महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका में प्रस्तावित टोरेंट पावर की 3,000 मेगावाट क्षमता वाली पंप्ड-स्टोरेज ऊर्जा परियोजना कर्जत में पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरण विवाद तेज हो गया है। स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं के विरोध के बीच वन विभाग ने 32,490 पेड़ों की प्रस्तावित कटाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह रोक कितने समय तक रहेगी और परियोजना के लिए आगे पेड़ों की कटाई की अनुमति दी जाएगी या नहीं।
यह परियोजना कर्जत तालुका के सैदोंगर, कोटवाल खलाटी और पाल गांवों के आसपास प्रस्तावित है। परियोजना के लिए वन भूमि सहित विभिन्न श्रेणियों की जमीन का उपयोग किया जाना है। पेड़ों की कटाई से जुड़ी सूचना सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ी और विरोध तेज हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर वन संपदा को नुकसान पहुंचाने से पहले स्थानीय समुदायों की चिंताओं और पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
विरोध के बाद वन विभाग का कदम
27 अक्टूबर 2026 को सामने आई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, व्यापक विरोध और क्षेत्र में तनाव की स्थिति को देखते हुए वन विभाग ने पेड़ों की कटाई रोक दी। इससे पहले 14 अक्टूबर को जारी वन विभाग के नोटिस के बाद प्रस्तावित कटाई को लेकर विवाद शुरू हुआ था। कुछ स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर पेड़ों को हटाने से जुड़ी गतिविधियां पहले ही शुरू हो गई थीं। हालांकि, कटाई पर फिलहाल रोक लगने के बावजूद परियोजना की मंजूरी रद्द होने की कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। शिवसेना (यूबीटी) के विधायक आदित्य ठाकरे ने सैदोंगर क्षेत्र का दौरा कर प्रस्तावित कटाई पर आपत्ति जताई। उनके साथ संजय राउत और सुषमा अंधारे सहित पार्टी के अन्य नेता भी मौजूद थे। विरोध कर रहे ग्रामीणों ने मांग की कि सरकार पेड़ों की कटाई रोकने तक सीमित न रहे, बल्कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों की दोबारा समीक्षा करे। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने भी इस मुद्दे पर कर्जत जाने की घोषणा की थी।
सरकार और कंपनी का क्या कहना है?
महाराष्ट्र सरकार और टोरेंट पावर का कहना है कि परियोजना आवश्यक मंजूरियों और निर्धारित प्रक्रियाओं के बाद आगे बढ़ाई जा रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि परियोजना से राज्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी और इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है। कंपनी का दावा है कि परियोजना स्थल भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य से लगभग 16 किलोमीटर दूर है और परियोजना के लिए प्रतिपूरक वनीकरण की योजना बनाई गई है। सरकार का तर्क है कि पंप्ड-स्टोरेज परियोजनाएं बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकती हैं। ऐसी परियोजनाओं में अतिरिक्त बिजली का उपयोग करके पानी को ऊंचाई पर स्थित जलाशय में पहुंचाया जाता है और जरूरत के समय उसी पानी से बिजली बनाई जाती है। हालांकि, ऊर्जा उत्पादन की जरूरत के साथ वन भूमि, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन भी महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच सवाल
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने परियोजना से जुड़े वन क्षेत्र के उपयोग, जनसुनवाई की प्रक्रिया, जल सुरक्षा और वन्यजीवों के आवास पर संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि संबंधित दस्तावेजों और पर्यावरणीय आकलन की स्वतंत्र समीक्षा हो तथा स्थानीय लोगों की आपत्तियों का स्पष्ट जवाब दिया जाए। इन आपत्तियों और आरोपों की पुष्टि संबंधित सरकारी दस्तावेजों के आधार पर किया जाना जरूरी है। इस विवाद ने प्रतिपूरक वनीकरण की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े किए हैं। किसी परियोजना के लिए पेड़ काटे जाने के बाद दूसरी जगह पौधे लगाना एक निर्धारित पर्यावरणीय उपाय हो सकता है, लेकिन नए पौधों का जीवित रहना, उनका विकसित होना और खोए हुए प्राकृतिक वन तंत्र की भरपाई कर पाना अलग-अलग विषय हैं। प्राकृतिक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते; वे मिट्टी, पानी, पक्षियों, वन्यजीवों और स्थानीय जलवायु से जुड़े एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होते हैं।
अब आगे क्या होगा?
कर्जत में पेड़ों की कटाई पर लगी रोक ने स्थानीय लोगों को अपनी आपत्तियां उठाने का अवसर दिया है, लेकिन इस विवाद का अंतिम समाधान अभी सामने नहीं आया है। अब निगाहें वन विभाग के अगले निर्णय, परियोजना से संबंधित मंजूरियों, पर्यावरणीय शर्तों और सरकार द्वारा स्थानीय लोगों की चिंताओं पर की जाने वाली कार्रवाई पर रहेंगी। ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास की प्रक्रिया में पर्यावरणीय नुकसान को कम करना और प्रभावित समुदायों का विश्वास हासिल करना भी उतना ही जरूरी है। कर्जत का मामला इसी व्यापक सवाल को सामने लाता है कि विकास परियोजनाओं में आर्थिक और ऊर्जा संबंधी लाभों के साथ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को किस तरह संतुलित किया जाए।
