चमकदार पैकेट, आकर्षक तस्वीरें और सेहतमंद होने के बड़े-बड़े दावे देखकर हम अक्सर बिना ज्यादा सोचे कोई भी पैक्ड फूड खरीद लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी उस पैकेट के पीछे लिखी छोटी-छोटी जानकारियों को ध्यान से पढ़ा है? उसमें कितनी चीनी है, नमक कितना है, वसा कितनी है और आखिर वह चीज बनी किन सामग्रियों से है? कई बार सामने का पैकेट जितना भरोसेमंद दिखाई देता है, उसकी असली कहानी उतनी ही अलग होती है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि पैकेट में क्या है, बल्कि यह भी है कि हम उसे बिना पढ़े अपनी और अपने परिवार की थाली तक क्यों पहुंचा रहे हैं?
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में चमकदार पैकेट,पैक्ड यानी पैकेट में मिलने वाला भोजन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। सुबह जल्दी निकलना हो तो पैकेट वाला नाश्ता, बच्चों के टिफिन में बिस्किट या नमकीन, दफ्तर में तुरंत तैयार होने वाला खाना, शाम की चाय के साथ स्नैक्स और सफर के दौरान तैयार खाद्य पदार्थ—सुविधा के कारण इन चीजों की मांग लगातार बढ़ रही है। बाजार में भी ऐसे उत्पादों की कोई कमी नहीं है। रंग-बिरंगे पैकेट, आकर्षक तस्वीरें और बड़े-बड़े दावे देखकर हम अक्सर उत्पाद खरीद लेते हैं। लेकिन क्या हम कभी पैकेट को पलटकर यह देखते हैं कि उसके अंदर वास्तव में क्या है?
यही वह सवाल है जिस पर अब उपभोक्ताओं को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। किसी भी पैक्ड खाद्य पदार्थ को खरीदते समय केवल उसका नाम, कीमत, स्वाद या कंपनी देखना पर्याप्त नहीं है। पैकेट के पीछे दी गई पोषण संबंधी जानकारी हमें यह समझने में मदद करती है कि उस खाद्य पदार्थ में कितनी ऊर्जा, चीनी, वसा, संतृप्त वसा, नमक या सोडियम मौजूद है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई की खाद्य लेबलिंग व्यवस्था में पैक किए गए खाद्य पदार्थों पर जरूरी जानकारी देने का प्रावधान है। इसलिए उपभोक्ता के हाथ में जानकारी मौजूद है, जरूरत सिर्फ उसे पढ़ने की है।
सामने की चमक,
पीछे का सच
किसी खाद्य पदार्थ का पैकेट उठाइए। सामने की तरफ आपको आकर्षक तस्वीरें और कई तरह के दावे दिखाई देंगे। कहीं ‘मल्टीग्रेन’, कहीं ‘प्राकृतिक’, कहीं ‘ऊर्जा से भरपूर’, तो कहीं ‘विटामिन से युक्त’ जैसे शब्द लिखे मिलेंगे। ये बातें हमारा ध्यान खींचती हैं, लेकिन किसी उत्पाद की पूरी तस्वीर नहीं बतातीं। असल जानकारी अक्सर पैकेट के पीछे होती है। वहां पोषण संबंधी तालिका में अलग-अलग पोषक तत्वों की मात्रा दी जाती है। समस्या यह है कि हममें से अधिकांश लोग उसे पढ़ने की आदत नहीं रखते। कई बार तो छोटे अक्षरों में लिखी जानकारी देखकर हम उसे छोड़ ही देते हैं। लेकिन यही छोटी-सी जानकारी हमारी खरीदारी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि पैकेट पर दी गई मात्रा पूरे पैकेट के लिए है या केवल एक निश्चित मात्रा के लिए। इसे समझे बिना बाकी आंकड़े पढ़ना भी भ्रम पैदा कर सकता है।
मान लीजिए किसी पैकेट में दो हिस्सों के बराबर भोजन है और पोषण संबंधी जानकारी केवल एक हिस्से के लिए दी गई है। यदि हम पूरा पैकेट खा लेते हैं तो शरीर में जाने वाली मात्रा उस तालिका में दिखाई गई मात्रा से दोगुनी हो सकती है। इसलिए पैकेट खरीदते समय सबसे पहला सवाल होना चाहिए—यह जानकारी कितनी मात्रा के लिए दी गई है?
