किश्नचंद ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा था, 'रामू, लोग समझ रहे हैं कि आज अंग्रेज चले गए तो हम आज़ाद हो गए। लेकिन याद रखना, हुकूमत का बदलना असली आज़ादी नहीं होता। असली आज़ादी तो तब आएगी जब इस देश का हर इंसान अपनी ज़मीन पर बिना डर के सांस ले सकेगा, जब ज़ात, धर्म और अमीरी-गरीबी की दीवारें खत्म होंगी। आज़ादी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो एक बार मिल गई और हमेशा बनी रहेगी... यह एक चिराग की तरह है रामू, जिसे हर पीढ़ी को अपने खून-पसीने के तेल से जलाए रखना होगा। अगर कभी इस देश के लोग आज़ादी का मतलब सिर्फ 'छुट्टी' या 'जश्न' समझने लगे, तो समझ लेना कि हम दोबारा गुलाम हो रहे हैं—इस बार अपनी ही सोच के।'
सावन की झड़ी अब ढलान पर थी, लेकिन आषाढ़ से चली आ रही नमी हवेली की पुरानी दीवारों में समाई हुई थी। १४ अगस्त की ढलती शाम को आसमां में अजीब-सी सुर्खी फैली थी—ना पूरी तरह लाल, ना पूरी तरह स्याह। हवेली के बीचों-बीच बने खुले आँगन में लगे सौ साल पुराने नीम के पत्तों से पानी की भारी बूँदें रह-रहकर नीचे संगमरमर के ठंडे फर्श पर टपक रही थीं। 'टप... टप...' यह आवाज़ हवेली के सन्नाटे को तोड़ने का काम नहीं करती थी, बल्कि उस सन्नाटे को और गहरा बना देती थी। नवासी वर्ष के पंडित रामनाथ जी उसी संगमरमर की बेंच पर बैठे थे। उनकी रीढ़ की हड्डी अब झुक चुकी थी, चेहरे पर वक्त की असंख्य झुर्रियां किसी पुरानी किताब के पन्नों जैसी बिछी थीं। लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब-सी स्थिरता और ठहराव था। उनके कांपते, झुर्रीदार हाथों में एक मखमली थैली थी, जिसे वे किसी नवजात शिशु की तरह सहला रहे थे।उस थैली के भीतर रखा था एक खादी का तिरंगा। यह आज का बाज़ार में मिलने वाला पॉलिएस्टर या प्लास्टिक का झंडा नहीं था। यह सन १९४७ का हाथ से काता गया, गाढ़ा सूती तिरंगा था, जिसके बीचों-बीच चरखे की तीलियों वाला अशोक चक्र हाथ से काढ़ा गया था। कपड़े का रंग थोड़ा फीका पड़ चुका था, जगह-जगह से धागे ढीले हो गए थे, लेकिन रामनाथ जी के लिए यह केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं था। इसमें उनकी जवानी, उनके साथियों के ख़ून की गंध और उस ऐतिहासिक दौर की पावन मिट्टी समाई हुई थी। हर साल, १५ अगस्त की भोर से ठीक पहले, रामनाथ जी इस तिरंगे को निकालते, इसे ध्यान से देखते और अतीत की गलियों में खो जाते। हवेली की सीढ़ियाँ चढ़ना अब उनके लिए आसान नहीं था, उनके घुटनों में भीषण दर्द रहता था, लेकिन १५ अगस्त के दिन वे किसी की मदद नहीं लेते थे। वे खुद उस भारी लकड़ी की सीढ़ी को लांघकर छत पर जाते और सूरज की पहली किरण के साथ इस तिरंगे को फहराते।शहर बदल चुका था।
