास बैठे थे। आरव उनके पास आकर बैठ गया। कुछ देर दोनों चुप रहे। फिर आरव ने पूछा— 'काका...''क्या मेरे पिताजी आपसे कोई बात छिपाकर गए थे?' गोपाल काका ने चाक रोक दिया। उनकी आँखें दूर क्षितिज पर टिक गईं। बहुत देर बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा— 'हाँ...''लेकिन वह बात मुझे तुझसे कहने का अधिकार नहीं है।' 'तो किसे है?'गोपाल काका ने गहरी साँस ली। 'जिस दिन तू इस मिट्टी को बेचने नहीं...' '...समझने आएगा...''उस दिन जवाब भी मिल जाएगा।'आरव ने पहली बार महसूस किया—यह गाँव उससे कुछ छिपा नहीं रहा। वह स्वयं अभी तक देखने के लिए तैयार नहीं था। उसी समय दूर से मोटरसाइकिल की तेज़ आवाज़ आई। गाँव का चौकीदार हाँफता हुआ पहुँचा। 'गोपाल भैया!''मुसीबत हो गई!' 'बिल्डर वालों ने नदी किनारे माप-जोख शुरू कर दी है...''...और उन्हें वहाँ कुछ ऐसा मिला है...''...जिसे देखकर सब लोग घबरा गए हैं।'गोपाल काका तुरंत खड़े हो गए। आरव ने पूछा— 'क्या मिला?' चौकीदार ने काँपती आवाज़ में कहा— 'मिट्टी के नीचे... पत्थर की बहुत बड़ी दीवार...' और पहली बार... आरव को लगा कि यह कहानी केवल ज़मीन बेचने की नहीं, बल्कि दबी हुई विरासत की शुरुआत है। चौकीदार की साँसें तेज़ चल रही थीं। उसके माथे पर पसीने और बारिश की बूँदें एक-दूसरे में घुल गई थीं। 'गोपाल भैया... जल्दी चलो...' 'नदी किनारे मशीन लगाई थी...''मिट्टी हटाते ही पत्थर की दीवार निकल आई... 'ऐसी दीवार... जैसी किसी पुराने किले की होती है। 'गोपाल काका ने बिना कुछ कहे अपना गमछा उठाया और तेज़ कदमों से चल पड़े। आरव भी उनके पीछे हो लिया। गाँव की गलियों से गुजरते हुए उसने पहली बार महसूस किया कि पूरा गाँव एक साथ किसी अनजाने डर की ओर बढ़ रहा है। औरतें घरों की चौखटों पर खड़ी थीं। बच्चे दौड़ते हुए नदी की तरफ जा रहे थे। बूढ़े लोग अपने-अपने डंडों के सहारे जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा रहे थे।किसी ने धीरे से कहा—'इतने साल बाद...'दूसरे ने पूछा—'क्या सचमुच वही है?'लेकिन किसी ने खुलकर कुछ नहीं कहा। नदी के किनारे पहुँचते-पहुँचते शाम उतरने लगी थी। एक पीला जेसीबी मशीन के पास खड़ा था। उसका अगला हिस्सा मिट्टी में धँसा हुआ था। लगभग बीस फुट लंबी खुदाई हो चुकी थी। भीगी मिट्टी के बीच एक चौड़ी पत्थर की दीवार दिखाई दे रही थी। पत्थर इतने बड़े थे कि उन्हें हाथों से उठाना असंभव था। आरव नीचे उतरा। वह इंजीनियर था। उसने घुटनों के बल बैठकर दीवार को ध्यान से देखा। पत्थरों के जोड़ में चूना नहीं था।पत्थर एक-दूसरे में इस तरह फँसाए गए थे कि सदियों बाद भी अपनी जगह पर टिके थे।उसने हथेली से उन पर जमी मिट्टी हटाई। एक उभरा हुआ निशान दिखाई दिया। गोलाकार आकृति... जिसके बीच में लहरें बनी थीं। उसने माथे पर बल डाले। 'यह...'गोपाल काका ने धीरे से कहा—'जल-चिह्न।''पुराने तालाबों और बाँधों पर ऐसा निशान बनाया जाता था।' विक्रम मल्होत्रा, जो थोड़ी दूरी पर खड़ा था, मुस्करा दिया।'बाबा, पुरानी दीवार होगी।''