बर्फ में खिलता प्यार , श्रीनिवास मुसकराया। उसने महसूस किया कि जिंदगी में कुछ मुलाकातें संयोग नहीं होतीं। वे किसी लंबे इंतजार का जवाब होती हैं। मसूरी की वह बर्फ कब की पिघल चुकी थी, लेकिन उस बर्फ में जन्मा प्यार अब उनकी जिंदगी में अपनी गर्माहट पा चुका था। श्रीनिवास ने पहली बार समझा कि प्रेम हमेशा किसी फिल्मी अंदाज में नहीं आता। कभी वह एक अनजान टैक्सी में आपके बगल वाली सीट पर बैठा होता है। कभी वह पहाड़ों की खामोशी में आपकी बात सुन रहा होता है। कभी वह बर्फ का एक छोटा-सा गोला बनकर आपके कंधे पर गिरता है और कभी वह बिना कोई वादा किए आपकी जिंदगी में इस तरह उतर जाता है कि उसके बाद बाकी सारी जिंदगी उसी मुलाकात के अर्थ तलाशती रहती है।
दिसंबर की वह सुबह दिल्ली से बिल्कुल अलग थी। बर्फ में खिलता प्यार मसूरी की हवा में ऐसी ठंड घुली थी, जो ऊनी कपड़ों की कई परतों के बावजूद शरीर को कंपा देती थी। होटल की खिड़की के शीशे पर भाप की हल्की परत जम गई थी और बाहर पहाड़ों पर उतरती धुंध सब कुछ अपने भीतर समेटे हुए थी। श्रीनिवास ने खिड़की का पर्दा थोड़ा हटाकर बाहर देखा। सड़क लगभग खाली थी। दूर किसी दुकान के सामने जलती पीली रोशनी धुंध के बीच किसी छोटे से दीपक की तरह दिखाई दे रही थी। उसने घड़ी देखी और मुसकरा दिया। मसूरी आने का उसका असली मकसद पूरा हो चुका था। दिल्ली से वह कंपनी के एक जरूरी काम के सिलसिले में आया था और उसे लगा था कि कम से कम दो दिन लगेंगे, लेकिन काम उम्मीद से पहले ही निबट गया था। अब उसके पास पूरा एक दिन था—बिना किसी मीटिंग, फोन कॉल या फाइल के।
श्रीनिवास ने खुद को कई दिनों बाद हलका महसूस किया। वह उन लोगों में से था जिन्होंने जिंदगी को कभी हल्के में नहीं लिया था। माता-पिता की इकलौती संतान था। पिता रिटायर हो चुके थे। दो छोटी बहनें थीं, जिनकी पढ़ाई और भविष्य की जिम्मेदारी धीरे-धीरे उसके कंधों पर आ गई थी। शायद इसी वजह से श्रीनिवास ने बचपन से ही अपने लिए एक लक्ष्य बना लिया था—उसे सफल होना था। पढ़ाई पूरी होते ही एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई थी। कुछ ही वर्षों में वह कंपनी के भरोसेमंद कर्मचारियों में गिना जाने लगा था। लोग उसके व्यक्तित्व से जल्दी प्रभावित होते थे। बातचीत करने का उसका अंदाज ऐसा था कि सामने वाला कुछ ही मिनटों में सहज हो जाता।
कई लड़कियों ने उससे दोस्ती बढ़ाने की कोशिश भी की थी, मगर श्रीनिवास हमेशा एक सीमा बनाए रखता। उसका मानना था कि प्रेम और रिश्तों में पड़कर आदमी अपनी मंजिल से भटक जाता है। शायद इसलिए उसकी जिंदगी में सब कुछ था—अच्छी नौकरी, पैसा, सम्मान, परिवार—लेकिन प्रेम नहीं था। और उसे लगता था कि उसे इसकी जरूरत भी नहीं है। उसे क्या मालूम था कि मसूरी की वह यात्रा उसकी इस धारणा को हमेशा के लिए बदलने वाली है।