हवेली के चारों तरफ ऊँची-ऊँची बहुमंज़िला इमारतें खड़ी हो चुकी थीं। लाउडस्पीकरों पर देशभक्ति के फिल्मी गाने बजने शुरू हो जाते, बच्चे प्लास्टिक के छोटे-छोटे झंडे लेकर गाड़ियों के पीछे भागते और द़फ्तरों में एक दिन की छुट्टी का जश्न मनाया जाता। लेकिन रामनाथ जी के लिए १५ अगस्त कोई जश्न भर नहीं था—यह आत्म-अवलोकन, स्मृतियों और एक अधूरे वादे की बरसी का दिन था।रामनाथ जी ने धीरे से आँखें मूँद लीं। जैसे ही आँखें बंद हुईं, ७९ साल पुरानी वह सुबह उनकी बंद आँखों के सामने जीवित हो उठी १५ अगस्त १९४७। तब वे बीस साल के उबलते ख़ून वाले नौजवान थे। भारत माता की आज़ादी का सूर्य उग रहा था। पूरे देश में एक उन्माद था, एक दीवानगी थी। फिरंगियों की गुलामी की जंजीरें टूट चुकी थीं। चारों तरफ 'भारत माता की जय' और 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे गूंज रहे थे। उस दिन रामनाथ के साथ उनका सबसे अज़ीज़ दोस्त था—किश्नचंद।किश्नचंद और रामनाथ की दोस्ती बनारस के इसी मोहल्ले में मुकम्मल हुई थी, लेकिन किश्नचंद का परिवार मूल रूप से लाहौर का रहने वाला था। विभाजन की जो खूनी रेखा खिंची थी, उसकी आँच में जलकर किश्नचंद का परिवार रातों-रात अपना सब कुछ छोड़कर, जान बचाकर भारत आ पहुँचा था। किश्नचंद ने अपने आँखों के सामने अपने घर को जलते देखा था, अपने रिश्तेदारों को खोया था। लेकिन १५ अगस्त की उस ऐतिहासिक सुबह, जब पूरे देश में आज़ादी का जशन था, किश्नचंद ने रामनाथ का हाथ कसकर पकड़ा था।दोनों बनारस की तंग गलियों में घूम-घूमकर लोगों में बताशे और मिठाइयाँ बाँट रहे थे। गंगा के घाटों पर शंखनाद हो रहा था। उस दिन, घाट की सीढ़ियों पर बैठकर बीस साल के किश्नचंद ने रामनाथ से एक बात कही थी, जो रामनाथ के दिल में ताउम्र के लिए दर्ज हो गई थी।किश्नचंद ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा था, 'रामू, लोग समझ रहे हैं कि आज अंग्रेज चले गए तो हम आज़ाद हो गए। लेकिन याद रखना, हुकूमत का बदलना असली आज़ादी नहीं होता। असली आज़ादी तो तब आएगी जब इस देश का हर इंसान अपनी ज़मीन पर बिना डर के सांस ले सकेगा, जब ज़ात, धर्म और अमीरी-गरीबी की दीवारें खत्म होंगी।
आज़ादी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो एक बार मिल गई और हमेशा बनी रहेगी... यह एक चिराग की तरह है रामू, जिसे हर पीढ़ी को अपने खून-पसीने के तेल से जलाए रखना होगा। अगर कभी इस देश के लोग आज़ादी का मतलब सिर्फ 'छुट्टी' या 'जश्न' समझने लगे, तो समझ लेना कि हम दोबारा गुलाम हो रहे हैं—इस बार अपनी ही सोच के।' उसी दिन किश्नचंद ने अपने हाथों से काता हुआ वह तिरंगा रामनाथ को सौंपा था और कहा था, 'जब तक तू ज़िंदा रहेगा रामू, इस तिरंगे की आन को संभालना। यह याद दिलाता रहेगा कि यह आज़ादी कितने आंसुओं और कितने ख़ून के बदले खरीदी गई है।' उसके कुछ ही सालों बाद किश्नचंद काम के सिलसिले में देश से बाहर चला गया, और फिर धीरे-धीरे पत्राचार बंद हो गया। समय का क्रूर पहिया चलता रहा, दोस्त बिछड़ गए, रिश्ते बदल गए, लेकिन किश्नचंद की वह बात और उसका दिया हुआ यह तिरंगा रामनाथ के पास ही रह गया।'