एक दिन मोहल्ले में लॉटरी टिकट बेचने वाला आया। रामकिशन ने बिना सोचे समझे पाँच टिकट खरीद लिए। पत्नी ने टोका —
‘घर में आटा खत्म हो रहा है और आप टिकट खरीद लाए!’
रामकिशन बोला — ‘भाग्य बदलने के लिए थोड़ी क़ुरबानी देनी ही पड़ती है।’
कुछ ह़फ्तों बाद मोहल्ले में खबर फैल गई कि रामकिशन का नाम लॉटरी के विजेताओं की सूची में आया है।
‘पाँच करोड़ की लॉटरी!’
रामकिशन की दुकान लखनऊ की मशहूर बाजार में थी। छोटी-सी किराना दुकान, लेकिन मेहनती आदमी था। पूरे मोहल्ले में उसकी ईमानदारी की चर्चा थी। लेकिन एक समस्या थी — रामकिशन हमेशा अपने भाग्य को कोसता रहता। ‘भाई साहब,’ वह रोज़ अपने ग्राहकों से कहता, ‘कितना भी मेहनत कर लो, अमीर तो वही बनता है जिसके घर लॉटरी लग जाए। हमारी तो किस्मत ही फूटी है।’
उसके मित्र, पानवाले गोपाल, अक्सर उसे समझाते — ‘रामू, मेहनत से बड़ी कोई पूँजी नहीं होती।’ रामकिशन हँसकर कहता
‘भाई, मेहनत से तो पेट भरता है, नाम और शान तो किस्मत से मिलती है।’
एक दिन मोहल्ले में लॉटरी टिकट बेचने वाला आया। रामकिशन ने बिना सोचे समझे पाँच टिकट खरीद लिए। पत्नी ने टोका —
‘घर में आटा खत्म हो रहा है और आप टिकट खरीद लाए!’
रामकिशन बोला — ‘भाग्य बदलने के लिए थोड़ी क़ुरबानी देनी ही पड़ती है।’
कुछ ह़फ्तों बाद मोहल्ले में खबर फैल गई कि रामकिशन का नाम लॉटरी के विजेताओं की सूची में आया है।
‘पाँच करोड़ की लॉटरी!’
यह सुनते ही लोग दौड़ पड़े। मोहल्ले के लोग, रिश्तेदार, यहाँ तक कि जिनसे सालों से बातचीत नहीं हुई थी, सब रामकिशन के घर आने लगे। रामकिशन की दुकान पर अचानक भीड़ उमड़ पड़ी। जो पहले उधार मांगने आता था और गालियाँ सुनकर जाता था, अब वही मिठाई का डिब्बा लाकर कहता —
‘रामू भाई, आपने तो मोहल्ले का नाम रोशन कर दिया।’
पत्नी, जो कल तक ताने देती थी, अब पड़ोसिनों से गर्व से कहने लगी —
‘देखा! मेरे रामू की किस्मत खुल गई।’
रामकिशन खुद भी सपनों में खो गया। वह सोचने लगा — ‘पहले शहर में बड़ा मकान बनाऊँगा, फिर नई कार खरीदूँगा, बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल में डालूँगा। और हाँ, श्थ्A का चुनाव भी लड़ूँगा।’ अगले ही ह़फ्ते अख़बार वाले इंटरव्यू लेने आ गए। ‘आपको करोड़पति बनने पर कैसा लग रहा है?’
रामकिशन हकला गया, लेकिन फिर सीना फुलाकर बोला — ‘अब मैं गरीब नहीं रहा। अब तो अपने शहर की तस्वीर बदल दूँगा।’
सियासतदान भी सक्रिय हो गए। एक बड़े नेता ने रामकिशन को फोन किया — ‘भाई साहब, हमारी पार्टी में शामिल हो जाइए। करोड़पति जैसे सज्जन की हमें ज़रूरत है।’ रामकिशन को पहली बार लगा कि वाकई अब वह कोई खास आदमी बन गया है।
लेकिन जब वह लॉटरी ऑफिस पहुँचा तो हकीकत सामने आई।
क्लर्क ने लापरवाही से कहा —
‘रामकिशन जी, आपका नाम सूची में तो आया था, लेकिन यह केवल सांत्वना पुरस्कार है। पाँच करोड़ नहीं, सिर्फ़ पाँच हज़ार रुपये हैं।’
रामकिशन की आँखें फटी रह गईं।
‘क्या? पाँच हज़ार? और अख़बारों में तो करोड़ लिखा था!’
क्लर्क ने कंधे उचका दिए — ‘गलती से खबर फैल गई। असली करोड़पति कोई और निकला।’
रामकिशन का पूरा शरीर ढह गया।
जब वह घर लौटा तो देखा कि घर का नज़ारा बदल चुका है।
जो रिश्तेदार मिठाई लेकर आए थे, वे अब गायब थे।
नेता जी का फोन भी बंद हो गया।
मोहल्ले के लोग, जो कल तक दुआएँ दे रहे थे, आज हँस-हँसकर कह रहे थे —
‘करोड़पति साहब पाँच हज़ार में ही संतोष कर लें।’ रामकिशन ने पत्नी की ओर देखा। वह गुस्से से बोली —
‘कहती थी न, टिकट मत खरीदो! अब पूरे मोहल्ले में हंसी का पात्र बन गए।’
रामकिशन ने सिर पकड़ लिया।
हवाओं में फिर वही आवाज़ गूँज रही थी —
‘किस्मत से नहीं, मेहनत से अमीरी आती है।’ रामकिशन करोड़पति तो न बन सका, लेकिन मोहल्ले का ‘लॉटरी का जादूगर’ ज़रूर बन गया — जिसकी कहानी सुनकर लोग अब भी हँसते हैं और कहते हैं:
‘अरे, सपनों से पेट नहीं भरता, मेहनत से भरता है।’ -नेहा गुप्ता