तोड़ देंगे।''काम रुकना नहीं चाहिए।'गोपाल काका ने पहली बार उसकी ओर देखा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें ऐसी दृढ़ता थी कि आसपास खड़े लोग स्वतः शांत हो गए। 'कुछ दीवारें पत्थर की नहीं होतीं बेटा...''उन्हें तोड़ने से पहले इतिहास से इजाज़त लेनी पड़ती है।' विक्रम ने हँसकर अपने कर्मचारी की ओर देखा। 'भावुक बातें हैं।''कल सुबह तक सब साफ़ कर देना।'आरव चुप था। वह दीवार के किनारे-किनारे चलता हुआ आगे बढ़ा। कुछ दूरी पर मिट्टी थोड़ी धँसी हुई थी। उसे लगा, नीचे कोई खाली जगह है। उसने एक मज़दूर से फावड़ा लिया। धीरे-धीरे मिट्टी हटाने लगा। मज़दूर उसे हैरानी से देख रहे थे। कंपनी का खरीदार... अपने हाथों से मिट्टी खोद रहा था। कुछ ही मिनटों बाद...फावड़े से किसी धातु जैसी चीज़ टकराई।ठन...!सबकी नज़र उधर उठ गई। आरव झुक गया। हाथों से मिट्टी हटाई। एक ताँबे का गोल ढक्कन दिखाई दिया। उसने उसे सावधानी से उठाया। नीचे मिट्टी का एक बड़ा घड़ा रखा था। घड़ा पूरी तरह सुरक्षित था। गोपाल काका की आँखें फैल गईं। 'संभालकर...' आरव ने दोनों हाथों से घड़ा बाहर निकाला। उसके ऊपर कपड़े की सड़ी हुई परत बँधी थी। रस्सी लगभग गल चुकी थी। भीतर क्या है... कोई नहीं जानता था। गाँव के लोग साँस रोके खड़े थे। आरव ने कपड़ा खोला।अंदर... सोना या चाँदी नहीं था।कुछ पुराने कागज़ थे। एक कपड़े में लिपटी छोटी-सी लकड़ी की पेटी। और ऊपर रखा था...एक पीतल का गोल तमगा। उस पर उकेरा था— 'देवलपुर जल-संरक्षण समिति' और नीचे वर्ष—१९५२, गोपाल काका ने काँपते हाथों से तमगा उठाया। उनकी आँखें भर आईं। 'ये...''ये तेरे दादा का है...'आरव स्तब्ध रह गया। 'दादा का?''हाँ...''उन्होंने और गाँव वालों ने मिलकर यह बाँध बनाया था...' 'ताकि कभी अकाल पड़े तो गाँव प्यासा न रहे।' आरव ने पहली बार चारों ओर देखा। नदी, दीवार, मिट्टी... और गाँव के बूढ़ों की आँखें। उसे लगा— यह ज़मीन केवल खेत नहीं थी। यह किसी की मेहनत का इतिहास थी। उसी समय विक्रम ने तेज़ आवाज़ में कहा—'बस बहुत हुआ।' 'जो मिला है, सरकार को दे देंगे।' 'काम बंद नहीं होगा।' आरव ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा— 'काम अभी रुकेगा।' विक्रम ने भौंहें सिकोड़ लीं। 'क्या मतलब?''मतलब...'आरव ने घड़े से निकले कागज़ों को सँभालते हुए कहा— 'जब तक मुझे यह पता नहीं चल जाता कि यह जगह वास्तव में क्या है...''...यहाँ एक इंच खुदाई भी नहीं होगी।''लेकिन एग्रीमेंट—''एग्रीमेंट से पहले सच जानना ज़रूरी है।'विक्रम की मुस्कान गायब हो गई। उसे पहली बार महसूस हुआ— जिस आदमी को वह केवल एक कारोबारी समझ रहा था... वह बदलना शुरू हो चुका है। सूरज पूरी तरह डूब चुका था। सब लोग लौटने लगे। आरव ने घड़ा अपने साथ उठा लिया। गोपाल काका उसके साथ चल रहे थे। रास्ते में बहुत देर तक दोनों चुप रहे। फिर आरव ने पूछा— 'काका...''आप यह सब पहले से जानते थे?'गोपाल काका ने उत्तर देने में जल्दी नहीं की।कुछ कदम और चले।