समाज में बढ़ता क्षणिक आवेश, असहिष्णुता और संवेदनहीनता, मुंबई लोकल की मामूली बहस से लेकर लोहगढ़ की खाई तक… क्या हम संवेदनाओं के अंत की ओर बढ़ रहे हैं? देश की सबसे तेज़ रफ्तार शहरों में एक—मुंबई। सुबह की भागती लोकल ट्रेनें, लाखों चेहरों की भीड़, धक्कामुक्की, सीट के लिए बहस, दरवाज़े पर खड़े यात्रियों की तकरार—यह सब मुंबई की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। दशकों से लोग इसी भीड़ में सफर करते आए हैं। बहसें भी हुईं, झगड़े भी हुए, लेकिन अधिकांश विवाद अगले स्टेशन तक खत्म हो जाते थे। लोग गुस्से में दो बातें कहकर अपने-अपने रास्ते निकल जाते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। हाल ही में मुंबई लोकल में मामूली कहासुनी ने देखते ही देखते एक युवक की जान ले ली। कुछ मिनटों का विवाद, कुछ पल का आवेश और एक परिवार हमेशा के लिए उजड़ गया। मुंबई लोकल की भीड़ में बिखरा हुआ एक जीवन हमें एक ही चेतावनी दे रहे हैं। खतरा केवल अपराधियों से नहीं है, बल्कि उस मानसिकता से है जिसमें गुस्सा तर्क को मार देता है, अहंकार रिश्तों को कुचल देता है और असहमति हत्या में बदल जाती है। एक समय था जब लोग रिश्ते बचाने के लिए समझौता करते थे, बहस होने पर बड़े-बुजुर्ग बीच-बचाव करते थे और गुस्सा शांत होने का इंतजार किया जाता था। आज तस्वीर बदल गई है। छोटी-सी बहस सीधे हिंसा तक पहुंच जाती है। असहमति दुश्मनी बन जाती है और क्षणिक गुस्सा किसी की जान ले लेता है। ऐसा लगता है कि धैर्य, सहनशीलता और आत्मसंयम जैसे शब्द धीरे-धीरे युवाओं की शब्दावली से गायब होते जा रहे हैं।
इसी बीच पुणे के पास लोहगढ़ किले की पहाड़ियों से आई एक और खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। एक संपन्न युवक, जिसे युवती के परिवार ने विवाह के लिए पसंद किया था, भविष्य के रिश्ते की उम्मीद लेकर उसके साथ घूमने गया। लेकिन लौटकर कभी घर नहीं आया। आरोप है कि युवती ने उसे पहाड़ी से धक्का दे दिया। कारण सुनकर समाज और भी सन्न रह गया। कहा गया कि युवती उससे विवाह नहीं करना चाहती थी। उसे युवक का हकलाना पसंद नहीं था, सिर पर कम बाल होना पसंद नहीं था और शायद उसकी कल्पनाओं का ‘आदर्श जीवनसाथी’ भी वह नहीं था। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि किसी लड़की को विवाह का अधिकार है या नहीं। निस्संदेह, हर स्त्री और हर पुरुष को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है। यदि रिश्ता स्वीकार नहीं था, तो उसे सम्मानपूर्वक ठुकराया जा सकता था। परिवार को समझाया जा सकता था। कानून और समाज दोनों इसके रास्ते देते हैं। लेकिन क्या किसी इंसान की शारीरिक कमियों या व्यक्तिगत नापसंदगी का उत्तर उसकी हत्या हो सकता है?
