एक ने पर्वतों, पक्षियों और जनजातीय प्रतीकों के माध्यम से कला की आदिम भाषा की खोज की, जबकि दूसरे ने यथार्थवादी चित्रों के जरिए शहरी जीवन की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को सामने रखा। साथ मिलकर, जगदीश स्वामीनाथन और बिकाश भट्टाचार्य ने आधुनिक भारतीय कला की दिशा बदल दी।
हर वर्ष २१ जून को भारतीय कला जगत आधुनिक भारतीय कला के दो महान कलाकारों को याद करता है, जिनका जन्मदिन एक ही दिन था, लेकिन कला को देखने और समझने का उनका दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था। एक ने पर्वतों, पक्षियों और जनजातीय प्रतीकों के माध्यम से कला की आदिम भाषा की खोज की, जबकि दूसरे ने यथार्थवादी चित्रों के जरिए शहरी जीवन की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को सामने रखा। साथ मिलकर, जगदीश स्वामीनाथन और बिकाश भट्टाचार्य ने आधुनिक भारतीय कला की दिशा बदल दी। उनकी साझा जन्मतिथि केवल एक ऐतिहासिक संयोग नहीं है। यह दो समानांतर कलात्मक यात्राओं का प्रतीक है, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारत के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया—आधुनिक भारतीय कला कैसी होनी चाहिए? स्वतंत्रता के बाद के दशकों में, दोनों कलाकार ऐसे कला परिवेश में उभरे, जहाँ एक ओर बंगाल स्कूल का रोमांटिक राष्ट्रवाद प्रभावशाली था और दूसरी ओर यूरोपीय आधुनिकतावाद का प्रभाव बढ़ रहा था। लेकिन दोनों ने इन परम्पराओं को बिना सवाल किए स्वीकार नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने भारतीय अनुभवों और वास्तविकताओं पर आधारित अपनी स्वतंत्र कलाभाषा विकसित की।
१९२८ में शिमला में जन्मे जगदीश स्वामीनाथन केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि कवि, आलोचक, विचारक और संस्थान निर्माता भी थे। उन्होंने यूरोपीय आधुनिकतावाद की ‘संकर शैली’ और बंगाल स्कूल की अतीतवादी सोच, दोनों का विरोध किया। समूह १८९० के प्रभावशाली घोषणापत्र के माध्यम से उन्होंने कला में एक मूलभूत और आदिम दृश्य चेतना की वापसी का आह्वान किया। स्वामीनाथन के लिए कला वास्तविकता की नकल नहीं थी, बल्कि देखने के मूल और सहज तरीकों को पुनः खोजने का माध्यम थी। उनकी प्रसिद्ध बर्ड–माउंटेन–ट्री श्रृंखला में प्रकृति को सरल और मूल रूपों में प्रस्तुत किया गया। रंगों के उज्ज्वल विस्तार में तैरते पक्षी, शांत पर्वत और अकेले वृक्ष समय और स्थान की सीमाओं से परे दिखाई देते हैं। जनजातीय कला और भारतीय लघुचित्र परम्परा से प्रेरित होकर उन्होंने ऐसी दृश्य भाषा विकसित की, जो एक साथ समकालीन और गहराई से भारतीय थी।
उनका सबसे बड़ा योगदान केवल चित्रों तक सीमित नहीं था। भोपाल स्थित भारत भवन के रूपंकर संग्रहालय के प्रमुख प्रेरक के रूप में उन्होंने जनजातीय और लोक कला को तथाकथित ‘उच्च कला’ से अलग मानने वाली सोच को चुनौती दी। गोंड कलाकार जंगढ़ सिंह श्याम को पहचान दिलाने और आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने भारत की समकालीन जनजातीय कला की दिशा बदल दी। जहाँ स्वामीनाथन मिथकीय चेतना और सामूहिक स्मृति की ओर उन्मुख थे, वहीं बिकाश भट्टाचार्य ने मानव जीवन और उसके अनुभवों को अपने कला-संसार का केन्द्र बनाया। १९४० में कोलकाता में जन्मे बिकाश भट्टाचार्य उस समय भारत के प्रमुख यथार्थवादी चित्रकारों में उभरे, जब कला जगत में अमूर्त कला का प्रभाव बढ़ रहा था। उन्होंने अकादमिक दक्षता, मनोवैज्ञानिक गहराई और सूक्ष्म अतियथार्थवाद को मिलाकर ऐसे चित्र बनाए, जो आधुनिक शहरी जीवन की चिंताओं, विरोधाभासों और छिपे हुए भय को सामने लाते हैं।