अगली सुबह नाश्ता करने के बाद वह माल रोड की तरफ निकल गया। मगर वहां पहुंचते ही उसे पता चला कि टैक्सी और बसों की हड़ताल है। ‘ओह! आज ही होना था!’ वह कुछ देर तक खड़ा सोचता रहा। उसने सोचा था कि दिनभर मसूरी घूमेगा, कैमरे में तस्वीरें लेगा और शाम तक होटल लौट आएगा, मगर अब घूमना मुश्किल लग रहा था। तभी एक टैक्सी चालक उसके पास आकर धीरे से बोला, ‘साहब, घूमना है?’ श्रीनिवास ने उसे देखा।
‘हां, लेकिन आज तो हड़ताल है।’
ड्राइवर मुसकराया, ‘हड़ताल आम लोगों के लिए है साहब, हमारी टैक्सी चल रही है। आपको घुमा देंगे।’ ‘कहां-कहां?’ ‘जहां आप कहें। लेकिन एक मैडम के साथ टैक्सी शेयर करनी पड़ेगी। वह भी मसूरी घूमना चाहती हैं।’
श्रीनिवास ने सामने देखा। कुछ दूरी पर एक लड़की खड़ी थी। गहरे भूरे रंग का ऊनी कोट, गले में सफेद मफलर और हाथ में कैमरा। वह कभी सड़क की तरफ देखती, कभी मोबाइल की स्क्रीन। ड्राइवर ने उसकी ओर इशारा किया। ‘
वही मैडम हैं।’
श्रीनिवास कुछ पल उसे देखता रहा। लड़की ने भी उसी समय उसकी ओर देखा। दोनों की आंखें मिलीं। लड़की ने हल्की-सी मुसकराहट दी और नजरें हटा लीं।
‘चलो,’
श्रीनिवास ने कहा, ‘कोई दिक्कत नहीं।’ ड्राइवर दोनों को टैक्सी तक ले गया।
‘मैडम, ये साहब दिल्ली से हैं।’
लड़की ने मुसकराते हुए कहा, ‘हैलो।
मैं मनामी।’ ‘श्रीनिवास।’ ‘दिल्ली?’ ‘जी।’ ‘मैं लखनऊ की हूं, लेकिन दिल्ली में रहती हूं।’ ‘अच्छा।’ बस इतना ही परिचय हुआ।
दो अजनबी एक टैक्सी में बैठे और गाड़ी माल रोड से आगे बढ़ गई। कुछ देर तक दोनों खिड़की से बाहर देखते रहे। मसूरी की सड़कें धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही थीं।
तभी ड्राइवर ने कहा, ‘सर, अगर बर्फ देखनी है तो धनौल्टी चलते हैं।
सुबह से वहां बर्फ गिर रही है। आज मौसम साफ नहीं है, लेकिन अगर किस्मत अच्छी हुई तो खूब बर्फ मिलेगी।’ श्रीनिवास ने मनामी की तरफ देखा। ‘आप चलना चाहें तो?’
मनामी ने कुछ क्षण सोचा, फिर बोली,
‘मुझे बर्फ बहुत पसंद है।’ ‘तो फिर चलिए।’ गाड़ी धनौल्टी की तरफ बढ़ गई। रास्ता जितना आगे बढ़ता गया, पहाड़ उतने ही खूबसूरत होते गए। देवदार के लंबे पेड़ सड़क के दोनों तरफ प्रहरी की तरह खड़े थे। नीचे गहरी घाटियां थीं और उनके ऊपर बादलों की सफेद परतें तैर रही थीं। मनामी खिड़की से बाहर देखते हुए अचानक बोली, ‘आपको डर नहीं लगता?’
‘किससे?’
‘इतनी गहरी खाई से।’ श्रीनिवास ने नीचे देखा और तुरंत खिड़की से नजर हटा ली। ‘लगता है। बहुत लगता है।’
मनामी हंस पड़ी।
‘तो फिर इतनी बहादुरी क्यों दिखा रहे हैं?’ ‘आपके सामने डरना अच्छा थोड़ी लगेगा।’ मनामी ने उसकी तरफ देखा। दोनों कुछ क्षण चुप रहे। फिर वह मुसकरा दी। ‘आप बातों में काफी तेज हैं।’ ‘लोग ऐसा ही कहते हैं।’
‘और खुद के बारे में भी?’
‘मैं सिर्फ जरूरी बातें मानता हूं।’
‘अच्छा? अभी जो आपने कहा, वह जरूरी था?’ श्रीनिवास भी हंस पड़ा। उस छोटे-से संवाद ने दोनों के बीच की औपचारिकता तोड़ दी। अब बातचीत सहज होने लग्ाी। मनामी ने बताया कि वह दिल्ली के एक स्कूल में हिंदी पढ़ाती है। उसे किताबें पढ़ना और घूमना पसंद है। वह जब भी मौका मिलता, पहाड़ों की ओर निकल जाती। ‘अकेली?’