दादाजी! आप फिर इस अंधेरे में बैठकर सोच में डूब गए? हवा बहुत ठंडी है, अंदर चलिए वरना तबियत बिगड़ जाएगी।' एक सुरीली लेकिन थोड़ी चिढ़ी हुई आवाज़ ने रामनाथ जी की स्मृतियों का ताना-बाना तोड़ दिया। उन्होंने आँखें खोलीं। सामने उनकी पोती स्नेहा खड़ी थी। तेईस साल की स्नेहा—चमकदार आँखें, जींस-टॉप पहने, हाथ में हमेशा आईपैड या फोन लिए। वह आज की डिजिटल पीढ़ी की प्रतिनिधि थी। उसने विदेश की एक नामी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे पद पर काम कर रही थी। स्नेहा रामनाथ जी से बेहद प्यार करती थी, लेकिन वह इस पुरानी हवेली, पुराने विचारों और दादाजी के इस '१५ अगस्त के जुनून' को पूरी तरह समझ नहीं पाती थी।'स्नेहा बेटी... तू अभी तक सोई नहीं?' रामनाथ जी ने अपनी आवाज़ को सँभालते हुए कहा। 'सोऊँ कैसे दादाजी? कल १५ अगस्त है, ऑफिस की छुट्टी है लेकिन मुझे सुबह आठ बजे ज़ूम कॉल पर एक अमेरिकन क्लाइंट के साथ प्रेजेंटेशन देनी है। और आप हैं कि इस उम्र में इस नमी वाले आँगन में बैठे हैं। चलिए अंदर!'स्नेहा ने सहारा देकर रामनाथ जी को उठाया। रामनाथ जी ने मखमली थैली को अपने सीने से सटाकर रखा था। स्नेहा की नज़र उस थैली पर पड़ी। वह हलका-सा मुस्कुराई और बोली, 'दादाजी, आप हर साल इस फटे-पुराने झंडे को लेकर भावुक क्यों हो जाते हैं? आजकल बाज़ार में कितने सुंदर, सिल्क के और लाइट वाले तिरंगे मिलते हैं।
मैंने अमेज़न से एक बहुत बढ़िया झंडा ऑर्डर किया है आपकी छत के लिए, कल सुबह आ जाएगा।'रामनाथ जी रुक गए। उन्होंने स्नेहा की तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी वेदना थी। 'बेटी,' रामनाथ जी की आवाज़ में एक भारीपन था, 'जो बाज़ार से खरीदा जाए, वह सिर्फ सजावट का सामान होता है। और यह...' उन्होंने थैली की तरफ इशारा किया, '...यह कोई सजावट नहीं है। यह इस देश की आत्मा का एक टुकड़ा है। इसमें किश्नचंद के हाथों का स्पर्श है, इसमें १९४७ की मिट्टी की महक है। इसे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।' स्नेहा ने एक गहरी सांस ली। उसे लगा कि दादाजी फिर से पुरानी बातों में बह रहे हैं। उसने बात टालने के अंदाज़ में कहा, 'ठीक है दादाजी, आपकी परंपराएँ आपके साथ। लेकिन अभी आप कमरे में चलिए और आराम कीजिए। कल सुबह आपको ध्वजारोहण की ज़िद भी तो पूरी करनी है।'