फिर बोले— 'इतना जानता था कि इस मिट्टी के नीचे सिर्फ़ पानी नहीं... लोगों की नीयत भी दबी है।''और पिताजी?' गोपाल काका रुक गए। उन्होंने आरव की ओर देखा। 'तेरे पिता...मरने से तीन दिन पहले मेरे घर आए थे।' आरव का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।'उन्होंने मुझे एक चीज़ सौंपी थी और कहा था...' अगर मेरा बेटा कभी लौटे... और सिर्फ़ ज़मीन बेचने आए... तो उसे कुछ मत देना।'आरव ने अविश्वास से पूछा— 'और अगर...?'गोपाल काका की आवाज़ भर्रा गई।'अगर वह इस मिट्टी को समझने लौटे... तब उसे वह अमानत दे देना।' इतना कहकर गोपाल काका आगे बढ़ गए। आरव वहीं खड़ा रह गया। बरसात की हल्की बूँदें फिर शुरू हो चुकी थीं। उसके हाथ में ताँबे का घड़ा था, लेकिन पहली बार उसे लगा— असली विरासत अभी उसके हाथ में नहीं आई है।रात का तीसरा पहर था। बारिश थम चुकी थी। आँगन में रखे पीतल के लोटे में चाँद की धुँधली परछाईं काँप रही थी। दूर कहीं मेंढकों की आवाज़ें थीं और नीम की डालियों से टपकती बूँदें उस सन्नाटे में समय का हिसाब लिख रही थीं। आरव बरामदे में बैठा था। उसकी आँखों के सामने वही ताँबे का घड़ा रखा था, जो शाम को नदी किनारे मिट्टी के नीचे मिला था। गोपाल काका धीरे-धीरे भीतर आए। उनके हाथ में एक पुरानी कपड़े की पोटली थी। कपड़ा इतना पुराना था कि जगह-जगह धागे उधड़ चुके थे। उन्होंने पोटली आरव के सामने रख दी।'यही है तेरे पिता की अमानत।'आरव के भीतर जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुलने लगा। 'क्या है इसमें?' गोपाल काका ने उत्तर देने के बजाय कहा— 'खोल ले... लेकिन याद रख, इसके बाद शायद तू पहले वाला आरव नहीं रहेगा।'आरव ने काँपते हाथों से गाँठ खोली।अंदर तीन चीज़ें थीं—चमड़े की जिल्द वाली एक डायरी।गाँव का हाथ से बनाया गया नक्शा।और एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा, जिस पर लिखा था— 'मेरे बेटे आरव के लिए।' कमरे में एक गहरा मौन उतर आया। आरव ने सबसे पहले पत्र उठाया। कागज़ पीला पड़ चुका था, लेकिन अक्षर साफ़ थे।'प्रिय आरव,''जब तू यह पत्र पढ़ रहा होगा, तब शायद मैं इस दुनिया में न रहूँ।' 'हो सकता है, तू मुझसे नाराज़ हो। यह भी हो सकता है कि तू कभी वापस न लौटे। अगर लौटा है, तो समझ कि इस मिट्टी ने तुझे बुलाया है, मैंने नहीं।''बेटा, इस गाँव की सबसे बड़ी दौलत खेत नहीं हैं... पानी है। और पानी केवल कुओं में नहीं रहता, लोगों की नीयत में भी रहता है। जिस दिन नीयत सूख जाती है, उस दिन सबसे पहले गाँव प्यासा होता है।' 'अगर कभी ज़मीन बेचने का विचार आए, तो पहले उस जगह को समझ लेना। क्योंकि कुछ ज़मीनें खरीदी नहीं जातीं, वे आने वाली पीढ़ियों की ओर से हमें सौंपा गया भरोसा होती हैं। मेरी एक अधूरी ज़िम्मेदारी है। अगर तुझे लगे कि तू उसे पूरा कर सकता है, तभी आगे बढ़ना। नहीं तो यह डायरी यहीं जला देना।'— तुम्हारा पिता,दयानंद।पत्र समाप्त होते ही आरव बहुत देर तक चुप बैठा रहा। उसने पहली बार महसूस किया कि पिता ने उससे कभी अपनी सफ़ाई नहीं दी। उन्होंने केवल एक ज़िम्मेदारी सौंपी थी।'