श्रीनिवास ने पूछा।
‘हां।’ ‘परिवार को चिंता नहीं होती?’
‘होती है। लेकिन उन्हें पता है कि मैं अपनी जिंदगी खुद संभाल सकती हूं।’
श्रीनिवास ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक अजीब आत्मविश्वास था। वह खूबसूरत थी, मगर उसकी खूबसूरती से ज्यादा आकर्षित करने वाली चीज उसकी आंखों में दिखाई देने वाली दृढ़ता थी।
‘आप?’ मनामी ने पूछा।
‘मैं?’ ‘आप अकेले घूमने क्यों आए?’ श्रीनिवास कुछ देर चुप रहा। ‘काम के लिए आया था। काम जल्दी खत्म हो गया तो सोचा मसूरी देख लूं।’
‘मतलब आप घूमने नहीं, काम करने आए थे?’ ‘जी।’ ‘और अब?’ ‘अब लगता है कि असली यात्रा तो आज शुरू हुई है।’ मनामी ने उसे देखा, लेकिन इस बार उसने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी रोक दी। ‘यहां से नजारा बहुत अच्छा है।’ दोनों नीचे उतर आए। ठंडी हवा ने उनका स्वागत किया। सामने पहाड़ों की कतारें धुंध में खो रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वे जमीन पर नहीं, बादलों के बीच खड़े हों। मनामी ने हाथों को मफलर में छिपाते हुए कहा,
‘अगर इस वक्त एक गरम चाय मिल जाए तो मजा आ जाए।’ श्रीनिवास ने सामने छोटी-सी दुकान देखी।
‘आपकी इच्छा पूरी हो सकती है।’
दोनों चाय की दुकान पर बैठ गए। चाय के प्याले से उठती भाप उनके चेहरों के सामने धुंध की तरह तैर रही थी। मनामी ने पहला घूंट लिया और आंखें बंद कर लीं। ‘वाह!’ ‘इतनी अच्छी?’
‘ठंड में साधारण चाय भी अमृत लगती है।’ श्रीनिवास उसे देखता रहा।
‘क्या हुआ?’ मनामी ने पूछा।
‘कुछ नहीं।’ ‘फिर ऐसे क्यों देख रहे हैं?’ ‘बस सोच रहा था कि कुछ लोग छोटी-छोटी चीजों में भी खुशियां ढूंढ लेते हैं।’ मनामी की आंखों में अचानक गंभीरता उतर आई।
‘और कुछ लोग?’
‘वे बड़ी चीजें हासिल करते-करते छोटी खुशियां खो देते हैं।’ मनामी ने उसकी तरफ गौर से देखा।
‘आप उन्हीं में से हैं?’ श्रीनिवास ने चाय का प्याला नीचे रख दिया। ‘शायद।’ यह पहला मौका था जब उसने किसी अनजान व्यक्ति के सामने अपने भीतर की बात कही थी।
धनौल्टी पहुंचते-पहुंचते बर्फबारी तेज हो गई। चारों तरफ सफेदी फैल गई थी। देवदार के पेड़ों की शाखाओं पर बर्फ जम चुकी थी। सड़क पर चलते लोगों के जूते बर्फ में धंस रहे थे। मनामी की खुशी का ठिकाना नहीं था। वह बर्फ में उतर गई।
‘श्रीनिवास!’ ‘हां?’ ‘इधर आइए।’

‘क्यों?’ ‘बस आइए।’ वह उसके पास गया। मनामी ने हथेली में बर्फ उठाई और अचानक उसके कंधे पर फेंक दी। श्रीनिवास चौंक गया। ‘अच्छा! तो यह बात है।’ मनामी हंसते हुए भागी। श्रीनिवास ने भी बर्फ उठाई और उसके पीछे दौड़ा। कुछ मिनटों तक दोनों बच्चों की तरह बर्फ में खेलते रहे। फिर मनामी अचानक फिसल गई। श्रीनिवास ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों कुछ पल उसी स्थिति में खड़े रहे। मनामी का हाथ उसके हाथ में था। बर्फ उनके आसपास गिर रही थी और जैसे दुनिया अचानक शांत हो गई थी। मनामी की आंखें श्रीनिवास की आंखों से मिली हुई थीं। कुछ क्षण बाद उसने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया।