रामनाथ जी चुपचाप अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। वे जानते थे कि आज की पीढ़ी को यह बातें 'भावुकता' या 'पुराने ज़माने का ढकोसला' लगती हैं। आज आज़ादी का मतलब है—अपनी मर्जी से जीना, सप्ताहांत में छुट्टियाँ मनाना, मॉल में घूमना और सोशल मीडिया पर 'हैप्पी इंडिपेंडेंस डे' का स्टेटस लगा देना। लेकिन क्या यही वह आज़ादी थी जिसके सपने भगत सिंह, आजाद और किश्नचंद जैसे लाखों युवाओं ने देखे थे?रात के बारह बजे। शहर के किसी दूर कोने में आतिशबाजी के फूटने की आवाज़ आई। घड़ी ने १५ अगस्त की तारीख का ऐलान कर दिया था। पूरा शहर सो रहा था, या फिर अपनी-अपनी स्क्रीन्स पर व्यस्त था। रामनाथ जी अपने कमरे में बिस्तर पर लेटे थे, लेकिन उनकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। उनके फेफड़ों में एक अजीब-सी भारीपन महसूस हो रहा था। दिल की धड़कनें बेतरतीब हो रही थीं। उन्हें महसूस हो रहा था कि शायद उनका शरीर अब और साथ नहीं देने वाला। समय का बुलावा करीब था।लेकिन उनकी चिंता अपनी सांसों को लेकर नहीं थी। उनकी चिंता उस तिरंगे को लेकर थी।
Type you'अगर मैं कल सुबह नहीं रहा... या अगर मैं सीढ़ियाँ ना चढ़ पाया... तो इस तिरंगे को कौन फहराएगा? क्या यह मखमली थैली में ही बंद रह जाएगा? क्या किश्नचंद का वो वादा यहीं दम तोड़ देगा?' यह विचार आते ही रामनाथ जी के शरीर में जैसे एक आखिरी बिजली-सी कौंध गई। उन्होंने भारी मन से अपने पैरों को नीचे उतारा। छड़ी को कसकर पकड़ा। उनका पूरा शरीर कांप रहा था, लेकिन इरादा मजबूत था।वे धीरे-धीरे चलते हुए स्नेहा के कमरे के दरवाजे पर पहुँचे। कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था। स्नेहा लैपटॉप की तेज़ नीली रोशनी में बैठी कोडिंग कर रही थी। उसके कानों में हेडफोन लगे थे। रामनाथ जी ने दरवाजे को खटखटाया। 'ठक... ठक...'स्नेहा ने चौंककर पीछे देखा। दादाजी को दरवाजे पर खड़ा देख उसने तुरंत हेडफोन उतारे और उठ खड़ी हुई। 'दादाजी! क्या हुआ? आपकी तबियत तो ठीक है ना? आप इतने पसीने में क्यों हैं?' स्नेहा ने घबराकर उनका हाथ पकड़ा। उसका हाथ ठंडा पड़ चुका था। 'मुझे... मुझे तुझसे कुछ बात करनी है स्नेहा,' रामनाथ जी ने हाँफते हुए कहा और कमरे में रखी कुर्सी पर बैठ गए। स्नेहा ने तुरंत उन्हें पानी का गिलास दिया। 'दादाजी, आप सुबह बात कर लेते। इतनी रात को...''नहीं बेटी,' रामनाथ जी ने पानी की एक घूँट ली और गिलास मेज़ पर रख दिया, 'कुछ बातें रात के सन्नाटे में ही कही जा सकती हैं। सुबह तक शायद बहुत देर हो जाए।' रामनाथ जी ने अपनी गोद में रखी वह मखमली थैली उठाई और उसे बहुत आदर के साथ स्नेहा की लैपटॉप वाली मेज़ पर रख दिया—उन चमकती स्क्रीन्स और आधुनिक गैजेट्स के बीचों-बीच। स्नेहा ने चकित होकर अपने दादाजी को देखा। 'दादाजी, यह...''