मीठा सिर्फ मिठाई में नहीं
जब चीनी की बात होती है तो हमारे दिमाग में मिठाई, चॉकलेट या मीठे पेय आते हैं। लेकिन पैक्ड खाद्य पदार्थों में चीनी कई दूसरे रूपों में भी मौजूद हो सकती है। बिस्किट, नाश्ते के अनाज, स्वाद वाले पेय, सॉस और कई तैयार खाद्य पदार्थों में भी चीनी हो सकती है। इसलिए किसी उत्पाद को केवल इसलिए अच्छा नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उसके पैकेट पर अनाज, विटामिन या किसी अन्य पोषक तत्व का उल्लेख किया गया है। किसी एक अच्छी बात से पूरा उत्पाद अपने आप स्वास्थ्यवर्धक नहीं बन जाता।
उदाहरण के लिए किसी उत्पाद में कई तरह के अनाज हो सकते हैं, लेकिन उसमें चीनी या वसा की मात्रा भी अधिक हो सकती है। इसलिए पैकेट के सामने लिखी जानकारी देखने के बाद उसे पलटकर पोषण तालिका पढ़ना ज्यादा समझदारी है। बड़े अक्षरों में लिखे दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण छोटे अक्षरों में लिखे आंकड़े हो सकते हैं।
नमक रखें नजर
हम आमतौर पर नमक का ध्यान तभी रखते हैं जब खाना बहुत नमकीन लगे। लेकिन पैक्ड खाद्य पदार्थों में नमक की मात्रा हमेशा स्वाद से समझ में नहीं आती। कई तैयार खाद्य पदार्थों में सोडियम की मात्रा भी ध्यान देने योग्य हो सकती है। नमकीन, तुरंत तैयार होने वाले नूडल्स, सॉस, तैयार सूप, प्रसंस्कृत स्नैक्स और दूसरे पैक्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय पोषण तालिका में सोडियम की मात्रा देखना उपयोगी है। यहां एक बात समझना जरूरी है। पैकेट पर हमेशा ‘नमक’ शब्द नहीं लिखा होगा। कई बार जानकारी सोडियम की मात्रा के रूप में दी जाती है। इसलिए पोषण संबंधी तालिका में सोडियम दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज न करें।
आज जब लोगों में भोजन और स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, तब पैकेट पर दी गई ऐसी जानकारी को समझना भी हमारी रोजमर्रा की आदत का हिस्सा बनना चाहिए।
हर वसा खराब नहीं, लेकिन मात्रा जरूरी
वसा यानी चर्बी का नाम सुनते ही कई लोग उसे पूरी तरह खराब मान लेते हैं। लेकिन शरीर के लिए वसा की भी अपनी भूमिका है। सवाल यह है कि भोजन में इसकी मात्रा कितनी है और किस प्रकार की वसा मौजूद है। पैक्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय केवल कुल वसा की मात्रा देखना पर्याप्त नहीं है। संतृप्त वसा की मात्रा पर भी नजर डालनी चाहिए। खासकर ऐसे खाद्य पदार्थ जिन्हें हम बार-बार खाते हैं, उनके मामले में यह जानकारी उपयोगी हो सकती है। इसीलिए पैकेट खरीदते समय एक आसान आदत डालिए—कुल वसा के साथ संतृप्त वसा की मात्रा भी पढ़िए।
बच्चों के खाने पर विशेष ध्यान

पैक्ड खाद्य पदार्थों का सबसे बड़ा असर बच्चों की पसंद पर दिखाई देता है। रंग-बिरंगे पैकेट, आकर्षक तस्वीरें, कार्टून और स्वाद की अलग-अलग किस्में बच्चों को आसानी से आकर्षित करती हैं। बच्चा पैकेट देखकर अपना पसंदीदा उत्पाद चुन सकता है, लेकिन वह यह नहीं देखता कि उसमें चीनी, नमक या वसा कितनी है।