‘थैंक यू।’ ‘आप ठीक हैं?’ ‘हां।’ ‘पक्का?’ ‘हां।’ लेकिन दोनों जानते थे कि उस छोटे-से स्पर्श ने उनके बीच कुछ बदल दिया था।
शाम होने लगी। तभी ड्राइवर ने आकर कहा, ‘साहब, अब वापस निकलना ठीक नहीं होगा। सड़क पर बर्फ जम रही है। रात यहीं रुकना पड़ेगा।’ पास के गेस्टहाउस में पूछताछ की गई। केवल एक कमरा खाली था। मनामी ने श्रीनिवास की तरफ देखा। श्रीनिवास ने तुरंत कहा, ‘अगर आपको परेशानी हो तो मैं कोई और इंतजाम देखता हूं।’ मनामी ने बाहर गिरती बर्फ की तरफ देखा। ‘
इतनी रात में?’ वह कुछ क्षण चुप रही। ‘ठीक है,’ उसने आखिर कहा, ‘कमरा बड़ा है न?’ गेस्टहाउस के मालिक ने बताया कि कमरे में दो बेड हैं। श्रीनिवास ने राहत की सांस ली। कमरे में पहुंचकर दोनों ने अपना सामान अलग रखा। बीच में एक छोटी मेज खिसका दी गई। बाहर बर्फ लगातार गिर रही थी। कमरे के भीतर हीटर की गर्मी थी, लेकिन दोनों के मन में एक अजीब-सी हलचल थी। रात काफी हो गई। मनामी किताब लेकर बैठी थी। श्रीनिवास मोबाइल पर कुछ देखने का नाटक कर रहा था। आखिर उसने पूछ ही लिया, ‘आप इतनी चुप क्यों हैं?’ मनामी ने किताब बंद कर दी। ‘सोच रही हूं।’
‘क्या?’
‘आज सुबह मैं आपको जानती भी नहीं थी।’ ‘अब?’ ‘अब लगता है कि आज का दिन बहुत छोटा था।’ श्रीनिवास ने उसकी ओर देखा। ‘कभी-कभी कुछ घंटे भी सालों जितने लगते हैं।’ मनामी मुसकराई। ‘आप हमेशा ऐसे ही बोलते हैं?’ ‘नहीं।’ ‘तो फिर?’ ‘शायद आपके साथ ही बोलने का मन करता है।’ मनामी ने नजरें झुका लीं। कुछ देर बाद मनामी ने पूछा,
‘आपने कभी किसी को प्यार किया?’ श्रीनिवास ने खिड़की से बाहर देखा। ‘नहीं।’ ‘क्यों?’ ‘डरता था।’ ‘प्यार से?’ ‘नहीं। खुद को खो देने से।’ मनामी धीरे से बोली, ‘सच्चा प्यार खुद को खोना नहीं सिखाता। वह खुद से मिलना सिखाता है।’ श्रीनिवास ने उसकी ओर देखा। उसे लगा जैसे वह लड़की केवल उससे बात नहीं कर रही थी, बल्कि उसके भीतर छिपे उस आदमी से बात कर रही थी जिसे उसने वर्षों से खुद से भी छिपाकर रखा था।
देर रात मनामी ने धीरे से पूछा, ‘श्रीनिवास, क्या आपको कभी लगता है कि जिंदगी में सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी कुछ अधूरा रह जाता है?’ श्रीनिवास ने कुछ पल सोचा।
‘हां।’ ‘क्या?’ उसने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। श्रीनिवास ने पहली बार बिना किसी झिझक के कहा, ‘शायद कोई ऐसा इंसान, जिसके सामने आपको कुछ साबित न करना पड़े।’ मनामी की आंखों में एक हल्की नमी उतर आई। ‘और अगर वह इंसान अचानक मिल जाए?’ ‘तो शायद उसे जाने नहीं देना चाहिए।’ कमरे में कुछ देर खामोशी रही। बाहर बर्फ गिरती रही और भीतर दो दिल पहली बार अपने-अपने डर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे।