स्नेहा,' रामनाथ जी ने अपनी कांपती लेकिन गंभीर आवाज़ में कहना शुरू किया, 'तुम लोग जिस दुनिया में जी रहे हो, वहाँ हर चीज़ की एक 'कीमत' है, लेकिन किसी चीज़ का 'मूल्य' नहीं है। तुम पूछती हो ना कि मैं इस फटे-पुराने कपड़े से इतना लगाव क्यों रखता हूँ?'रामनाथ जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आँखों में १९४७ की रात का वो दृश्य तैरने लगा। 'जब १५ अगस्त १९४७ को यह देश आज़ाद हुआ था, तो हमने सिर्फ अंग्रेजों को नहीं भगाया था। हमने एक सपना देखा था। सपना एक ऐसे भारत का, जहाँ कोई किसी के आगे लाचार न हो। किश्नचंद, जो विभाजन में अपना सब कुछ गंवा चुका था, उसने उस दिन मुझसे कहा था कि आज़ादी कोई तोहफ़ा नहीं है जो एक बार मिल गया और काम खत्म हो गया। आज़ादी एक ज़िम्मेदारी है।'रामनाथ जी ने स्नेहा का हाथ अपने कांपते हाथों में लिया। 'आज की पीढ़ी समझती है कि टैक्स भर देना और कानून का पालन कर लेना ही देशभक्ति है। लेकिन देशभक्ति इससे कहीं आगे है बेटी। जब तुम किसी गरीब के हक के लिए खड़े होते हो, तो वह आज़ादी है। जब तुम धर्म और जाति से ऊपर उठकर किसी इंसान को गले लगाते हो, तो वह आज़ादी है। जब तुम द़फ्तर में रिश्वत लेने से इंकार करते हो, जब तुम अपनी ज़मीन और पर्यावरण की रक्षा करते हो—तब तुम इस तिरंगे की आन बचाते हो। यह तिरंगा सिर्फ तीन रंगों का कपड़ा नहीं है... केसरिया त्याग का प्रतीक है, सफ़ेद शांति और सत्य का, और हरा समृद्धि का। और बीच का चक्र तुम्हें याद दिलाता है कि अगर तुम रुक गए, तो देश रुक जाएगा।'स्नेहा चुपचाप सुन रही थी। उसके लैपटॉप की स्क्रीन पर चल रहा काम अचानक बेमानी लगने लगा था। उसने कभी आज़ादी को, या अपने दादाजी के इस जुनून को इस दृष्टिकोण से नहीं देखा था। उसके लिए १५ अगस्त हमेशा से बस एक 'लॉन्ग वीकेंड' होता था, जहाँ वह दोस्तों के साथ ट्रिप पर जाती थी या घर पर बैठकर फिल्में देखती थी। 'दादाजी...' स्नेहा की आवाज़ में पहली बार एक झिझक और सम्मान का मिला-जुला भाव था। 'मेरी आँखें अब धुंधला रही हैं स्नेहा,' रामनाथ जी ने रुंधे हुए गले से कहा, 'मेरे पैर अब हवेली की उन ऊँची सीढ़ियों का बोझ नहीं उठा सकते। लेकिन मैं नहीं चाहता कि इस हवेली पर १५ अगस्त का सूरज बिना इस तिरंगे के उगे। यह आज़ादी की अमानत है बेटी... मैं यह अमानत आज तुम्हें सौंप रहा हूँ।'रामनाथ जी ने थैली की ज़िप खोली और वह ऐतिहासिक खादी का तिरंगा निकालकर स्नेहा की गोद में रख दिया। कपड़े को छूते ही स्नेहा को एक अजीब-सी सिहरन महसूस हुई। वह कपड़ा सचमुच रूखा था, लेकिन उसमें एक अजीब-सी गर्मी थी। उसने उस कपड़े को ध्यान से देखा—उसके धागे, उसका हाथ से काढ़ा हुआ चक्र। उसे लगा जैसे उस कपड़े से दशकों पुराना इतिहास, हज़ारों शहीदों की खामोश चीखें और किश्नचंद जैसी अनगिनत आत्माओं की धड़कनें छन-छनकर आ रही हों। रामनाथ जी ने स्नेहा के सिर पर कांपता हुआ हाथ रखा और कहा, 'क्या तुम कल सुबह इस अमानत को छत पर फहराओगी? क्या तुम वादा करती हो कि इस तिरंगे के रंगों को अपनी सोच में ज़िंदा रखोगी?'स्नेहा की आँखों में अनजाने ही आँसू आ गए। उसे महसूस हुआ कि उसके सामने बैठा यह बूढ़ा इंसान केवल उसका दादाजी नहीं है—यह उस दौर का आखिरी जीवित स्तंभ है जिसने इस देश को बनते देखा था। उसने अपने लैपटॉप को बंद कर दिया। आईपैड को किनारे रख दिया। उसने दोनों हाथों से उस तिरंगे को उठाया और अपने माथे से लगा लिया।'मैं वादा करती हूँ दादाजी,' स्नेहा की आवाज़ में एक अभूतपूर्व दृढ़ता थी, 'कल सुबह यह तिरंगा हवेली की सबसे ऊँची छत पर लहराएगा। और सिर्फ कल ही नहीं... जब तक मैं ज़िंदा हूँ, हर १५ अगस्त को यह तिरंगा यहाँ फहराएगा। मैं इस अमानत का मूल्य समझूँगी।' रामनाथ जी के चेहरे पर एक तृप्ति भरी मुस्कान फैल गई। जैसे जीवन भर का कोई भारी बोझ उनके कंधों से उतर गया हो। उन्होंने एक राहत की सांस ली और कहा, 'बस... अब मैं शांति से सो सकता हूँ।' १५ अगस्त की भोर।आसमान में अभी पूरी तरह रोशनी नहीं हुई थी। भोर की नीलिमा में केसरिया और सुनहरी किरणें धीरे-धीरे घुल रही थीं। हवा में सावन की हल्की ठंडक थी और चिड़ियों की चहचहाहट से पूरा माहौल जीवंत हो रहा था। हवेली के आँगन में स्नेहा खड़ी थी। उसने आज कोई पश्चिमी परिधान नहीं पहना था—वह सफ़ेद सूती कुर्ते और हरे दुपट्टे में थी। उसके हाथों में वही मखमली थैली थी, जिसमें से उसने रेशमी धागे से बंधा हुआ वह पुराना तिरंगा निकाला था।उसने अपने दादाजी के कमरे का दरवाजा धीरे से खोला। रामनाथ जी बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। ऐसा लग रहा था जैसे वे किसी बहुत गहरे और सुंदर सपने में खोए हों। 'दादाजी... चलिए, भोर हो गई है,' स्नेहा ने धीरे से कहा।रामनाथ जी ने आँखें खोलीं। उनकी शारीरिक स्थिति आज बहुत कमजोर लग रही थी, वे खुद से उठ भी नहीं पा रहे थे। लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। 'तुम... तुम तैयार हो बेटी?' रामनाथ जी ने अति क्षीण आवाज़ में पूछा। 'हाँ दादाजी। लेकिन आज मैं अकेली नहीं जाऊँगी। आप भी मेरे साथ छत पर चलेंगे,' स्नेहा ने कहा। स्नेहा और हवेली के पुराने नौकर रामू काका ने मिलकर रामनाथ जी को व्हीलचेयर पर बैठाया। हवेली में बनी पुरानी ढलान वाली राह से होते हुए वे किसी तरह रामनाथ जी को सबसे ऊपरी छत पर ले आए।