यहीं माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। अगस्त २०२६ में एफएसएसएआई ने स्कूलों में सुरक्षित और संतुलित भोजन से जुड़े नियमों में संशोधन का एक मसौदा जारी किया। इसमें अधिक मात्रा में अतिरिक्त चीनी, अतिरिक्त वसा और सोडियम वाले खाद्य पदार्थों को परिभाषित करने के प्रस्ताव शामिल हैं। ठोस और तरल खाद्य पदार्थों के लिए अलग-अलग सीमाएं प्रस्तावित की गई हैं। लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है। यह अभी मसौदा है, अंतिम लागू नियम नहीं। इसलिए इसे कानून के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। अंतिम नियम जारी होने के बाद ही उसकी वास्तविक व्यवस्था और लागू होने की तारीख स्पष्ट होगी। फिर भी यह मसौदा इस बात की ओर जरूर संकेत करता है कि बच्चों के भोजन में अत्यधिक चीनी, नमक और वसा को लेकर चिंता बढ़ रही है।
‘मल्टीग्रेन’ देखकर न खरीदें
आजकल पैकेट पर ‘मल्टीग्रेन’ जैसे शब्द बहुत आकर्षक लगते हैं। कई उपभोक्ता केवल यह शब्द देखकर किसी उत्पाद को बेहतर मान लेते हैं। लेकिन किसी उत्पाद में कई तरह के अनाज होने का मतलब यह नहीं है कि उसकी बाकी सभी पोषण संबंधी खूबियां भी बेहतर होंगी। इसी तरह ‘प्राकृतिक’, ‘विटामिन से भरपूर’ या ‘ऊर्जा देने वाला’ लिखा होना भी पूरे उत्पाद की पूरी जानकारी नहीं देता। इसलिए किसी भी पैक्ड खाद्य पदार्थ के मामले में एक बात याद रखिए—
सामने की बात पढ़िए, लेकिन फैसला पीछे की जानकारी देखकर कीजिए।
पैकेट पर लिखा ‘स्वास्थ्यवर्धक’ कितना समझें?
खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग अब केवल जानकारी देने का माध्यम नहीं रही। वह ग्राहक को आकर्षित करने का भी तरीका बन गई है। इसलिए पैकेट पर लिखे हर शब्द को उसी संदर्भ में समझना जरूरी है। किसी उत्पाद पर ‘प्राकृतिक’ लिखा हो सकता है, किसी पर ‘अनाज से भरपूर’, किसी पर ‘विटामिन युक्त’। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उस उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा कम ही होगी। यही कारण है कि उपभोक्ता को एक ही दावे पर भरोसा करने के बजाय पूरी पोषण संबंधी जानकारी देखनी चाहिए। अगर किसी पैकेट पर लिखा है कि इसमें अनाज की कई किस्में हैं, तो अच्छी बात हो सकती है। लेकिन साथ ही यह भी देखना चाहिए कि उसमें चीनी, संतृप्त वसा और सोडियम कितना है। एक अच्छी बात पूरे उत्पाद की गारंटी नहीं होती।
क्या पैक्ड फूड पूरी तरह छोड़ दें?
यह भी सही नहीं होगा कि हर पैक्ड खाद्य पदार्थ को नुकसानदायक मान लिया जाए। आधुनिक जीवन में पैक्ड खाद्य पदार्थ सुविधा देते हैं और कई लोगों के लिए जरूरी भी हो सकते हैं। असली सवाल यह है कि हम उनका इस्तेमाल कितनी बार करते हैं और उनकी पोषण संबंधी जानकारी क्या कहती है। घर का संतुलित भोजन, फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ रोज की भोजन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहना चाहिए। पैक्ड भोजन का चुनाव करते समय उसकी मात्रा और नियमितता पर भी ध्यान देना चाहिए। कभी-कभार कोई पैक्ड स्नैक खाना और रोजाना भोजन का बड़ा हिस्सा ऐसे खाद्य पदार्थों से पूरा करना दो अलग बातें हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘पैकेट वाला खाना खाएं या नहीं?’ बल्कि सवाल होना चाहिए—‘क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं और कितनी बार खा रहे हैं?’