सुबह जब श्रीनिवास की आंख खुली तो मनामी खिड़की के पास खड़ी थी। बाहर धूप बर्फ पर पड़ रही थी और पूरा पहाड़ चांदी की तरह चमक रहा था।
‘गुड मॉर्निंग,’ मनामी ने पीछे मुड़कर कहा। ‘गुड मॉर्निंग।’ कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
‘आज वापस जाना है,’ मनामी ने कहा। श्रीनिवास के चेहरे की मुसकराहट हल्की पड़ गई। ‘हां।’ वह नहीं चाहता था कि यह यात्रा खत्म हो, लेकिन जिंदगी में हर खूबसूरत चीज को रोक पाना संभव नहीं होता।
नाश्ते के बाद वे टैक्सी में बैठ गए। वापसी के रास्ते दोनों पहले की अपेक्षा ज्यादा चुप थे। श्रीनिवास के मन में बार-बार एक सवाल उठ रहा था—क्या वह मनामी से उसका नंबर मांगे? लेकिन वह डर रहा था। कहीं वह मना कर दे तो? मसूरी पहुंचते-पहुंचते दोनों ने एक-दूसरे की तरफ कई बार देखा, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा।
आखिर टैक्सी रुक गई। मनामी ने अपना बैग उठाया। ‘तो… फिर मिलेंगे।’
‘जरूर।’ ‘कहां?’ ‘दिल्ली में।’ मनामी मुसकराई। ‘आपको तो मेरा नंबर भी नहीं मालूम।’ श्रीनिवास कुछ पल चुप रहा। ‘लेकिन आपका शहर पता है।’ ‘लखनऊ?’ ‘नहीं। दिल्ली।’ ‘दिल्ली बहुत बड़ी है।’ ‘फिर भी ढूंढ लूंगा।’ मनामी की आंखों में हल्की चमक आई। ‘अगर मैं मिलना चाहूं तो?’ श्रीनिवास ने धीरे से कहा, ‘तो मुझे ढूंढना नहीं पड़ेगा।’ मनामी कुछ क्षण उसे देखती रही, फिर मुसकराकर चली गई। श्रीनिवास बहुत देर तक उसे जाते हुए देखता रहा।
दिल्ली लौटने के बाद जिंदगी फिर वही हो गई। सुबह ऑफिस, दिनभर मीटिंग, शाम तक काम और रात को घर। लेकिन अब हर चीज में उसे कुछ कमी महसूस होती। कभी चाय पीते हुए उसे धनौल्टी की वह दुकान याद आती, कभी खिड़की से बाहर देखते हुए उसे पहाड़ दिखाई देने लगते अौर सबसे ज्यादा याद आतीं मनामी की आंखें। उसके पास उसका नंबर नहीं था।
सोशल मीडिया पर भी उसे खोजने की कोई पक्की जानकारी नहीं थी। उसके पास केवल एक नाम था और एक शहर। फिर एक शाम उसने अचानक ऑफिस से निकलते समय कार सरोजनी नगर की ओर मोड़ दी। उसे खुद नहीं पता था कि वह वहां क्यों जा रहा है। शायद उम्मीद में, शायद मूर्खता में या शायद उस भावना के कारण जिसे वह इतने वर्षों से अपने जीवन से दूर रखता आया था। सरोजनी नगर की भीड़ में चलते हुए वह खुद पर हंस रहा था। ‘एक लड़की से दो दिन में प्यार हो गया और अब उसे ढूंढने निकल पड़ा हूं।’ उसे लगा कि शायद वह पागल हो गया है। तभी उसकी नजर एक पुरानी किताबों की दुकान पर पड़ी। वह बिना किसी खास वजह के अंदर चला गया और अगले ही क्षण उसके कदम वहीं रुक गए। अलमारी के सामने मनामी खड़ी थी। उसके हाथ में एक किताब थी।
श्रीनिवास कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। मनामी ने मुड़कर उसे देखा। पहले उसकी आंखों में आश्चर्य आया, फिर धीरे-धीरे एक मुसकराहट फैल गई। ‘आप?’ श्रीनिवास ने कहा,
‘मैंने कहा था न… ढूंढ लूंगा।’ मनामी ने किताब बंद कर दी। ‘लेकिन मुझे लगा था आप मजाक कर रहे थे।’
‘मैं भी यही सोच रहा था।’ ‘क्या?’
