मैं पत्नी नहीं, मैं केवल स्त्री नहीं,
मैं एक अधूरी आवाज़ हूँ जो अब पूरी होना चाहती है।’
उसकी आँखों से आँसू गिरे। लेकिन वे कमज़ोरी के
नहीं थे।वे जन्म के आँसू थे।
रवि ने दरवाज़े पर दस्तक दी।
‘तुम क्या कर रही हो?’ ‘अपना कमरा वापस ले रही हूँ।’ ‘यह घर तो हमारा है।’ ‘और यह कमरा मेरा।’ पहली बार दोनों के बीच दीवार खड़ी हुई— ईंट की नहीं, सच की। शोभा ने अख़बार में कॉलम भेजा। पहली बार
अपने नाम से।

शोभा के घर में तीन कमरे थे।
एक में वह और उसका पति सोते थे।
दूसरे में उनका बेटा।
तीसरा कमरा हमेशा बंद रहता था।
उस कमरे में ताले नहीं थे, फिर भी कोई अंदर नहीं जाता।
वहाँ पुरानी किताबें थीं, धूल जमी अलमारी थी और एक टूटी कुर्सी।
वह कमरा शोभा का था—लेकिन अब नहीं।
शादी के बाद धीरे-धीरे वह कमरा गोदाम बन गया, और शोभा खुद एक चलती-फिरती मशीन।
सुबह पाँच बजे उठना।
चाय बनाना।
रवि का टिफ़िन।
रोहन की स्कूल बस।
सास की दवा।
फिर बाज़ार।
फिर दोपहर का खाना।
फिर शाम की थकान।
दिन ऐसे बीतते जैसे किसी ने उसे घड़ी के भीतर कैद कर दिया हो।
रवि अक्सर कहता,
‘तुम हर बात को ़ज्यादा सोचती हो। घर ठीक चल रहा है न? बस वही काफ़ी है।’
घर सच में ठीक चल रहा था।
पर शोभा ठीक नहीं थी।
उसे याद था—
वह कॉलेज में कविता लिखती थी।
मैगज़ीन में दो बार छपी थी।
उसके प्रोफ़ेसर ने कहा था,
‘तुम्हारी भाषा में आग है।’
अब उसकी भाषा में बस चुप्पी थी।
एक दिन नगर पुस्तकालय में उसकी मुलाक़ात सुधीर से हुई।
वह पुरानी किताबें खोज रहा था।
उसने पूछा,
‘क्या आपको ‘निर्मल वर्मा’ की किताब मिलेगी यहाँ?’
शोभा ने बिना देखे कहा,
‘दूसरी अलमारी में।’
फिर रुकी।
किसी ने उससे सवाल पूछा था—काम का नहीं, किताब का।
सुधीर मुस्कराया,
‘आप भी पढ़ती हैं?’
शोभा ने कहा,
‘पहले लिखा करती थी।’
‘अब?’
‘अब समय नहीं मिलता।’
सुधीर बोला,
‘समय नहीं मिलता या हम समय चुरा नहीं पाते?’
यह वाक्य उसे घर तक पीछा करता रहा।
उनकी मुलाक़ातें बढ़ीं।
हर हफ्त़े लाइब्रेरी में।
वे कविता पर बात करते।
समाज पर।
औरत पर।
शोभा पहली बार खुलकर बोल रही थी।
कोई उसे बीच में टोकता नहीं था।
कोई नहीं कहता—‘यह फ़ालतू है।’
एक दिन उसने कहा,
‘मैं अपने ही घर में मेहमान हूँ।’
सुधीर ने जवाब नहीं दिया।
बस कहा,
‘तुम्हारा तीसरा कमरा अभी ज़िंदा है।’
शोभा चौंकी,
‘तुम्हें कैसे पता?’
‘तुम्हारी आँखों से।’
घर में माहौल बदल रहा था।
रवि ने महसूस किया कि शोभा देर
से आती है।
मोबाइल मुस्कराकर देखती है।
कभी-कभी चुपचाप लिखती है।
एक रात उसने कहा,
‘तुम्हें कोई मिल गया है क्या?’
शोभा ने कहा,
‘हाँ।’
रवि सन्न रह गया।
‘कौन?’
‘मैं खुद।’
यह जवाब रवि नहीं समझ सका।
समाज को समझ आ गया।
पड़ोसन बोली,
‘अब लाइब्रेरी जाती है…
पढ़ी-लिखी औरतें ़ज्यादा बिगड़ती हैं।’
सास ने कहा,
‘औरत का असली धर्म घर है।’
माँ बोली फोन पर,
‘सब सह लो, इ़ज्ज़त बची रहे।’
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा—
‘तुम क्या चाहती हो?’
एक दिन सुधीर ने कहा,
‘तुम भाग क्यों नहीं जाती?’
शोभा बोली,
‘मैं किसी के पास नहीं भागना चाहती।
मैं अपने पास जाना चाहती हूँ।’
उस रात उसने तीसरा कमरा खोला।
धूल झाड़ी।
किताबें निकालीं।
कुर्सी ठीक की।
डायरी खोली।
पहली पंक्ति लिखी:
‘मैं पत्नी नहीं, मैं केवल स्त्री नहीं,
मैं एक अधूरी आवाज़ हूँ जो अब पूरी होना चाहती है।’
उसकी आँखों से आँसू गिरे।
लेकिन वे कमज़ोरी के नहीं थे।
वे जन्म के आँसू थे।
रवि ने दरवाज़े पर दस्तक दी।
‘तुम क्या कर रही हो?’
‘अपना कमरा वापस ले रही हूँ।’
‘यह घर तो हमारा है।’
‘और यह कमरा मेरा।’
पहली बार दोनों के बीच दीवार खड़ी हुई—
ईंट की नहीं, सच की।
शोभा ने अख़बार में कॉलम भेजा।
पहली बार अपने नाम से।
विषय था:
‘घर में रहते हुए बेघर स्त्री’
तीन दिन बाद फोन आया—
‘आपका लेख प्रकाशित हो रहा है।’
उसने फोन काटकर छत पर जाकर आसमान देखा। उसे लगा जैसे
- एम. पाठारे

