मुंबई के मैंग्रोवफोटो साभार: Priyaflorenceshah / Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)

तटीय मैंग्रोव क्षेत्र में 17.41% की गिरावट, मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन स्थलों और समुद्री जैव विविधता पर मंडराया खतरा

मुंबई की पहचान केवल ऊंची इमारतों, तेज रफ्तार जिंदगी और समुद्र तटों से ही नहीं, बल्कि उसके आसपास फैले मैंग्रोव यानी कांदळवन के जंगलों से भी है। ये जंगल शहर के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करते हैं। लेकिन अब एक नए अध्ययन ने मुंबई के तटीय पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2006 से 2024 के बीच मुंबई के तटीय मैंग्रोव क्षेत्र में लगभग 17.41 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह बदलाव केवल हरियाली के कम होने का संकेत नहीं, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी और तटीय जीवन के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती भी है।

18 वर्षों में कितना घटा मैंग्रोव क्षेत्र?

31 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित Times of India की रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ताओं ने मुंबई के मैंग्रोव क्षेत्र में हुए बदलावों का अध्ययन उपग्रह चित्रों और मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से किया। अध्ययन में वर्ष 2006, 2012, 2018 और 2024 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के अनुसार, मैंग्रोव क्षेत्र का मानचित्रित विस्तार 2006 में लगभग 75.07 वर्ग किलोमीटर था, जो 2024 में घटकर लगभग 61.99 वर्ग किलोमीटर रह गया। शोधकर्ताओं ने इस अवधि में लगभग 30.20 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव क्षेत्र के नुकसान और 11.32 वर्ग किलोमीटर नए विस्तार का अनुमान लगाया। कुल मिलाकर लगभग 18.89 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध कमी सामने आई। अध्ययन में मुंबई के वर्सोवा-माध द्वीप-मालाड, गोरेगांव क्षेत्र के आसपास के तटीय हिस्सों, ठाणे क्रीक और शिवड़ी-चेंबूर-ट्रॉम्बे जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया।

मैंग्रोव केवल पेड़ नहीं, समुद्र की जीवनरेखा हैं

मैंग्रोव के पेड़ समुद्र और जमीन के बीच एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक कड़ी हैं। उनकी जटिल जड़ें छोटी मछलियों, झींगों, केकड़ों और अनेक जलीय जीवों को आश्रय देती हैं। कई समुद्री जीवों के लिए ये जंगल प्रजनन और शुरुआती विकास के सुरक्षित स्थान होते हैं। यही कारण है कि मैंग्रोव का नुकसान मछुआरा समुदायों के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है। हालांकि, अध्ययन में मछलियों की संख्या या मछली पकड़ने की मात्रा में हुई वास्तविक गिरावट का प्रत्यक्ष आकलन नहीं किया गया है। इसलिए मैंग्रोव क्षेत्र में कमी और मछली उत्पादन पर उसके प्रभाव के बीच संबंध को समझने के लिए अलग से मत्स्य संबंधी अध्ययन आवश्यक होंगे।

मुंबई को बाढ़ और समुद्री जोखिमों से बचाने में अहम भूमिका

मैंग्रोव जंगल समुद्र की लहरों की तीव्रता कम करने, तटीय मिट्टी को स्थिर रखने और कटाव को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। वे प्राकृतिक रूप से पानी और तलछट को रोकने तथा तटीय पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में भी योगदान देते हैं। मुंबई जैसे घनी आबादी वाले तटीय शहर के लिए इन जंगलों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। शहर में भारी बारिश, जलभराव और समुद्र से जुड़े जोखिम लगातार चिंता का विषय बने रहते हैं। ऐसे में मैंग्रोव क्षेत्र का कमजोर होना तटीय सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। हालांकि, किसी विशेष क्षेत्र में बाढ़ के जोखिम पर मैंग्रोव की कमी का कितना प्रभाव पड़ा है, इसे स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक अध्ययन से ही स्पष्ट किया जा सकता है।

संरक्षण के प्रयासों पर भी उठ रहे सवाल

मैंग्रोव संरक्षण के लिए केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। नए पौधों का जीवित रहना, समुद्र के पानी का प्राकृतिक आवागमन, मिट्टी की स्थिति और आसपास के पर्यावरण का संतुलन भी जरूरी है। अध्ययन में उद्धृत एक पूर्व आकलन के अनुसार, मुंबई में मैंग्रोव पुनर्स्थापन के लिए चुने गए 25 स्थलों में से 13 पर वर्ष 2022 तक अपेक्षित वृद्धि नहीं देखी गई थी। यह स्थिति बताती है कि संरक्षण की सफलता को केवल पौधारोपण के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। यह भी देखना होगा कि लगाए गए पौधे विकसित होकर स्वस्थ जंगल का रूप ले रहे हैं या नहीं।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी

मुंबई में आवास, सड़क, परिवहन और बुनियादी ढांचे की जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन विकास की कीमत यदि प्राकृतिक सुरक्षा कवच को कमजोर करके चुकानी पड़े, तो उसका असर भविष्य में शहर को ही झेलना पड़ सकता है। मैंग्रोव क्षेत्र की सुरक्षा के लिए अवैध कटाई और अतिक्रमण पर प्रभावी निगरानी, वैज्ञानिक पुनर्स्थापन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है। मुंबई के मैंग्रोव जंगलों में दर्ज गिरावट एक चेतावनी है। सवाल केवल इतना नहीं कि शहर ने कितनी हरियाली खोई, बल्कि यह भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए समुद्र, तट और जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में आज क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

स्रोत: Greater Mumbai

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