ताजा खबरें
September 29, 2026

कैंसर की दवाओं पर इतनी बड़ी कीमत क्यों?

कैंसर की दवा

₹2,700 की दवा का MRP ₹27,000 सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

कैंसर का नाम सुनते ही किसी भी परिवार के सामने सबसे पहले बीमारी के इलाज की चिंता आती है, लेकिन इसके साथ जुड़ा आर्थिक बोझ भी कम गंभीर नहीं है। लंबे समय तक चलने वाला इलाज, महंगी जांच, अस्पताल का खर्च और लगातार खरीदनी पड़ने वाली दवाएं कई परिवारों की आर्थिक स्थिति को हिला देती हैं। ऐसे माहौल में जब किसी जरूरी कैंसर दवा की कीमत को लेकर यह सामने आए कि रिटेलर तक वह करीब ₹2,700 में पहुंचती है, जबकि पैकेट पर उसका MRP ₹27,000 लिखा है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर दवा की कीमत तय होने की प्रक्रिया क्या है और मरीज को इतनी बड़ी रकम क्यों चुकानी पड़ती है? यही सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने भी आया। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर को लेकर अदालत ने गंभीर चिंता जताई और पूछा कि जब किसी दवा की रिटेलर कीमत और अधिकतम खुदरा कीमत के बीच इतना बड़ा अंतर है, तो इसकी वजह क्या है। सुनवाई के दौरान सामने आए उदाहरण में ₹2,700 की PTR यानी Price to Retailer कीमत के मुकाबले ₹27,000 का MRP बताया गया। दोनों के बीच करीब दस गुना का अंतर है। अदालत ने इस तरह के मूल्य अंतर पर सवाल उठाते हुए दवा की कीमतों को मरीजों की पहुंच के भीतर रखने और मूल्य निर्धारण व्यवस्था में पारदर्शिता की जरूरत पर ध्यान दिलाया।

₹2,700 से ₹27,000 तक कैसे पहुंचती है कीमत?

इस पूरे मामले को समझने के लिए पहले PTR और MRP का अंतर समझना जरूरी है। PTR यानी Price to Retailer वह कीमत है जिस पर दवा रिटेलर तक पहुंचती है, जबकि MRP यानी Maximum Retail Price वह अधिकतम खुदरा कीमत है जो दवा के पैकेट पर दर्ज होती है। यदि किसी दवा का PTR ₹2,700 और MRP ₹27,000 है, तो दोनों कीमतों के बीच ₹24,300 का अंतर दिखाई देता है। प्रतिशत के हिसाब से MRP, PTR से करीब 900 प्रतिशत अधिक है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस अंतर का मतलब यह नहीं है कि पूरे ₹24,300 किसी एक कंपनी या दुकानदार का मुनाफा है। दवा के निर्माण से लेकर मरीज तक पहुंचने के बीच निर्माता, स्टॉकिस्ट, वितरक, रिटेलर और कई बार अस्पताल जैसी अलग-अलग कड़ियां होती हैं। इन स्तरों पर अलग-अलग लागत और मार्जिन जुड़ सकते हैं। इसलिए दवा की कीमत को केवल निर्माता की लागत और MRP के बीच के अंतर से समझना सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि इस पूरी मूल्य श्रृंखला में प्रत्येक स्तर पर कितना मार्जिन जुड़ रहा है और अंततः मरीज कितनी कीमत चुका रहा है।