उत्तर कोलकाता में आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक अशांति के बीच पले-बढ़े भट्टाचार्य ने रोज़मर्रा के जीवन की भावनात्मक जटिलताओं को गहराई से महसूस किया। नक्सल आंदोलन के अशांत दौर में बनाई गई उनकी डॉल श्रृंखला आधुनिक भारत में राजनीतिक हिंसा पर सबसे प्रभावशाली कलात्मक प्रतिक्रियाओं में से एक मानी जाती है। टूटी हुई गुड़िया संघर्ष और असुरक्षा से बिखरती मासूमियत का प्रतीक बन गई। उनकी कला में महिलाओं का विशेष स्थान था। दुर्गा श्रृंखला और माताओं, विधवाओं तथा सामान्य महिलाओं के चित्रों के माध्यम से उन्होंने उन्हें संघर्ष, सहनशीलता और त्याग के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उनका यथार्थवाद केवल बाहरी रूप का चित्रण नहीं था, बल्कि साधारण दिखने वाले जीवन के भीतर छिपी मनोवैज्ञानिक गहराइयों को उजागर करता था।




पहली नज़र में स्वामीनाथन और भट्टाचार्य कला के दो अलग ध्रुवों पर दिखाई देते हैं। स्वामीनाथन मानव आकृति से दूर जाकर प्रतीकों और ब्रह्मांडीय रूपों की ओर बढ़े, जबकि भट्टाचार्य ने मानवीय अनुभव को अपनी कला का केन्द्र बनाया। एक ने चित्रों में गहराई और भ्रमात्मक स्थान को अस्वीकार किया, तो दूसरे ने प्रकाश, बनावट और शारीरिक संरचना को अद्भुत कौशल के साथ चित्रित किया। फिर भी, इन भिन्नताओं के भीतर एक महत्वपूर्ण समानता छिपी हुई थी। दोनों कलाकारों ने नकल का विरोध किया, पश्चिमी प्रभावों के प्रभुत्व को चुनौती दी और स्वतंत्र भारत के लिए एक प्रामाणिक कलाभाषा की खोज की। दोनों गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना से प्रेरित थे। स्वामीनाथन ने जनजातीय कला के माध्यम से स्थापित कलात्मक मान्यताओं को चुनौती दी, जबकि भट्टाचार्य ने अपनी भावनात्मक यथार्थवादी कला के जरिए समकालीन भारत के सामाजिक तनावों और नैतिक प्रश्नों को सामने रखा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि दोनों मानते थे कि कला केवल सजावट नहीं, बल्कि परिवर्तन का माध्यम है। आज उनकी विरासत पहले से अधिक प्रासंगिक है। स्वामीनाथन ने भारतीय कला इतिहास की सीमाओं का विस्तार किया, जबकि भट्टाचार्य ने शहरी भारत की मनोवैज्ञानिक वास्तविकताओं का अद्वितीय दस्तावेज तैयार किया। दोनों कलाकार यह साबित करते हैं कि भारतीय आधुनिकता कोई एक शैली नहीं, बल्कि पहचान, स्मृति और अनुभव के अनेक दृष्टिकोणों के बीच एक सतत संवाद है। एक ने भारत की आदिम कल्पना को संरक्षित किया, तो दूसरे ने उसकी भावनात्मक सच्चाइयों को अभिव्यक्त किया। एक ही दिन जन्मे जगदीश स्वामीनाथन और बिकाश भट्टाचार्य ने अलग-अलग संसारों को अमर चित्रों में रूपांतरित किया और आधुनिक भारतीय कला के समानांतर स्थापत्यकार बनकर उभरे।
-प्रबुद्ध घोष

