क्या यह केवल भारत में ही होता है?

हाँ, मुख्य रूप से भारत और नेपाल जैसे हिंदू परंपरा वाले देशों में Pitru Paksha और Sarva Pitru Amavasya मनाया जाता है।
परंतु भारतीय प्रवासी समुदाय (अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देश आदि) में भी लोग अपनी सुविधा अनुसार तर्पण और श्राद्ध करते हैं। कुछ परिवार अगर बाहर होते हैं तो वे स्थानीय नदी/समुद्र तट पर जल तर्पण कर लेते हैं या किसी पंडित को भारत में दान/तर्पण के लिए कह देते हैं।
धार्मिक दृष्टि से: शास्त्रों में यह पुण्य कार्य माना गया है। कहा गया है कि श्राद्ध करने से पितर तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं, जिससे परिवार में शांति और समृद्धि आती है।
सांस्कृतिक दृष्टि से: यह हमारे पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने की परंपरा है।
आधुनिक दृष्टि से: यह अधिकतर श्रद्धा और विश्वास पर आधारित है। यदि कोई व्यक्ति न करे, तो यह उसकी व्यक्तिगत आस्था का विषय है।
न करने से क्या जीवन में परेशानी आती है?

मान्यता अनुसार:
न करने से झ्ग्ूrल् Dदेप् या पूर्वजों की असंतुष्टि होती है, जिससे जीवन में अड़चनें (जैसे विवाह में देरी, संतान सुख में बाधा, धन-हानि, मानसिक अशांति) आ सकती हैं।यह ज्योतिषीय मान्यता है, वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।
व्यावहारिक रूप से:
अगर कोई न करे तो इसका मतलब यह नहीं कि निश्चित रूप से परेशानी आएगी। कई लोग इसे नहीं करते, फिर भी उनका जीवन सामान्य रहता है।
परंपरा का पालन करने से मानसिक संतोष और पारिवारिक एकता बढ़ती है।
विकल्प (अगर पूरी विधि न कर सकें तो)
अगर कोई व्यक्ति बड़ा कर्मकांड नहीं करना चाहता या कर नहीं पाता, तो भी छोटे उपाय मान्य हैं:
सुबह पितरों को याद करके जल में तिल डालकर अर्पण करना।
किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन कराना या अन्न/वस्त्र दान करना।
घर में पके भोजन का थोड़ा भाग कौवे, गाय, कुत्ते आदि जीवों को खिलाना (क्योंकि इन्हें पितरों का दूत माना जाता है)।
सिर्फ़ पूर्वजों को स्मरण कर लेना और आभार व्यक्त करना भी आध्यात्मिक दृष्टि से श्राद्ध का ही एक रूप है। – दीपक झा

सरल घरेलू श्राद्ध विधि

सुबह स्नान कर साफ कपड़े पहनें। घर में एक स्वच्छ जगह चुनें (अधिमानतः पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके)। एक पाट (चौकी) पर सफेद कपड़ा बिछाएँ। उस पर भगवान विष्णु/कुलदेवता/पूर्वजों के फोटो रखें (अगर न हो तो सिर्फ़ एक दीपक जला सकते हैं)।

संकल्प

हाथ में थोड़ा जल, तिल और अक्षत (चावल) लें। मन ही मन कहें: ‘मैं अपने कुल और गोत्र के पितरों को स्मरण कर उनके तृप्ति और शांति के लिए यह श्राद्ध/तर्पण कर रहा हूँ।’

 तर्पण (जल अर्पण)

एक तांबे/स्टील के लोटे में जल भरें, उसमें थोड़ा काला तिल, फूल और चावल डालें।

सूर्य की ओर मुख करके धीरे-धीरे जल अर्पित करें। जल अर्पण करते समय पितरों को याद करें और कहें:  

‘ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः’

इसे ३ या ७ बार कर सकते हैं।

पिंड दान (यदि करना चाहें)

घर में पके हुए चावल, तिल और घी से छोटे-छोटे गोल पिंड बना लें। इन्हें एक पत्ते या साफ थाली में रखें और मन ही मन पितरों को अर्पित करें।

 दान एवं भोजन

परिवार के लिए सामान्य भोजन बनाएं, उसमें खीर/मीठा अवश्य रखें। उस भोजन का थोड़ा भाग अलग निकालकर कौवे, गाय, कुत्ते या चींटियों को खिलाएँ (यह पितरों को समर्पित माना जाता है)। यदि संभव हो तो किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन या अनाज/वस्त्र का दान करें।

प्रार्थना और समापन

दीपक जलाकर हाथ जोड़ें और प्रार्थना करें:

‘हे पितरों! हमारी रक्षा करें, हमें आशीर्वाद दें और हम सबको सुख-समृद्धि प्रदान करें।’ अंत में घर के सभी लोग भोजन करें।

ध्यान देने योग्य बातें

इस दिन माँसाहार, मदिरा, झूठ, वाद-विवाद आदि से बचें। श्राद्ध का मूल श्रद्धा है—मन से किया गया छोटा-सा कर्म भी स्वीकार होता है। यदि पूरी विधि संभव न हो, तो सिर्फ़ जल में तिल डालकर तर्पण करना और किसी जरूरतमंद को भोजन कराना भी पर्याप्त है। यह विधि सरल है और बिना पंडित बुलाए, घर पर पूरी श्रद्धा से की जा सकती है।