कैंसर का इलाज और परिवार की आर्थिक चुनौती

कैंसर का उपचार अक्सर एक बार की दवा खरीद तक सीमित नहीं रहता। मरीज की बीमारी, स्टेज और डॉक्टर द्वारा तय उपचार के आधार पर कई बार लंबे समय तक दवाओं और अन्य चिकित्सा सेवाओं की जरूरत पड़ती है। ऐसे में यदि किसी एक दवा की कीमत हजारों रुपये अधिक हो जाए तो उसका असर पूरे इलाज के खर्च पर पड़ सकता है। कम और मध्यम आय वाले परिवारों के लिए यह समस्या और गंभीर हो सकती है। कई परिवारों के लिए कैंसर का इलाज बचत खत्म होने, कर्ज लेने या संपत्ति बेचने जैसी परिस्थितियों तक पहुंच सकता है। इसलिए जीवनरक्षक दवाओं की कीमत केवल बाजार का विषय नहीं रह जाती। यह स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच और मरीज की आर्थिक क्षमता से भी जुड़ जाती है। यही वजह है कि दवा की कीमत में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है। मरीज और उसके परिवार को यह समझने का अधिकार होना चाहिए कि जिस दवा के लिए वे हजारों रुपये दे रहे हैं, उसकी कीमत किस आधार पर तय हुई है और क्या उसी उपचार के लिए कोई प्रभावी और कम कीमत वाला विकल्प उपलब्ध है।

क्या हर कैंसर दवा की कीमत सरकार तय करती है?

ऐसा नहीं है कि देश में हर दवा की कीमत एक ही तरीके से नियंत्रित होती है। भारत में Drugs (Prices Control) Order यानी DPCO के तहत अनुसूचित दवाओं पर मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था है। वहीं गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में कीमत निर्धारण की व्यवस्था अलग है। इसी वजह से दवाओं के अलग-अलग वर्गों में मूल्य नियंत्रण और कीमत बढ़ाने के नियम भी अलग हो सकते हैं। यहीं से बहस और जटिल हो जाती है। सरकार को एक तरफ मरीजों के लिए दवाएं सस्ती और उपलब्ध रखनी हैं, वहीं दूसरी तरफ दवा कंपनियों के सामने अनुसंधान, उत्पादन, क्लिनिकल ट्रायल, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण जैसी लागत भी होती है। खासकर नई और आधुनिक कैंसर दवाओं के मामले में अनुसंधान की लागत काफी अधिक हो सकती है। इसलिए केवल MRP कम करने का सवाल पर्याप्त नहीं है; पूरी मूल्य निर्धारण व्यवस्था को समझना जरूरी है।

कैंसर दवाओं का बाजार भी बड़ा हो रहा है

कैंसर से जुड़ी दवाओं का बाजार भारत में लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। PharmaTrac के अप्रैल 2026 के आंकड़ों के अनुसार Anti-Neoplastics यानी कैंसर-रोधी दवाओं का भारतीय बाजार MAT आधार पर करीब ₹5,897 करोड़ था। इस सेगमेंट में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बाजार के बढ़ने का एक कारण कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की बढ़ती संख्या और आधुनिक उपचार पद्धतियां हैं। बायोलॉजिकल दवाओं, लक्षित उपचार और अन्य नई चिकित्सा तकनीकों के आने से इलाज के विकल्प बढ़े हैं, लेकिन इनमें से कुछ उपचार बेहद महंगे भी हो सकते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ नई दवाओं के विकास का नहीं, बल्कि उनकी मरीज तक पहुंच का भी है।

अस्पताल में कीमत और बढ़ सकती है

दवा की कीमत का सवाल सिर्फ मेडिकल स्टोर तक सीमित नहीं है। कई मरीज अस्पतालों में ही दवाएं खरीदते हैं। अस्पताल की खरीद व्यवस्था, सप्लाई चैन, स्टोरेज, प्रशासनिक लागत और अन्य शुल्क अंतिम बिल को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए किसी दवा का पैकेट देखकर उसकी वास्तविक लागत और मरीज द्वारा चुकाई गई राशि की पूरी तस्वीर समझना हमेशा संभव नहीं होता। यही कारण है कि कैंसर उपचार में दवा की खरीद कीमत, PTR, MRP और मरीज से वसूली गई वास्तविक कीमत के बीच अंतर को पारदर्शी बनाना जरूरी है। यदि इन सभी स्तरों की जानकारी स्पष्ट हो तो मरीज और उसके परिवार के लिए उपचार की वास्तविक आर्थिक योजना बनाना आसान हो सकता है।

जेनेरिक दवाओं का विकल्प कितना उपयोगी?