लेबल पढ़ना बनाएं आदत
आज से एक छोटा-सा प्रयोग शुरू किया जा सकता है। जब भी आप कोई बिस्किट, नमकीन, नाश्ते का अनाज, तुरंत तैयार होने वाला भोजन, सॉस या दूसरा पैक्ड खाद्य पदार्थ खरीदें तो उसे सीधे टोकरी में डालने से पहले कुछ सेकंड पैकेट के पीछे की जानकारी पढ़ें। पहले मात्रा देखिए। फिर चीनी, सोडियम, कुल वसा और संतृप्त वसा की जानकारी देखिए। इसके बाद सामग्री की सूची और समाप्ति तिथि देखिए। शुरुआत में यह काम थोड़ा मुश्किल लग सकता है, लेकिन कुछ ही दिनों में यह आदत बन जाएगी। धीरे-धीरे आपको दो समान उत्पादों में अंतर समझ आने लगेगा और आप केवल विज्ञापन या पैकेजिंग देखकर निर्णय नहीं लेंगे। यही जागरूक उपभोक्ता बनने की पहली सीढ़ी है।
आने वाला समय और ज्यादा जागरूकता का है
खाद्य पदार्थों की लेबलिंग को लेकर चर्चा लगातार बढ़ रही है। इसका कारण साफ है—उपभोक्ता जानना चाहता है कि वह जो खरीद रहा है, उसमें वास्तव में क्या है। एफएसएसएआई की मौजूदा व्यवस्था पैक्ड खाद्य पदार्थों पर जरूरी जानकारी देने का आधार देती है। वहीं २०२६ में बच्चों के भोजन से संबंधित प्रस्तावित बदलावों ने अतिरिक्त चीनी, वसा और सोडियम की मात्रा को लेकर चर्चा को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
लेकिन किसी भी प्रस्ताव को अंतिम नियम समझने से बचना चाहिए। नियमों की स्थिति समय के साथ बदल सकती है और अंतिम अधिसूचना ही यह तय्ा करती है कि कौन-सा प्रावधान कब और किस रूप में लागू होगा। इसलिए फिलहाल उपभोक्ता के पास सबसे आसान और सबसे प्रभावी उपाय है—जानकारी पढ़ना।
पैकेट देखकर नहीं, पढ़कर खरीदें
हमारे सामने रोज सैकड़ों उत्पाद आते हैं। हर पैकेट हमें कुछ न कुछ बताने की कोशिश करता है। कोई स्वाद का भरोसा देता है, कोई ऊर्जा का, कोई अनाज का, तो कोई स्वास्थ्य का। लेकिन उपभोक्ता के रूप में हमें यह समझना होगा कि पैकेट का आकर्षक सामने वाला हिस्सा पूरी कहानी नहीं है।
असली कहानी पोषण संबंधी जानकारी में छिपी है।
अगली बार जब आप कोई पैक्ड खाद्य पदार्थ खरीदें तो कुछ सेकंड रुकिए। पैकेट पलटिए और सात चीजें देखिए—मात्रा, चीनी, सोडियम, संतृप्त वसा, ऊर्जा, सामग्री और समाप्ति तिथि। हो सकता है कुछ सेकंड की यह आदत आपकी खरीदारी की पूरी सोच बदल दे। आखिरकार स्वस्थ भोजन का फैसला केवल रसोई में नहीं होता। वह बाजार में भी होता है—जब हम किसी पैकेट को उठाते हैं और तय करते हैं कि उसे अपनी थाली में जगह देनी है या नहीं।
इसलिए अगली बार पैकेट उठाइए, उसे पढ़िए और अगर जरूरत लगे तो उससे कह दीजिए—‘मुझे मत खाओ!’

