भारत में त्योहार केवल परंपरा नहीं होते, वे समाज की आत्मा होते हैं। महाशिवरात्रि ऐसा ही पर्व है, जहाँ आस्था और अनुशासन एक साथ दिखाई देते हैं। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। इस दिन लाखों श्रद्धालु उपवास रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और पूरी रात जागरण कर अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की कामना करते हैं।

जब पूरी दुनिया रात के अंधकार में डूबी होती है, तब शिवभक्त जागरण में लीन होते हैं। जब सामान्य रात नींद के लिए होती है, तब महाशिवरात्रि आत्मजागरण की रात बन जाती है। महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संयम, साधना और आत्मचिंतन का प्रतीक है। यह वह पावन रात्रि मानी जाती है जब भगवान शिव ने तांडव कर सृष्टि को संतुलन का संदेश दिया और शिव-शक्ति के मिलन से जीवन में ऊर्जा का संचार हुआ। भारत में यह पर्व सदियों से श्रद्धा और अनुशासन के साथ मनाया जाता रहा है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि पर देशभर के शिवालयों में विशेष पूजा, अभिषेक और रात्रि जागरण का आयोजन होता है। श्रद्धालु उपवास रखकर शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करते हैं तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ के मंत्रोच्चार से वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।
वर्ष २०२६ में महाशिवरात्रि एक बार फिर करोड़ों लोगों को आत्मसंयम, आस्था और आध्यात्मिक शुद्धि का अवसर प्रदान कर रही है। इस विशेष अवसर पर पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत के नियमों को जानना न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक परंपरा को समझने का माध्यम भी है। महाशिवरात्रि हमें यह सिखाती है कि भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और अनुशासित बनाने का मार्ग है।


महाशिवरात्रि २०२६ — तिथि और दिन
महाशिवरात्रि २०२६ हिन्दी पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आती है। चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: १५ फरवरी २०२६ (रविवार) शाम ।०५:०४
चतुर्दशी तिथि समाप्त: १६ फरवरी २०२६ (सोमवार) शाम ।०५:३४
इसलिए महाशिवरात्रि मुख्य रूप से १५ फरवरी २०२६ को मनाई जाती है, क्योंकि तिथि का निशीथ काल (मध्यरात्रि) इसी दिन पड़ता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त
निशीथ-काल (सबसे शुभ समय)
१५ फरवरी २०२६ रात: लगभग ११:५५ PM से १२:५६ AM तक (यह वह काल है जब पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है)
चार प्रहर पूजा-समय
पूजा को रातभर चार प्रहर (चौथाई रात) में बांटकर विधि-विधान से करने से शुभ माना जाता है:
प्रथम प्रहर: १५ फर. शाम ।०६:१० से ।०९:२० तक
द्वितीय प्रहर: १५ फर. ।०९:२० से १२:३६ तक , तृतीय प्रहर: १६ फर. ।१२:३६ से ।०३:४७ तक चतुर्थ प्रहर: १६ फर. ।०३:४७ से ।०६:५९ तक
(ये समय पंचांग/ज्योतिष आधारित अनुमानों पर आधारित हैं — स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा बदल सकते हैं)
पारण (व्रत तोड़ने) का समय
१६ फरवरी २०२६ सुबह: लगभग ०६:४० से ०३:१० बजे तक पारण किया जा सकता है।
धार्मिक महत्व और पौराणिक कथाएँ
महाशिवरात्रि का महत्व कई दृष्टिकोणों से समझा जाता है:
लॉर्ड शिव का तांडव (ब्रह्मांडीय नृत्य):
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात भगवान शिव ने तांडव किया था, जो जीवन-मृत्यु, सृजन-संहार का प्रतीक है।
शिव-पार्वती विवाह:
कुछ मान्यताओं में यह रात शिव और पार्वती के विवाह का समय भी माना जाता है — शक्ति और शिव का ऐक्य।
शिव की उपासना का श्रेष्ठ काल:
निशीथ काल में भगवान शिव की आराधना करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा मानसिक-आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है।
पूजा-विधि —
महाशिवरात्रि पूजा में मुख्य रूप से ये विधियाँ शामिल होती हैं: सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें।
शिवलिंग या शिव मूर्ति का पंचामृत से अभिषेक करें — दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल से। धूप-दीप, बेलपत्र, धतूरा, फल आदि अर्पित करें। शिव मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप/जप रातभर करें—जितना अधिक संयम और मनोयोग, उतना अधिक फलदायी माना जाता है। चार प्रहर में आरती-पूजा और ध्यान निधि चित्त से करें।
व्रत के नियम (आम धार्मिक मान्यता)
दिनभर निराहार या फलाहार रखा जाता है (स्थानीय रीति-रिवाज के अनुसार)।
निर्जल व्रत या हल्का उपवास रखा जाता है, जैसे फैलाहार/फलाहार पर कुछ ब्राह्मण परंपराएँ ज़ोर देती हैं। रातभर जागरण, शिवलिंग पर जलाभिषेक और भजन-कीर्तन करना शुभ माना जाता है। – संगीता सैनी

