भारत में संत, साधु और आश्रम केवल धार्मिक संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि हमारी सामाजिक और आध्यात्मिक परंपरा का भी हिस्सा रहे हैं। सदियों से लोग आश्रमों में शांति, मार्गदर्शन और सेवा की भावना लेकर जाते रहे हैं। देश में आज भी हजारों धार्मिक संस्थाएं शिक्षा, भोजन, चिकित्सा और जरूरतमंदों की मदद जैसे महत्वपूर्ण काम करती हैं। लेकिन जब इन्हीं आश्रमों से संदिग्ध मौत, यौन शोषण, हिंसा, आर्थिक अनियमितता या अनुयायियों के शोषण की खबरें सामने आती हैं, तो सवाल केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था पर नहीं रुकता। सवाल यह उठता है कि आखिर श्रद्धा और अंधभक्ति के बीच की सीमा कहां खत्म हो रही है और आस्था के नाम पर चलने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था कितनी मजबूत है? हाल ही में वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज से जुड़े साधक दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारीशरण की मौत ने इसी सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है। रिपोर्टों के अनुसार उनकी मौत २५ सितंबर को आश्रम से जुड़ी परिस्थितियों में चौथी मंजिल से गिरने के बाद हुई। पुलिस कमरे से मिले मोबाइल, डायरी, खून के निशान और अन्य साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच कर रही है तथा आश्रम में रहने वाले लोगों से पूछताछ और उनके पते-नाम का सत्यापन भी किया जा रहा है। यानी अभी जांच जारी है और इस घटना को हत्या या आत्महत्या कहकर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि ऐसी घटना अपने पीछे कई गंभीर सवाल छोड़ जाती है—आश्रम में रहने वाले लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? किसी व्यक्ति की मौत या दुर्घटना होने पर पुलिस और परिवार को सूचना देने की प्रक्रिया क्या है? वहां आने-जाने वालों का रिकॉर्ड कितना पारदर्शी है? और क्या किसी धार्मिक संस्था के भीतर होने वाली घटनाओं की स्वतंत्र जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें धर्म और आध्यात्मिक प्रभाव की आड़ में गंभीर अपराधों के आरोप लगे और अदालतों में मामले पहुंचे। आसाराम बापू का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। २०१८ में जोधपुर की अदालत ने एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद २०२३ में गांधीनगर की अदालत ने एक महिला अनुयायी से बलात्कार और अन्य अपराधों के मामले में भी उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इन मामलों में अदालतों के सामने गवाहों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। आश्रमों में अपराध के सवाल का एक दूसरा पहलू भी है—सिर्फ गुरु या बाबा ही नहीं, बल्कि उनके आसपास बना पूरा तंत्र। कई बार किसी प्रभावशाली धार्मिक व्यक्ति के पास बड़ी संख्या में अनुयायी, प्रबंधन टीम, आर्थिक संसाधन और निजी व्यवस्था होती है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति शिकायत करना चाहता है तो उसके सामने सामाजिक दबाव, परिवार से दूरी, प्रतिष्ठा का डर या गुरु के प्रति अटूट विश्वास जैसी कई बाधाएं हो सकती हैं। आसाराम से जुड़े एक मामले में अभियोजन पक्ष ने बड़ी संख्या में गवाह पेश किए थे और आश्रम की व्यवस्था से जुड़े लोगों की भूमिका भी अदालत के सामने आई थी। यह बताता है कि किसी संस्था की जवाबदेही केवल उसके प्रमुख व्यक्ति तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की भी जांच जरूरी हो सकती है।
हाल की एक और घटना इस चिंता को और गंभीर बनाती है। सितंबर २०२६ में झारखंड हाईकोर्ट ने एक आश्रम में महिला के साथ हुए गैंगरेप के मामले में दोषी व्यक्ति की ३० साल की सजा को निलंबित करने से इनकार किया और आश्रम की फंडिंग, गतिविधियों तथा वहां हुई अन्य घटनाओं की जांच का आदेश दिया। अदालत ने आश्रम की सुनसान स्थिति और वहां आने वाली महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की। यह मामला भी यही सवाल सामने रखता है कि किसी धार्मिक या आध्यात्मिक स्थान को केवल उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी से बाहर नहीं रखा जा सकता। यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि कुछ आश्रमों या कुछ बाबाओं से जुड़े मामलों के आधार पर सभी संतों और धार्मिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करना भी गलत होगा। देश में ऐसे अनेक आश्रम और आध्यात्मिक संस्थान हैं जहां लोग सेवा, शिक्षा, भोजन और सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं। समस्या धर्म या आध्यात्मिकता नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी व्यक्ति की लोकप्रियता और अनुयायियों की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि लोग उसके हर शब्द को अंतिम सत्य मानने लगते हैं और सवाल पूछना भी अपराध जैसा महसूस होने लगता है।
श्रद्धा व्यक्ति को विनम्र बना सकती है, लेकिन अंधभक्ति उसे विवेकहीन भी बना सकती है। किसी गुरु का सम्मान करना अलग बात है और उसके हर निर्णय को बिना सवाल स्वीकार करना अलग। धार्मिक आस्था व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन कानून सभी के लिए समान होना चाहिए। किसी आश्रम में रहने वाला व्यक्ति भी उतना ही नागरिक है जितना बाहर रहने वाला व्यक्ति। उसे सुरक्षा, स्वास्थ्य, परिवार से संपर्क, स्वतंत्र इच्छा और कानून का संरक्षण मिलना चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि बड़े आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं के लिए पारदर्शिता और सुरक्षा के कुछ स्पष्ट मानक हों। वहां रहने वाले लोगों का उचित रिकॉर्ड हो, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र व्यवस्था हो, गंभीर घटना होने पर पुलिस को तत्काल सूचना दी जाए, आर्थिक लेन-देन में पारदर्शिता हो और किसी शिकायतकर्ता पर दबाव न बनाया जा सके। धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन कानून से ऊपर कोई संस्था न हो।
सबसे जरूरी बात यह है कि हमें बाबा या आश्रम के नाम से नहीं, बल्कि उसके काम और व्यवस्था से प्रभावित होना चाहिए। लोकप्रियता प्रमाणपत्र नहीं है और भीड़ सत्य की गारंटी नहीं। अगर किसी संत की शिक्षाएं सेवा, मानवता और सदाचार की बात करती हैं तो उस संस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही भी उसी भावना का हिस्सा होनी चाहिए। प्रेमानंद महाराज से जुड़े शिष्य की मौत की सच्चाई पुलिस जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही सामने आएगी। उससे पहले किसी पर आरोप लगाना उचित नहीं है। लेकिन इस घटना को केवल एक सनसनीखेज खबर बनाकर भूल जाना भी सही नहीं होगा। यह हमें एक बड़ा सामाजिक प्रश्न पूछने का अवसर देती है—जहां लोग अपना विश्वास, पैसा, समय और कभी-कभी अपनी पूरी जिंदगी सौंप देते हैं, वहां उनकी सुरक्षा और अधिकारों की जिम्मेदारी कौन तय करेगा? आस्था हमारी ताकत है, लेकिन आस्था के साथ विवेक भी जरूरी है। गुरु का सम्मान अपनी जगह है और कानून का सम्मान अपनी जगह। स्वस्थ समाज वही है जहां मंदिर, मठ और आश्रम श्रद्धा के केंद्र बने रहें, लेकिन वहां रहने या आने वाला कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों, सुरक्षा और न्याय के सवाल पर अकेला न पड़े।’
-मंगला नटराजन
आस्था के नाम पर आश्रमों में अपराध!

