रिश्तों की ‘शहनाई’ में पिघली सियासत की ‘बर्फ’

'सौहार्द या सियासत? एक ही मंच पर जुटे देश के धुर विरोधी नेता'

ये नेता मंच से एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत आक्षेप और लोकतंत्र की हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाते हैं, तो व्यक्तिगत पारिवारिक आयोजनों में वह वैचारिक शत्रुता अचानक कहां गायब हो जाती है? जमीनी कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई कि वे पार्टी की विचारधारा के लिए चौबीसों घंटे सड़कों पर लाठियां खाते हैं, केस झेलते हैं और आपसी रिश्ते खराब करते हैं, जबकि शीर्ष स्तर पर 'पॉलिटिकल क्लास' के लिए ये सब महज एक खेल है।-सोशल मीडिया यूज़र्स का फूटा गुस्सा

मुंबई (विशेष ब्यूरो रिपोर्ट)राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता—यह पुरानी कहावत हाल ही में एक बार फिर सच साबित हुई। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (र्‍ण्झ्) की सांसद सुप्रिया सुले की बेटी रेवती सुले का विवाह हाल ही में नागपुर के व्यवसायी सारंग लखानी के साथ बेहद भव्य तरीके से संपन्न हुआ। मुंबई के जियो कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस हाई-प्रोफाइल रिसेप्शन में जो नजारा देखने को मिला, उसने देश के राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। इस शाही आयोजन में देश और महाराष्ट्र की सियासत के वे तमाम चेहरे एक साथ बेहद दोस्ताना अंदाज में ठहाके लगाते दिखे, जो टीवी डिबेट्स, चुनावी रैलियों और संसद में एक-दूसरे के खिलाफ बेहद तीखे हमले करते हैं। रिसेप्शन के मंच पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल जैसी दिग्गज हस्तियां एक ही छत के नीचे नजर आईं।इतना ही नहीं, महाराष्ट्र की राजनीति में आए सबसे बड़े भूचाल यानी 'पवार बनाम पवार' की कड़वाहट भी यहां गायब दिखी। अजित पवार गुट और शरद पवार गुट के नेता तथा परिवार के सदस्य एक-दूसरे के साथ बेहद सहज होकर तस्वीरें खिंचवाते दिखे। इस मेल-मिलाप की तस्वीरें और वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हुए, इंटरनेट यूजर्स और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

