मुंबई का ऐतिहासिक दादर कबूतरखाना एक बार फिर चर्चा में है। पिछले साल अगस्त से बंद पड़े इस कबूतरखाने को अब तिरपाल के बजाय एक्रिलिक शीट से ढकने की तैयारी की जा रही है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के जी-उत्तर विभाग ने यह निर्णय तब लिया, जब सामने आया कि कुछ फेरीवाले तिरपाल फाड़कर कबूतरखाने के भीतर अपना सामान रख रहे थे। इसके अलावा, परिसर में कचरा डालने की शिकायतें भी सामने आई हैं। बीएमसी के अनुसार, कबूतरखाने को ढकने का उद्देश्य वहां कबूतरों को दाना डालने पर लगी रोक का पालन सुनिश्चित करना और परिसर के दुरुपयोग को रोकना है। महानगरपालिका अब मौजूदा तिरपाल को हटाकर उसकी जगह एक्रिलिक शीट लगाने की तैयारी कर रही है। यह व्यवस्था फिलहाल अस्थायी होगी और आगे का निर्णय अदालत के निर्देशों के अनुसार लिया जाएगा।
पिछले साल हुई थी कार्रवाई
मुंबई में कबूतरखानों को बंद करने का मुद्दा पिछले वर्ष चर्चा में आया था। राज्य सरकार ने वर्ष 2025 के मानसून सत्र के दौरान मुंबई महानगरपालिका को कबूतरखानों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद बीएमसी ने दादर के प्रसिद्ध कबूतरखाने पर कार्रवाई करते हुए वहां बने अनधिकृत निर्माण और कबूतरों के लिए रखा गया दाना हटाया था। इसके बाद पूरे परिसर को तिरपाल से ढक दिया गया था।
इस कार्रवाई का कुछ पक्षीप्रेमियों और जैन समुदाय के सदस्यों ने विरोध किया था। मामला बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना खिलाने से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी सवालों और प्रशासनिक कार्रवाई पर सुनवाई हुई। तब से दादर का कबूतरखाना बंद है और तिरपाल से ढका हुआ है।
तिरपाल फाड़कर रखा जा रहा था सामान
बीएमसी के जी-उत्तर विभाग के सहायक आयुक्त योगेश देसाई के अनुसार, कबूतरखाने को तिरपाल से ढकने का उद्देश्य कबूतरों को दाना खिलाने की गतिविधि रोकना था। लेकिन कुछ लोगों ने तिरपाल फाड़कर परिसर में कचरा डालना शुरू कर दिया। फेरीवालों द्वारा वहां अपना सामान छिपाकर रखने की बात भी सामने आई।देसाई ने स्पष्ट किया कि महानगरपालिका बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेशों का पालन कर रही है। एक्रिलिक शीट लगाने का निर्णय इसलिए लिया गया है, ताकि परिसर का अनधिकृत इस्तेमाल रोका जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि यह अस्थायी उपाय है और कबूतरखाने के भविष्य को लेकर आगे का फैसला अदालत के अगले आदेशों के अनुसार किया जाएगा।
कबूतरखाना छोटा करने की भी मांग
दादर पश्चिम का कबूतरखाना मुंबई की पुरानी पहचान और ऐतिहासिक संरचनाओं में गिना जाता है। हालांकि, इसके आसपास बढ़ती यातायात समस्या और कबूतरों की संख्या को लेकर स्थानीय नागरिक लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के विधायक महेश सावंत ने कबूतरखाने का आकार छोटा करने और सड़क चौड़ीकरण के लिए जरूरी उपाय करने की मांग दोहराई है। उनका कहना है कि इस व्यस्त इलाके में यातायात की समस्या को देखते हुए प्रशासन को जनप्रतिनिधियों के सुझावों पर भी विचार करना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों के निर्णय लेने के तरीके पर भी सवाल उठाए।
स्वास्थ्य, आस्था और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
दादर कबूतरखाने को लेकर विवाद केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं है। एक ओर स्थानीय नागरिक कबूतरों की बीट, पंखों और उनसे जुड़ी स्वच्छता संबंधी समस्याओं को लेकर चिंता जताते रहे हैं। दूसरी ओर, पक्षीप्रेमियों और जैन समुदाय के कुछ सदस्यों के लिए कबूतरों को दाना खिलाना धार्मिक आस्था और लंबे समय से चली आ रही परंपरा से जुड़ा है। कबूतरों की बीट और पंखों के संपर्क से श्वसन संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है, विशेषकर संवेदनशील लोगों में। इसी तरह सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना और यातायात को सुचारु रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में इस मुद्दे पर निर्णय लेते समय स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, ऐतिहासिक संरचना के संरक्षण और नागरिकों की भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।फिलहाल, बीएमसी की योजना तिरपाल की जगह एक्रिलिक शीट लगाकर परिसर के दुरुपयोग को रोकने की है। यह कदम कबूतरखाने को दोबारा खोलने का निर्णय नहीं है। इसके भविष्य को लेकर अंतिम स्थिति अदालत के निर्देशों और महानगरपालिका की आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगी।