२०२५ में पितृपक्ष के प्रमुख श्राद्ध तिथियों की सूची दी जा रही है

तारीख (२०२५) श्राद्ध का दिन (तिथि)

७ सितंबर (रविवार) पूर्णिमा श्राद्ध

८ सितम्बर (सोम) प्रतिपदा श्राद्ध

९ सितम्बर (मंगल) द्वितीया श्राद्ध

१० सितम्बर (बुध) तृतीया और चतुर्थी श्राद्ध

११ सितम्बर (गुरु) पंचमी श्राद्ध (महाभरणी तिथि भी)

१२ सितम्बर (शुक्र) षष्ठी श्राद्ध

१३ सितम्बर (शनि) सप्तमी श्राद्ध

१४ सितम्बर (रवि) अष्टमी श्राद्ध

१५ सितम्बर (सोम) नवमी श्राद्ध

१६ सितम्बर (मंगल) दशमी श्राद्ध

१७ सितम्बर (बुध) एकादशी श्राद्ध

१८ सितम्बर (गुरु) द्वादशी श्राद्ध

१९ सितम्बर (शुक्र) त्रयोदशी और माघा श्राद्ध

२० सितम्बर (शनि) चतुर्दशी श्राद्ध

२१ सितम्बर (रवि) सर्वपितृ अमावस्या 

                         (महालया अमावस्या)

ध्यान दें कि Drik Panchang  के अनुसार अमावस्या तिथि शनि (२० सितंबर) को पड़ रही है, जबकि कुछ अन्य स्रोत इसे २१ सितंबर मानते हैं; इसलिए स्थानीय पंचांग से समय और तिथि की पुष्टि कर लेना बेहतर रहेगा 

पितृपक्ष के दौरान किए जाने वाले मुख्य अनुष्ठान

तर्पण: जल, तिल, अक्षत आदि से पितरों को जल अर्पण करना 

पिंडदान: चावल–तिल–घी से बने पिंड अर्पित करना 

श्राद्ध पूजा: ब्राह्मणों को भोजन और दान के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करना 

दान : भूखे, जरूरतमंदों को भोजन व वस्त्र दान; आधुनिक समय में NGO के माध्यम से भी किया जाता है 

नदी-तट या घर में पूजा विधि: परंपरागत रूप से नदी में जाकर तर्पण किया जाता है; घर पर भी श्राद्ध सहजता से संभव है 

Pitru Paksha 2025 का समय: ७ सितम्बर से २१ सितम्बर

इस दौरान दैनिक स्वरूप में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान के माध्यम से पूर्वजों को श्रद्धांजलि दी जाती है। अध्यात्मिक दृष्टि से यह समय पितृ ऋण, आशीर्वाद और मोक्ष के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का अत्यधिक महत्व है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस समय पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धा से किए गए कर्म, दान और तर्पण अत्यंत फलदायी होते हैं। पितृ पक्ष २०२५ (८ से २२ सितंबर) एक ऐसा समय है जब हमें अपने पूर्वजों को स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए। यह न केवल धार्मिक कर्तव्य है बल्कि पारिवारिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी जीवन में शांति और संतुलन लाता है। 

पितृ पक्ष का महत्व

इस काल में पूर्वज (पितृ) धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से श्राद्ध व तर्पण की अपेक्षा रखते हैं। श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। यह माना जाता है कि पितरों के आशीर्वाद से परिवार में सुख-समृद्धि, संतान सुख और आयु वृद्धि होती है। यदि श्राद्ध न किया जाए तो पितृ दोष उत्पन्न होकर जीवन में बाधाएँ, असफलता और मानसिक क्लेश ला सकता है।

पितृ पक्ष में क्या करें

प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।

पितरों के नाम से तिल, जल और पिंडदान करें।

ब्राह्मण, गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों को भोजन कराएँ।

जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दान दें।

अपने गोत्र या कुल के पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करें।

क्या न करें

इस समय नए कार्य, शादी, गृहप्रवेश, नया व्यवसाय आरंभ नहीं किया जाता।

मांस, शराब, तंबाकू और नशा वर्जित है।

दूसरों का अपमान, क्रोध, कटु वचन बोलना पितरों को अप्रसन्न करता है।

पौराणिक मान्यताएँ

महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध और पितृ पक्ष का महत्व बताया था। गर्भोपनिषद में कहा गया है कि पितरों को प्रसन्न किए बिना देवताओं की पूजा भी अधूरी मानी जाती है। गरुड़ पुराण में वर्णित है कि जो संतान पितरों का श्राद्ध करती है, उसके कुल में समृद्धि बनी रहती है।

विशेष दिन – सर्वपितृ अमावस्या (२२ सितंबर २०२५)

यह दिन उन सभी पितरों के लिए श्राद्ध का होता है जिनका तिथि श्राद्ध भूलवश नहीं किया गया। इस दिन पूरे श्रद्धा-भाव से तर्पण और दान करने से सभी पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है।

 

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *