कोल्हापुर के तिलारी क्षेत्र ने फिर चौंकाया वैज्ञानिकों को
महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट यानी सह्याद्रि की जैव विविधता में एक और घोंघे की नई प्रजाति जुड़ गई है। कोल्हापुर जिले के तिलारीनगर स्थित जंगलों में वैज्ञानिकों ने जमीन पर रहने वाले एक बेहद छोटे घोंघे की नई प्रजाति की पहचान की है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘Dicharax tilariensis’ रखा गया है। आकार में महज कुछ मिलीमीटर का यह जीव सामान्य नजरों से आसानी से दिखाई भी नहीं देता, लेकिन इसकी विशिष्ट शारीरिक और कवच संरचना ने वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। यह खोज तिलारी क्षेत्र के स्वप्नवेल पॉइंट के आसपास स्थित अर्ध-सदाबहार जंगलों में की गई। शोधकर्ताओं ने समुद्र तल से लगभग 700 से 800 मीटर की ऊंचाई पर इस प्रजाति के नमूने एकत्र किए। अध्ययन के दौरान कुल 12 नमूनों का वैज्ञानिक परीक्षण किया गया। इनके कवच की बनावट, उस पर मौजूद धारियों और शरीर की संरचना का दूसरी समान प्रजातियों से तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद इसे एक अलग प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई।
क्या है इस छोटे घोंघे की नई प्रजाति की खासियत?
इस घोंघे की सबसे खास पहचान इसका विशिष्ट आकार वाला कवच है। इसके कवच पर उभरी हुई धारियां और अंदरूनी संरचना इसे इसी समूह की दूसरी प्रजातियों से अलग बनाती हैं। यह नम जंगलों में जमीन पर गिरे पत्तों, सड़ी हुई लकड़ियों, नम मिट्टी और जैविक पदार्थों के बीच रहता है। इसका छोटा आकार और छिपकर रहने की प्रकृति इसे सामान्य वन्यजीव सर्वेक्षणों में आसानी से पहचानना मुश्किल बनाती है।
शोधकर्ताओं ने किया विस्तृत अध्ययन
इस नई प्रजाति की पहचान करने वाले शोधकर्ताओं में अमृत भोसले, तेजस ठाकरे और अक्षय खांडेकर शामिल हैं। उनका शोध 24 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘Journal of Conchology’ में प्रकाशित हुआ। वैज्ञानिकों ने इस घोंघे की तुलना पश्चिमी घाट और दक्षिण भारत में पाई जाने वाली इसी समूह की अन्य प्रजातियों से की। अध्ययन में इसके कवच और शरीर की कई विशिष्ट विशेषताएं सामने आईं, जिनके आधार पर इसे नई प्रजाति के रूप में दर्ज किया गया।
पश्चिमी घाट की जैव विविधता का नया प्रमाण
पश्चिमी घाट भारत के महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल है। यहां अनेक ऐसे जीव-जंतु और वनस्पतियां पाई जाती हैं, जो दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्राकृतिक रूप से नहीं मिलतीं। इस नई खोज से यह स्पष्ट होता है कि सह्याद्रि के जंगलों में अभी भी ऐसे कई छोटे जीव मौजूद हैं, जिनका वैज्ञानिक अध्ययन होना बाकी है। विशेषज्ञों के लिए यह खोज केवल एक नए घोंघे की पहचान नहीं, बल्कि जंगलों के छोटे और कम दिखाई देने वाले जीवों के महत्व को समझने का अवसर भी है। जंगलों में पत्तों की परत, नम मिट्टी और सड़ी हुई लकड़ियां अनेक सूक्ष्म जीवों का प्राकृतिक आवास होती हैं। इसलिए जंगलों का संरक्षण केवल बड़े वन्यजीवों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इन छोटे जीवों के प्राकृतिक आवासों को बचाना भी उतना ही जरूरी है।
छोटी खोज, बड़ा वैज्ञानिक महत्व
तिलारी के जंगलों में मिली यह नई प्रजाति बताती है कि प्रकृति के रहस्य अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि पश्चिमी घाट के जंगलों में आगे भी व्यवस्थित शोध और सर्वेक्षण के माध्यम से कई अन्य अज्ञात प्रजातियों की जानकारी मिल सकती है। यह खोज महाराष्ट्र के प्राकृतिक वैभव और सह्याद्रि की समृद्ध जैव विविधता को एक बार फिर सामने लाती है।
स्रोत: Journal of Conchology