मुंबई लोकल की हत्या और लोहगढ़ की वारदात एक ही कहानी के दो अध्याय हैं। दोनों हमें बता रही हैं कि हमारे समाज में बर्दाश्त करने की क्षमता खतरनाक रूप से घट रही है। आज का युवा पहले से अधिक शिक्षित है, तकनीक से लैस है, दुनिया उसकी मुट्ठी में है। लेकिन क्या वह पहले से अधिक धैर्यवान भी है? उत्तर शायद ‘नहीं’ है। आज छोटी-सी आलोचना अपमान बन जाती है। असहमति दुश्मनी बन जाती है। रिश्तों में ‘ना’ सुनना असहनीय हो जाता है। सड़क पर ओवरटेक करना अहंकार की लड़ाई बन जाता है। सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी महीनों की दुश्मनी में बदल जाती है। ऐसा लगता है जैसे गुस्सा अब भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि जीवनशैली बनता जा रहा है। आज सोशल मीडिया ने सुंदरता के नए मानक गढ़ दिए हैं। हर चेहरा फ़िल्टर से चमकता है। हर जीवन सफलता की तस्वीर बनकर सामने आता है। ऐसे माहौल में वास्तविक जीवन के सामान्य लोग कई बार ‘अपर्याप्त’ लगने लगते हैं। कम बाल, हकलाना, रंग, कद, मोटापा, दुबलापन—जो बातें कभी इंसान की पहचान नहीं थीं, आज वही किसी के स्वीकार या अस्वीकार का आधार बन रही हैं। यह केवल सौंदर्यबोध का परिवर्तन नहीं है, बल्कि संवेदनाओं का क्षरण है। जब समाज इंसान को इंसान नहीं, बल्कि ‘परफेक्ट पैकेज’ की तरह देखने लगे, तब रिश्ते भी बाजार की वस्तु बन जाते हैं। हमने बच्चों को सफल होना सिखाया, असफल होना नहीं। हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को प्रतियोगिता जीतना सिखाती है, लेकिन हार स्वीकार करना नहीं। हम उन्हें ऊँचे अंक लाना सिखाते हैं, लेकिन गुस्से पर नियंत्रण रखना नहीं। हम उन्हें करियर बनाना सिखाते हैं, लेकिन रिश्ते निभाना नहीं। हम उन्हें अंग्रेज़ी बोलना सिखाते हैं, लेकिन संवाद करना नहीं।
यही कारण है कि जब जीवन उनकी इच्छा के अनुसार नहीं चलता, तो वे टूटते भी हैं और कई बार दूसरों को भी तोड़ देते हैं। भावनात्मक परिपक्वता केवल डिग्री से नहीं आती। वह परिवार, समाज और संस्कारों से आती है। मोबाइल ने दुनिया दी, लेकिन धैर्य छीन लिया। आज हर चीज़ एक क्लिक पर मिल जाती है। खाना चाहिए—दस मिनट में। मनोरंजन चाहिए—तुरंत। खरीदारी करनी है—कुछ सेकंड में। धीरे-धीरे प्रतीक्षा करने की आदत समाप्त हो गई है। जब जीवन में कोई बात तुरंत नहीं होती, तब निराशा पैदा होती है। यही अधैर्य कई बार हिंसा का रूप ले लेता है। डिजिटल दुनिया ने सुविधा दी है, लेकिन मनुष्य को अधीर भी बना दिया है।
हर घटना के बाद वâेवल पुलिस, अदालत या सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। हमें अपने घरों की ओर भी देखना होगा। क्या हम अपने बच्चों से रोज़ दस मिनट भी खुलकर बात करते हैं? क्या हमने उन्हें यह सिखाया है कि असहमति का सम्मान कैसे किया जाता है? क्या हमने कभी यह समझाया कि ‘ना’ सुनना भी जीवन का हिस्सा है? क्या हमने उन्हें यह बताया कि किसी की शारीरिक कमी उसका अपराध नहीं होती? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो समस्या केवल युवाओं की नहीं, पूरे समाज की है। हर युवा दोषी नहीं है। यह भी उतना ही आवश्यक है कि कुछ भयावह घटनाओं के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा न किया जाए।
आज लाखों युवा अपने परिवार का सहारा बने हुए हैं। कोई सीमा पर देश की रक्षा कर रहा है, कोई अस्पताल में मरीजों की सेवा कर रहा है, कोई प्रयोगशालाओं में शोध कर रहा है, कोई खेतों में मेहनत कर रहा है, तो कोई स्टार्टअप के माध्यम से रोजगार पैदा कर रहा है। समस्या पूरी पीढ़ी नहीं, बल्कि तेजी से फैलती वह मानसिकता है, जिसमें आवेग विवेक पर भारी पड़ रहा है और संवेदनाएं स्वार्थ के सामने हार रही हैं। हत्या करने वालों को कठोर सजा मिलनी ही चाहिए। कानून अपना काम करेगा। लेकिन यदि समाज वही रहा, परिवार वही रहे और शिक्षा वही रही, तो अपराधियों के चेहरे बदलेंगे, घटनाएँ नहीं। हमें स्कूलों में भावनात्मक शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और क्रोध-नियंत्रण को उतनी ही गंभीरता से पढ़ाना होगा, जितनी गणित और विज्ञान को पढ़ाया जाता है। परिवारों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा। सोशल मीडिया की कृत्रिम दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर समझाना होगा। और सबसे बढ़कर, हमें फिर से यह सिखाना होगा कि किसी इंसान का मूल्य उसके चेहरे, बालों, कद या बोलने के तरीके से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से तय होता है। -मंगला नटराजन
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