काका...'उसकी आवाज़ भर्रा गई।'लोग कहते थे... पिताजी ने सरकारी पैसे खा लिए थे।' गोपाल काका ने गहरी साँस ली।'हाँ... लोग यही कहते थे।''क्या वह सच था?'गोपाल काका ने दृढ़ता से सिर हिलाया।'नहीं।''फिर उन्होंने चुप्पी क्यों साध ली?' 'क्योंकि कभी-कभी सच बोलने की कीमत पूरे गाँव को चुकानी पड़ती है।'उन्होंने धीरे-धीरे बताना शुरू किया। लगभग तीस वर्ष पहले देवलपुर लगातार तीन साल सूखे से जूझा था। तब सरकार ने वर्षाजल-संचयन योजना के लिए धन भेजा था। दयानंद त्रिवेदी ने गाँव वालों को साथ लेकर पुराने तालाब को फिर से जीवित करने का काम शुरू किया। लेकिन जैसे-जैसे काम आगे बढ़ा, कुछ प्रभावशाली लोगों की नज़र उस ज़मीन पर पड़ गई। तालाब बनता, तो वह ज़मीन कभी बिक नहीं सकती थी। तालाब मिटता, तो करोड़ों की कीमत बन सकती थी।तभी हिसाब-किताब में गड़बड़ी की गई।कागज़ बदले गए।और आरोप दयानंद त्रिवेदी पर आ गया।'उन्होंने अपना बचाव क्यों नहीं किया?' आरव ने पूछा। गोपाल काका की आँखें भीग गईं।'क्योंकि जिन लोगों ने यह सब किया था... उनमें गाँव के ही लोग थे। अगर उनवâे नाम सामने आते...तो देवलपुर दो हिस्सों में बँट जाता।''तेरे पिता ने अपनी इ़ज्ज़त खो दी... लेकिन गाँव को टूटने नहीं दिया। आरव के भीतर वर्षों से जमा हुआ क्रोध पहली बार शर्म में बदलने लगा।उसने डायरी खोली। पहले ही पन्ने पर लिखा था— 'पानी रास्ता भूल जाए, तो धरती बंजर होती है। आदमी रास्ता भूल जाए, तो इतिहास।'डायरी के अगले पन्नों में केवल हिसाब नहीं था। वहाँ बारिश के आँकड़े थे। कुओं की गहराई थी। पुराने तालाबों के नक्शे थे। हर खेत का पानी किस दिशा में बहता है, उसका विवरण था।यह किसी किसान की डायरी नहीं थी। यह एक ऐसे आदमी की डायरी थी जिसने पूरे गाँव को एक जीवित जल-मानचित्र की तरह समझा था। आरव पन्ने पलटता गया।अचानक एक पन्ने पर लाल स्याही से एक वाक्य लिखा मिला— 'अगर यह डायरी आरव तक पहुँचे, तो उसे स्कूल की लाइब्रेरी के पीछे वाली दीवार ज़रूर दिखाना।'आरव चौंक पड़ा। उसे तुरंत स्कूल का वह खोखला फ़र्श याद आया।वह गोपाल काका की ओर मुड़ा।'आपको इसके बारे में पता था?'गोपाल काका मुस्कराए।'तेरे पिता ने मना किया था।''कहा था...''जब तक आरव अपने सवाल खुद न पूछे, कोई जवाब मत देना।'बाहर अचानक तेज़ हवा चली। दरवाज़ा अपने आप खुल गया। आँगन में भीगी मिट्टी की खुशबू फिर फैल गई। आरव ने पहली बार उस खुशबू को गहरी साँस लेकर महसूस किया। उसे लगा— वर्षों से वह केवल मिट्टी को देखता था।आज पहली बार...उसने मिट्टी को समझना शुरू किया था।सुबह होने से पहले ही आरव ने निर्णय ले लिया। वह सीधे स्कूल जाएगा। लाइब्रेरी के पीछे की दीवार तोड़ी जाएगी। और अगर पिता की डायरी सच कह रही है तो वहाँ केवल ईंटें नहीं, देवलपुर का दबा हुआ इतिहास उसका इंतज़ार कर रहा होगा।सुबह अभी पूरी तरह नहीं हुई थी।पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैल रही थी। रात की बारिश के बाद हवा निर्मल थी। पीपल के पत्तों से टपकती बूँदें पहली धूप का इंतज़ार कर रही थीं। गाँव के मंदिर से आरती की धुन उठ रही थी। आरव रात भर सोया नहीं था। पिता की डायरी उसके सामने खुली पड़ी थी। लाल स्याही में लिखा वह वाक्य बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था—'स्कूल की लाइब्रेरी के पीछे वाली दीवार...'वह तेज़ कदमों से बाहर निकला। गोपाल काका पहले से तैयार बैठे थे। चंदा ने हाथ में टिफ़िन पकड़ा हुआ था।'भैया...''आज कुछ बड़ा होने वाला है न?'आरव मुस्कराया।'हाँ...''लेकिन पहले हमें सच ढूँढ़ना होगा।'लाइब्रेरी की दीवार गाँव के प्रधान, स्कूल के प्रधानाध्यापक और कुछ बुज़ुर्गों को बुला लिया गया। किसी ने विरोध नहीं किया। सबके भीतर वर्षों से दबे प्रश्न आज उत्तर माँग रहे थे। राजमिस्त्री ने हथौड़ा उठाया। पहला वार...दूसरा...तीसरा...पुरानी ईंटें धीरे-धीरे टूटने लगीं। कुछ देर बाद दीवार के भीतर लोहे का एक छोटा संदूक दिखाई दिया। सभी साँस रोके खड़े थे। ताला जंग खा चुका था। उसे तोड़ा गया। ढक्कन खुला। अंदर प्लास्टिक में लिपटी फ़ाइलें थीं। सरकारी मुहर वाले दस्तावेज़। बैंक की रसीदें। मापन रजिस्टर। और एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा। उस पर लिखा था— 'यदि मैं जीवित न रहूँ, तो इसे ग्रामसभा के सामने ही खोला जाए।'हस्ताक्षर—दयानंद त्रिवेदीगाँव में ऐसा सन्नाटा पहले कभी नहीं उतरा था। सच का खुलना प्रधान ने काँपते हाथों से पत्र पढ़ना शुरू किया। पत्र में लिखा था—'जल-संरक्षण योजना का एक भी रुपया मैंने अपने लिए नहीं लिया। पूरा हिसाब इन दस्तावेज़ों में है। जिन लोगों ने ग़लत आरोप लगाए, उनके नाम भी मेरे पास हैं। लेकिन मैं उन्हें सार्वजनिक नहीं करूँगा।'सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।पत्र आगे कहता था— 'अपराध से बड़ा अपराध है आने वाली पीढ़ियों को आपस में बाँट देना। यदि सच कभी सामने आए, तो किसी से बदला मत लेना। केवल तालाब को फिर से जीवित कर देना। वही मेरी सबसे बड़ी सफ़ाई होगी।'पत्र समाप्त होते-होते प्रधान की आवाज़ भर्रा गई। गाँव के सबसे बुज़ुर्ग रामेश्वर दादा धीरे-धीरे उठे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ दिए। 'हमने...''हमने एक ईमानदार आदमी को चोर समझ लिया।' उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उसी समय सफ़ेद एसयूवी स्कूल के बाहर आकर रुकी। विक्रम मल्होत्रा भीतर आया।'मिस्टर आरव...''अब भी समय है।''हम कीमत बढ़ा देते हैं।''तीन करोड़...''नहीं...''चार करोड़।'पूरा कमरा उसकी ओर देखने लगा।आरव ने शांत स्वर में पूछा—'अगर यह ज़मीन आपकी होती...''...और यहाँ आपके पिता की प्रतिष्ठा दबी होती...''...तो क्या आप भी बेच देते?'विक्रम कुछ क्षण चुप रहा।उसके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।आरव ने दस्तावेज़ उसकी ओर बढ़ा दिए।'आप व्यवसाय करते हैं।''मैं उसका सम्मान करता हूँ।''लेकिन यह ज़मीन अब केवल मेरी संपत्ति नहीं रही।''यह गाँव की स्मृति है।''मैं इसे नहीं बेचूँगा।'विक्रम ने धीरे से फ़ाइल बंद की।