महंगी ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले जेनेरिक विकल्प कई बार कम कीमत पर उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन कैंसर की हर दवा के मामले में केवल नाम देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई दूसरा विकल्प पूरी तरह समान है या नहीं। दवा का salt, dosage, formulation, strength और मरीज की विशेष स्थिति महत्वपूर्ण होती है। इसलिए मरीज को अपनी तरफ से महंगी दवा बंद करने या दूसरी दवा शुरू करने के बजाय डॉक्टर से पूछना चाहिए कि क्या उसी उपचार का कोई गुणवत्तापूर्ण और कम कीमत वाला विकल्प उपलब्ध है। सरकारी अस्पतालों, जन औषधि केंद्रों और अन्य योजनाओं में उपलब्ध विकल्पों के बारे में भी जानकारी ली जा सकती है, जहां लागू हो।

सरकार और नियामकों के सामने बड़ी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट के सामने आया ₹2,700 और ₹27,000 का उदाहरण दवा मूल्य निर्धारण की पूरी व्यवस्था पर विचार करने का अवसर देता है। सवाल यह है कि क्या जीवनरक्षक दवाओं में कीमतों की निगरानी और अधिक प्रभावी बनाई जा सकती है? क्या दवा के निर्माण से लेकर मरीज तक पहुंचने के बीच अलग-अलग स्तरों के मार्जिन को ज्यादा पारदर्शी बनाया जा सकता है? और क्या मरीजों को यह जानकारी आसानी से मिलनी चाहिए कि उनकी दवा का अधिकतम मूल्य किस आधार पर तय हुआ है? इन सवालों का जवाब केवल अदालत या सरकार से नहीं मिलेगा। इसमें दवा कंपनियों, अस्पतालों, डॉक्टरों, फार्मेसी नेटवर्क और नियामक संस्थाओं सभी की भूमिका है। मरीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इलाज की जरूरत के समय उसे ऐसी कीमत का सामना न करना पड़े जिसे वह वहन ही न कर सके।

असली सवाल मरीज की पहुंच का है

कैंसर की दवा महंगी क्यों है, इसका जवाब केवल एक कारण में नहीं छिपा है। अनुसंधान और उत्पादन की लागत, नई तकनीक, पेटेंट, वितरण व्यवस्था, अस्पतालों और फार्मेसियों के मार्जिन तथा सरकारी मूल्य नियंत्रण—कई कारक मिलकर दवा की अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं। लेकिन इन सभी कारणों के बावजूद यह सवाल अपनी जगह बना रहता है कि जीवन बचाने वाली दवा आम मरीज की पहुंच से बाहर कितनी दूर जा सकती है। ₹2,700 की PTR और ₹27,000 के MRP का उदाहरण इसी सवाल को सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता ने दवा की कीमतों पर एक महत्वपूर्ण बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। अब चुनौती यह है कि ऐसी व्यवस्था बने जिसमें दवा उद्योग के लिए अनुसंधान और कारोबार संभव रहे, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज के लिए जरूरी दवा आर्थिक रूप से असंभव न बन जाए। क्योंकि कैंसर से लड़ रहे मरीज के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “मेरी दवा इतनी महंगी क्यों है?” बल्कि व्यवस्था का लक्ष्य यह होना चाहिए कि उसे समय पर सही दवा मिले और उसकी कीमत उसके परिवार की आर्थिक क्षमता के भीतर रहे।

स्वर्णिम मुंबई न्यूज़लेटर 👋

हमारी डिजिटल पत्रिका और नई कहानियों की जानकारी सीधे अपने ईमेल पर पाएं।

हम स्पैम नहीं करते! अधिक जानकारी के लिए हमारी प्राइवेसी पॉलिसी पढ़ें।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ठाणे के ‘गायमुख मंदिर’ का रहस्य और इसकी अनोखी गाथा! समुद्र की तूफानी लहरों का ख़ौफ़नाक नज़ारा! 5-Star होटलों का काला सच और FSSAI के नियम Monsoon Eye Care Tips अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर तो हो गया… लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण हैं।