छत पर पहुँचते ही ठंडी हवा के झोंके ने उनका स्वागत किया। दूर शहर में लाउडस्पीकरों पर 'ऐ वतन, ऐ वतन मेरे आबाद रहे तू...' का संगीत गूंजने लगा था। सूरज की पहली किरण ने बनारस के गंगा घाटों और इस पुरानी हवेली को अपनी स्वर्णिम गोद में भर लिया था। छत के बीचों-बीच लोहे का एक लंबा पोल लगा था। स्नेहा ने बहुत सावधानी और आदर के साथ उस १९४७ वाले खादी के तिरंगे को रस्सी से बाँधा। उसके हाथ कांप रहे थे—डर से नहीं, बल्कि उस सम्मान और ज़िम्मेदारी के अहसास से जो उसे अभी-अभी मिली थी। रामनाथ जी व्हीलचेयर पर बैठे, अपनी धुंधली होती आँखों से अपनी पोती को देख रहे थे। उन्हें स्नेहा में केवल अपनी पोती नज़र नहीं आ रही थी—उन्हें उसमें भारत का भविष्य नज़र आ रहा था।'फहराओ बेटी!' रामनाथ जी ने अपनी पूरी ताकत समेटकर कहा। स्नेहा ने रस्सी खींची। सरसराहट की आवाज़ के साथ, वह ऐतिहासिक तिरंगा धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा। और जैसे ही वह पोल के सबसे ऊपरी सिरे पर पहुँचा, स्नेहा ने रस्सी को झटका दिया।
तिरंगा खुल गया। हवा के एक तेज़ झोंके ने उसे अपनी बाहों में भर लिया, और वह पुराना, ऐतिहासिक सूती तिरंगा नीले आसमान की छाती पर गर्व से लहराने लगा।केसरिया, सफ़ेद और हरा... तीन रंग सुबह की स्वर्णिम धूप में नहा उठे। स्नेहा ने झुककर तिरंगे को सैल्यूट किया। उसकी आँखों से आँसू बहकर उसके गालों पर आ गए थे, लेकिन यह आँसू दुख के नहीं थे। यह उस जुड़ाव के आँसू थे जो आज उसने अपने देश, अपने इतिहास और अपनी जड़ों के साथ महसूस किया था। उसने पीछे मुड़कर देखा, 'दादाजी! देखिए, हमारा तिरंगा...'व्हीलचेयर पर बैठे रामनाथ जी की आँखें ऊपर फहराते हुए तिरंगे पर ही टिकी थीं। उनके चेहरे पर एक मुस्कान जम चुकी थी। उनके दोनों हाथ अपने आप सीने के पास आकर जुड़ गए थे। वे अब सांस नहीं ले रहे थे। आज़ादी के इस आख़री सिपाही ने अपनी अमानत को सही हाथों में सौंपकर, १५ अगस्त की पहली किरण के साथ अपनी अंतिम सांस ले ली थी। वे चले गए थे, लेकिन बेफिक्र होकर... क्योंकि वे जानते थे कि चिराग बुझा नहीं था, उसकी लौ अब दूसरी पीढ़ी के हाथों में सुरक्षित थी। स्नेहा रामनाथ जी के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपने दादाजी के ठंडे पड़ चुके हाथों को अपने हाथों में लिया। वह रोई नहीं। उसे लगा कि इस पवित्र क्षण में रोना उस महान आत्मा का अपमान होगा। उसने ऊपर देखा। हवा तेज़ हो चुकी थी। १९४७ का वह खादी का तिरंगा पूरी शान से लहरा रहा था, और उसकी सरसराहट में स्नेहा को किश्नचंद और रामनाथ जी की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी:'आज़ादी कोई तोहफ़ा नहीं है... यह एक चिराग है, जिसे हर पीढ़ी को जलते रखना होगा।' स्नेहा ने उठकर रामनाथ जी के चरण स्पर्श किए और फहराते हुए तिरंगे की तरफ देखकर मन ही मन कहा, 'दादाजी, यह चिराग कभी नहीं बुझेगा। मैं वादा करती हूँ।' उस दिन १५ अगस्त का सूरज केवल एक तारीख़ लेकर नहीं आया था, वह एक पुरानी हवेली की छत पर दो पीढ़ियों के मिलन और एक अमर संकल्प का गवाह बनकर चमका था। -मीना झाTr paragraph here