उसने पहली बार आरव की ओर सम्मान से देखा। 'काश...''हर सौदे में ऐसे लोग मिलते।'वह बिना कुछ कहे लौट गया।तालाब का पुनर्जन्मकुछ महीनों बाद...पूरा देवलपुर एक साथ काम कर रहा था।किसी के हाथ में फावड़ा था।किसी के हाथ में टोकरी।महिलाएँ मजदूरों के लिए खाना बना रही थीं। स्कूल के बच्चे पेड़ लगा रहे थे। सरकारी अधिकारियों ने दस्तावेज़ देखकर जल-संरक्षण परियोजना को फिर से मंज़ूरी दे दी। पुरानी पत्थर की दीवार को सुरक्षित रखा गया। उसी के आधार पर नया बाँध बनाया गया। बरसात आई। पहली तेज़ बारिश के बाद...सूखी धरती ने वर्षों का ऋण उतार दिया।तालाब भरने लगा।लोग किनारे खड़े देखते रहे।किसी ने ताली नहीं बजाई।किसी ने नारा नहीं लगाया।बस...कई आँखें भीग गईं।चंदा का सपनासमय बीतता गया।आरव ने शहर लौटने का निर्णय टाल दिया।उसने अपनी नौकरी छोड़ दी।लोगों ने कहा—'पागल हो गया है।'लेकिन उसे अब पहली बार लगता था कि वह अपने जीवन का सबसे समझदार निर्णय ले रहा है। पुराने पुश्तैनी घर को उसने मरम्मत करवाकर 'दयानंद जल एवं लोककला अध्ययन केंद्र' बना दिया। गोपाल काका वहीं बच्चों को मिट्टी के खिलौने बनाना सिखाने लगे। चंदा ने पढ़ाई जारी रखी। आरव हर शाम उसे गणित पढ़ाता।सालों बाद...चंदा ने इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की। जब वह कॉलेज जाने लगी, तो उसने गोपाल काका से पूछा—'दादाजी...''अगर मैं भी शहर में बस गई तो?'गोपाल काका मुस्कराए।'बेटी...''जड़ों का मतलब पेड़ को बाँधना नहीं होता।''बस इतना याद रखना...''जहाँ भी रहना...''...अपनी मिट्टी की खुशबू साथ लेकर रहना।'पाँच वर्ष बीत चुके थे।पहली बारिश हो रही थी।तालाब पानी से लबालब भरा था।किनारे बच्चे मिट्टी के घरौंदे बना रहे थे।गोपाल काका अब इस दुनिया में नहीं थे।तालाब के पास उनकी बनाई हुई एक साधारण-सी मिट्टी की प्रतिमा रखी थी—एक कुम्हार...जो चाक घुमा रहा था।आरव उस प्रतिमा के सामने खड़ा था।उसने झुककर भीगी मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई। आँखें बंद कर लीं।वही सोंधी खुशबू...जो वर्षों पहले लौटने के दिन उसे केवल एक गंध लगी थी। आज वह समझ चुका था—वह खुशबू मिट्टी की नहीं थी।वह उन हाथों की थी...जिन्होंने बिना किसी पुरस्कार की इच्छा के खेत बनाए।तालाब खोदे। घड़े गढ़े। पेड़ लगाए।और अगली पीढ़ी के लिए अपनी पहचान छोड़ गए। तभी पीछे से एक छोटी बच्ची की आवाज़ आई— 'अंकल...''यह मिट्टी इतनी अच्छी क्यों महकती है?'आरव मुस्कराया।उसने बच्ची की हथेली में थोड़ी-सी मिट्टी रखी और कहा— 'क्योंकि इसमें केवल बारिश नहीं मिली है... इसमें उन लोगों का पसीना भी मिला है, जिन्होंने अपने लिए नहीं, हमारे लिए जीवन जिया था।'बच्ची ने मिट्टी को सूँघा।मुस्कराई।और दौड़कर तालाब की ओर चली गई।आरव बहुत देर तक उसे देखता रहा।आसमान से बारिश बरस रही थी।धरती से सोंधी महक उठ रही थी।और उसे लगा—कुछ कहानियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं।वे हर बरसात में...फिर से जन्म लेती हैं। -रेखा सिंह

