भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौता व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में मंगलवार को मुंबई में उच्चस्तरीय बातचीत हुई। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बीच हुई इस मुलाकात में व्यापार, ऊर्जा, निवेश, रक्षा और उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों देशों के बीच पिछले कुछ महीनों से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है, लेकिन शुल्क संबंधी मतभेदों और ऊर्जा आयात के मुद्दे के कारण प्रक्रिया में चुनौतियां बनी हुई हैं। अब दोनों पक्ष समझौते के शेष मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
व्यापार समझौते पर जल्द सहमति बनने की उम्मीद
मुंबई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मार्को रुबियो ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की प्रगति को लेकर सकारात्मक संकेत दिए। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि समझौता पूरा होने के काफी करीब है और कुछ मुद्दों पर अभी काम बाकी है। हालांकि, दोनों देशों की ओर से समझौते की अंतिम शर्तों और लागू होने की तारीख की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए फिलहाल इसे अंतिम रूप से संपन्न समझौता मानना उचित नहीं होगा।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता का प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के कारोबारियों के लिए बाजार तक पहुंच आसान बनाना और व्यापारिक बाधाओं को कम करना है। भारत चाहता है कि उसके निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी अवसर मिलें, जबकि अमेरिका भी भारतीय बाजार में अपने उत्पादों और सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में रुचि रखता है। दोनों पक्षों के लिए ऐसा संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा जिससे व्यापार बढ़ने के साथ घरेलू उद्योगों के हितों की भी रक्षा की जा सके।
अमेरिकी टैरिफ और भारतीय निर्यातकों की नजर
व्यापार समझौते में अमेरिकी आयात शुल्क का मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता प्रभावित होने के बाद भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी शुल्क बढ़ाए गए थे। इसके बाद 2026 में कुछ शुल्क दरों में बदलाव हुआ। अमेरिकी बाजार में भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतिम समझौते में किन उत्पादों को कितनी राहत मिलती है और नई शर्तें कब से लागू होती हैं।
यदि समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर शुल्क संबंधी बाधाएं कम होती हैं, तो कपड़ा, परिधान, इंजीनियरिंग उत्पाद, दवाइयां और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों को अवसर मिल सकता है। हालांकि, लाभ सभी उद्योगों को समान रूप से नहीं मिलेगा। प्रत्येक क्षेत्र पर असर उत्पाद की श्रेणी, शुल्क दर, उत्पादन लागत और बाजार की मांग के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
ऊर्जा सहयोग भी बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा
भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग का मुद्दा भी इस मुलाकात के एजेंडे में शामिल रहा। भारत अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा संसाधन आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों, आपूर्ति की निरंतरता और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर दोनों देशों के बीच पहले मतभेद सामने आ चुके हैं। अमेरिका चाहता है कि उसकी ऊर्जा कंपनियों और उत्पादों के लिए अधिक अवसर बनें, जबकि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, किफायती आपूर्ति और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में ऊर्जा व्यापार को लेकर बातचीत केवल कारोबारी मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों की व्यापक आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी का भी हिस्सा है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, रुबियो की भारत यात्रा के दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी से जुड़े ऊर्जा सहयोग पर भी ध्यान दिया गया। वेनेजुएला के कच्चे तेल के प्रसंस्करण और उससे संबंधित संभावनाओं पर चर्चा इस यात्रा के आर्थिक पहलुओं में शामिल रही। हालांकि, किसी प्रस्ताव या बातचीत को अंतिम व्यावसायिक निर्णय मानने से पहले संबंधित कंपनियों और सरकारों की औपचारिक घोषणाओं की प्रतीक्षा करना जरूरी है। स्रोत: Associated Press