इतिहास के पन्नों से: अन्य बड़े उदाहरण

यह पहली बार नहीं है जब ऐसा राजनीतिक विरोधाभास देखा गया हो, भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं जहां चुनाव मैदान और संसद में एक-दूसरे के खिलाफ बेहद तीखे, व्यक्तिगत और कटु हमले करने वाले राजनेता पारिवारिक या सामाजिक आयोजनों में पुराने गिले-शिकवे भूलकर गले मिलते नजर आए हैं। जब-जब ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जनता और कार्यकर्ताओं ने उन्हें सोशल मीडिया पर जमकर आड़े हाथों लिया है।ङ नितिन गडकरी की बेटी की शादी (२०१६)केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की बेटी की नागपुर में हुई शादी भी एक बड़ा 'पॉलिटिकल रीयूनियन' थी। केंद्रीय मंत्री र्‍ग्ूग्ह उa्व्arग् की बेटी खूव्ग् उa्व्arग् का विवाह ४ दिसंबर २०१६ को नागपुर में हुआ था। उनकी शादी A्ग्ूब्a ख्aेव्प्ग्व्ar से हुई, जो उस समय अमेरिका में फेसबुक (इaमंददव्) से जुड़े हुए थे। यह विवाह नागपुर के Eस्ज्rो झ्aत्aम प्aत्त् में आयोजित किया गया था और इसमें देश के कई बड़े राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक नेताओं ने भाग लिया। अतिथियों में Raरहaूप् एग्हुप्, Aस्ग्ू एप्aप्, श्दप्aह ँप्aुैaू, अनह्ra इa्हaन्ग्े, ळ््प्aन् ऊप्aम्व्ीaब्, Raर ऊप्aम्व्ीaब्, ँaंa Raस्न् और कई केंद्रीय मंत्री शामिल थे। उस समय नोटबंदी (अस्दहाूग्ेaूग्दह) का दौर चल रहा था, इसलिए यह शादी काफी चर्चा में रही। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में वीआईपी मेहमानों के आने के लिए चार्टर्ड और विशेष विमानों का उपयोग किया गया था। शादी को लेकर एक और विवाद तब सामने आया जब बाद के वर्षों में स्वीडिश कंपनी एम्aहग्a से जुड़ी रिपोर्टों में दावा किया गया कि एक लग्जरी बस का उपयोग इस विवाह समारोह में किया गया था। इस मामले को लेकर राजनीतिक बहस और मीडिया में काफी चर्चा हुई, हालांकि यह विषय विवाह से अलग एक विवाद के रूप में सामने आया। २०१६ में केतकी गडकरी की शादी नागपुर की उस वर्ष की सबसे चर्चित वीआईपी शादियों में से एक मानी गई, जिसमें राष्ट्रीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन की अनेक प्रमुख हस्तियां उपस्थित थीं। इस शादी में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी के अन्य बड़े नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता, एनसीपी के शरद पवार और शिवसेना के उद्धव ठाकरे (उस समय गठबंधन में तनाव के बावजूद) शामिल हुए थे। सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने इस शादी के वीआईपी चार्टर्ड प्लेन्स और नेताओं के एक साथ जुटने पर तंज कसते हुए लिखा था कि 'नेताओं के बीच कोई दुश्मनी नहीं होती, वे सिर्फ वोट बैंक के लिए जनता को बांटते हैं।'ङ मुलायम सिंह यादव के पोते के तिलक में पीएम मोदी की शिरकत (२०१५), लालू प्रसाद यादव की बेटी की शादीयह भारतीय राजनीति के सबसे बड़े विरोधाभासों में से एक माना जाता है। साल २०१४ के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच बेहद तीखी जुबानी जंग हुई थी। साल २०१५ में मुलायम सिंह यादव के पोते (तेज प्रताप सिंह यादव) के तिलक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विशेष रूप से सैफई पहुंचे थे। मंच पर पीएम मोदी, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव एक साथ हंसते-मुस्कुराते और हाथ मिलाते दिखे थे। चुनावी रैलियों में एक-दूसरे पर तीखे हमले करने वाले नेताओं की इस आत्मीयता को देखकर जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी निराशा और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। बिहार की राजनीति में बीजेपी और आरजेडी को एक-दूसरे का धुर विरोधी माना जाता है। दोनों दलों के नेता एक-दूसरे पर जेल भेजने और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। लालू प्रसाद यादव की बेटी की शादी के रिसेप्शन में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह पहुंचे थे। वहां लालू यादव ने बेहद गर्मजोशी से उनके गले में हाथ डालकर मीडिया को पोज दिया था। बिहार के स्थानीय कार्यकर्ताओं के लिए यह देखना बेहद अजीब था, क्योंकि वे जिला स्तर पर आरजेडी कार्यकर्ताओं के साथ हिंसक राजनीतिक संघर्षों में उलझे रहते थे। यह विवाह केवल पारिवारिक समारोह नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन के रूप में भी देखा गया था, क्योंकि इसमें सत्ता और विपक्ष दोनों के शीर्ष नेता एक ही मंच पर दिखाई दिए थे।सिद्धू मूसेवाला के मर्डर के बाद पंजाब की राजनीति (अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और राघव चड्ढा)पंजाब विधानसभा चुनाव २०२२ के दौरान कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAझ्) ने एक-दूसरे के खिलाफ बेहद आक्रामक प्रचार किया था। चुनाव के कुछ महीनों बाद जब आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा की परिणीति चोपड़ा के साथ शादी और दिल्ली में रिसेप्शन हुआ, तो उसमें पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और अन्य विपक्षी नेता शामिल हुए। सिद्धू मूसेवाला की २९ मई २०२२ को हुई हत्या ने पंजाब की राजनीति को झकझोर दिया था। उस समय पंजाब में हाल ही में बनी Aaस् Aa्स्ग् झ्arूब् सरकार सत्ता में थी और हत्या से एक दिन पहले ही उनकी सुरक्षा घटाए जाने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। उस समय पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष Aस्rग्ह्ी एग्हुप् Raरa ेंarrग्हु ने सिद्धू मूसेवाला की हत्या को 'राजनीतिक हत्या' बताते हुए राज्य सरकार को सीधे जिम्मेदार ठहराया। उन्होंन्ो कहा कि यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं बल्कि गंभीर सुरक्षा विफलता का मामला है। वड़िंग ने मुख्यमंत्री भगवंत मान से नैतिक जिम्मेदारी लेने की मांग की और कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। कांग्रेस ने लगातार यह मुद्दा उठाया कि सुरक्षा घटाने की सूची सार्वजनिक किए जाने के बाद ही मूसेवाला की हत्या हुई। बाद के वर्षों में भी वड़िंग पंजाब में बढ़ते गैंगस्टर नेटवर्क और अपराध को मूसेवाला हत्याकांड से जोड़कर AAझ् सरकार पर हमला करते रहे।हत्या के बाद विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा और कांग्रेस के कुछ नेताओं ने Raुप्aन् ण्प्a्प्a का नाम भी राजनीतिक बहस में घसीटा। आरोप लगाए गए कि पंजाब सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों पर दिल्ली नेतृत्व और राघव चड्ढा का प्रभाव था। हालांकि मूसेवाला हत्या मामले में राघव चड्ढा के खिलाफ किसी जांच एजेंसी द्वारा प्रत्यक्ष आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की गई। राजनीतिक स्तर पर विपक्ष ने यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की कि पंजाब की सरकार वास्तव में दिल्ली से नियंत्रित हो रही है और सुरक्षा संबंधी चूक के लिए केवल राज्य सरकार ही नहीं बल्कि AAझ् का शीर्ष नेतृत्व भी जवाबदेह है। मूसेवाला कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके थे, इसलिए कांग्रेस ने इस मुद्दे को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर उठाया। पंजाब में गैंगस्टरवाद, कानून-व्यवस्था और वीआईपी सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह बाद में भी न्याय की मांग को लेकर सक्रिय रहे और कई मौकों पर राज्य सरकार की आलोचना करते रहे, जिससे यह मुद्दा लंबे समय तक राजनीतिक रूप से जीवित रहा।

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