‘कि शायद मैं मजाक ही कर रहा हूं। लेकिन दिल ने मेरी बात नहीं मानी।’ मनामी चुप हो गई। उसकी आंखें नम-सी हो आईं। ‘मैं भी कई दिनों से सोच रही थी कि शायद आपने मुझे याद ही नहीं किया होगा।’ ‘आपने मुझे याद किया?’ मनामी ने कुछ क्षण उसे देखा और मुसकराकर बोली, ‘नहीं।’ श्रीनिवास का चेहरा उतर गया। मनामी हंस पड़ी। ‘बहुत ज्यादा किया।’ दोनों हंस पड़े। बाहर दिल्ली की भीड़ उसी तरह भाग रही थी। हॉर्न बज रहे थे। लोग अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त थे। लेकिन उन दोनों के लिए उस पल जैसे समय थम गया था। कुछ देर बाद मनामी ने पूछा, ‘चाय?’ श्रीनिवास मुसकराया, ‘इस बार चाय मैं पिलाऊंगा।’ वे दोनों सड़क के किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान पर बैठ गए। मनामी ने चाय का प्याला हाथ में लिया। श्रीनिवास उसे देखता रहा। ‘क्या हुआ?’ उसने पूछा।
‘कुछ नहीं।’ ‘फिर ऐसे क्यों देख रहे हैं?’ श्रीनिवास ने धीमे से कहा, ‘सोच रहा हूं, अगर उस दिन मसूरी में टैक्सी की हड़ताल नहीं होती तो?’ मनामी ने कुछ क्षण सोचा। ‘तो शायद हम कभी नहीं मिलते।’ ‘और अगर ड्राइवर ने हमें साथ टैक्सी शेयर करने को नहीं कहा होता?’ ‘तब भी नहीं।’ ‘और अगर धनौल्टी में बर्फ नहीं पड़ती?’ मनामी मुसकराई। ‘तब शायद हम एक-दूसरे को इतना याद भी नहीं करते।’ श्रीनिवास ने चाय का प्याला नीचे रखा। ‘तो क्या मान लें कि उस दिन बर्फ नहीं, किस्मत गिर रही थी?’ मनामी ने उसकी ओर देखा। ‘शायद।’ ‘और अब?’ मनामी ने धीरे से अपना हाथ मेज पर रखा। श्रीनिवास ने कुछ क्षण उसे देखा और फिर उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। इस बार मनामी ने हाथ नहीं हटाया। ‘अब?’ उसने फिर पूछा। मनामी की आंखों में वही चमक थी जो धनौल्टी की बर्फ में दिखाई दी थी। ‘अब शायद हमें किस्मत पर छोड़ने के बजाय खुद अपनी कहानी लिखनी चाहिए।’
श्रीनिवास मुसकराया। उसने महसूस किया कि जिंदगी में कुछ मुलाकातें संयोग नहीं होतीं। वे किसी लंबे इंतजार का जवाब होती हैं। मसूरी की वह बर्फ कब की पिघल चुकी थी, लेकिन उस बर्फ में जन्मा प्यार अब उनकी जिंदगी में अपनी गर्माहट पा चुका था। श्रीनिवास ने पहली बार समझा कि प्रेम हमेशा किसी फिल्मी अंदाज में नहीं आता। कभी वह एक अनजान टैक्सी में आपके बगल वाली सीट पर बैठा होता है। कभी वह पहाड़ों की खामोशी में आपकी बात सुन रहा होता है। कभी वह बर्फ का एक छोटा-सा गोला बनकर आपके कंधे पर गिरता है और कभी वह बिना कोई वादा किए आपकी जिंदगी में इस तरह उतर जाता है कि उसके बाद बाकी सारी जिंदगी उसी मुलाकात के अर्थ तलाशती रहती है। मनामी ने चाय का आखिरी घूंट लिया। ‘चलें?’ श्रीनिवास ने पूछा, ‘कहां?’ वह मुसकराई, ‘जहां हमारी कहानी आगे बढ़े।’ श्रीनिवास ने उसका हाथ थाम लिया। इस बार उसे किसी मंजिल की जल्दी नहीं थी, क्योंकि उसे पहली बार महसूस हुआ था कि कुछ यात्राएं मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं, किसी अपने तक पहुंचने के लिए होती हैं। उनकी असली यात्रा शायद उसी दिन शुरू हुई थी, जब मसूरी की बर्फ में दो अजनबी मिले थे—और अब वह मुलाकात उनकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत कहानी बन चुकी थी।
– के.ज्योति

