आज का युवा अपने भविष्य को संवारने के लिए वर्षों तक पढ़ाई करता है। माता-पिता अपनी जमा-पूँजी बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं, कई परिवार कर्ज लेकर उन्हें उच्च शिक्षा दिलाते हैं और युवा भी बेहतर नौकरी की उम्मीद में दिन-रात मेहनत करते हैं। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन रोजगार नहीं! किसी के हाथ में इंजीनियरिंग की डिग्री है, तो किसी ने एमबीए, स्नातकोत्तर या अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम पूरा किया है। इसके बावजूद जब यही युवा नौकरी की तलाश में दर-दर भटकता है, तब एक गंभीर सवाल खड़ा होता है—यदि शिक्षा बेहतर भविष्य का रास्ता है, तो शिक्षित युवाओं को रोजगार पाने के लिए इतनी कठिनाइयों का सामना क्यों करना पड़ रहा है? रोजगार की समस्या केवल नौकरी मिलने या न मिलने तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध परिवारों की आर्थिक स्थिति, युवाओं के आत्मविश्वास और देश की विकास यात्रा से है। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब कोई युवा लंबे समय तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता रहता है या निजी कंपनियों के चक्कर लगाता है, तो उसके सामने आर्थिक दबाव भी बढ़ने लगता है। परिवार की उम्मीदें, दोस्तों के साथ तुलना और समाज के सवाल उसके मानसिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं। कई युवा अपनी योग्यता के अनुरूप अवसर न मिलने पर कम वेतन वाली नौकरी स्वीकार कर लेते हैं, जबकि कुछ अपनी पढ़ाई से बिल्कुल अलग क्षेत्र में काम करने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत परेशानी नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर को भी उजागर करती है।
इस समस्या की एक बड़ी वजह शिक्षा और उद्योग जगत की जरूरतों के बीच तालमेल की कमी है। कई पाठ्यक्रमों में सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि नौकरी के लिए व्यावहारिक अनुभव, तकनीकी कौशल, संवाद क्षमता और समस्या का समाधान करने की योग्यता भी आवश्यक होती है। दूसरी ओर, कंपनियाँ अक्सर अनुभव वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में नए स्नातकों के सामने विरोधाभासी स्थिति पैदा होती है—अनुभव के बिना नौकरी मिलना कठिन है और नौकरी के बिना अनुभव प्राप्त करना मुश्किल। इस अंतर को दूर करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों में इंटर्नशिप, प्रशिक्षण, उद्योगों के साथ साझेदारी और व्यावहारिक शिक्षा को अधिक महत्व देना होगा।सरकारी नौकरियों की सीमित रिक्तियाँ और प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी युवाओं के सामने बड़ी चुनौती हैं। लाखों उम्मीदवार कुछ पदों के लिए आवेदन करते हैं, लेकिन सभी को अवसर मिलना संभव नहीं होता। भर्ती प्रक्रिया में देरी, परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव या परिणामों की प्रतीक्षा जैसी परिस्थितियाँ युवाओं के कई वर्ष प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि सरकारी नौकरी की इच्छा रखना गलत नहीं है, लेकिन रोजगार के अवसर केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं रह सकते।
निजी क्षेत्र, लघु एवं मध्यम उद्योग, कृषि आधारित व्यवसाय, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाएँ, डिजिटल सेवाएँ और स्थानीय उद्यम भी रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह भी समझना जरूरी है कि देश में रोजगार की चर्चा करते समय केवल बेरोजगारी की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। नौकरी की गुणवत्ता, वेतन, सामाजिक सुरक्षा, काम के घंटे और स्थायित्व भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई युवा लंबे समय तक काम करने के बावजूद अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा है, तो केवल उसके रोजगार में होने से समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता। युवाओं को ऐसे अवसर चाहिए जिनमें मेहनत के अनुरूप आय, आगे बढ़ने की संभावना और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियाँ उपलब्ध हों।
इस दिशा में शिक्षा व्यवस्था, सरकार, उद्योग जगत और समाज—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। शैक्षणिक संस्थानों को रोजगार बाजार में बदलती जरूरतों के अनुसार पाठ्यक्रम विकसित करने चाहिए। युवाओं को केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें व्यावहारिक कौशल, डिजिटल साक्षरता और स्वरोजगार के अवसरों से भी परिचित कराया जाना चाहिए। सरकार को रोजगार सृजन से जुड़ी योजनाओं के परिणामों का नियमित मूल्यांकन करना चाहिए, जबकि उद्योगों को प्रशिक्षित युवाओं के लिए प्रवेश स्तर की नौकरियाँ और प्रशिक्षण कार्यक्रम बढ़ाने चाहिए। छोटे व्यवसायों और नए उद्यमों को प्रोत्साहन देने से भी स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। युवाओं को भी बदलती परिस्थितियों के अनुसार नए कौशल सीखने, उपलब्ध अवसरों की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर अपने कार्यक्षेत्र में बदलाव करने के लिए तैयार रहना होगा। लेकिन सारी जिम्मेदारी युवाओं पर डाल देना उचित नहीं होगा। हर युवा के पास महँगे प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने, बड़े शहरों में रहकर नौकरी खोजने या बिना आय के लंबे समय तक तैयारी करने की आर्थिक क्षमता नहीं होती। इसलिए कौशल विकास और रोजगार सहायता ऐसी होनी चाहिए जो आर्थिक रूप से कमजोर तथा छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं तक भी आसानी से पहुँच सके।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को केवल डिग्री और अंकों के Dााधार पर नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने की उसकी क्षमता के आधार पर भी देखा जाए। माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा इसलिए दिलाते हैं ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें, परिवार का सहारा बनें और सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। यदि शिक्षित युवा ही अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित रहें, तो यह स्थिति समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए चिंता का विषय है। शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करना समय की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक है। डिग्रियाँ युवाओं की मेहनत और ज्ञान का प्रमाण हैं, लेकिन उन्हें वास्तविक अवसरों में बदलने के लिए प्रभावी नीतियों, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और रोजगार सृजन की आवश्यकता है। देश की प्रगति का अर्थ केवल अधिक शिक्षित नागरिक होना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों को अपनी योग्यता के अनुरूप काम और सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलना भी है। आखिर सवाल सिर्फ यह नहीं कि युवा कितने पढ़े-लिखे हैं, बल्कि यह भी है कि उनकी शिक्षा उनके भविष्य को कितना सुरक्षित और आत्मनिर्भर बना पा रही है। -मंगला नटराजन
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