सत्ता का अस्थायी घर या नेताओं की स्थायी सुविधा
भारत में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन कुछ सुविधाएँ नहीं बदलतीं। मंत्री आते-जाते हैं, सरकारें गिरती-बनती हैं, पर सरकारी बंगले अपनी जगह अडिग रहते हैं। औपनिवेशिक दौर में जिन आवासों को सत्ता के प्रतीक के रूप में बनाया गया था, आज वे भारतीय राजनीति में entitlement की सबसे स्थायी निशानी बन चुके हैं।
भारत में ‘सरकारी बंगलों’ की परंपरा औपनिवेशिक दौर से चली आ रही है। दिल्ली के लुटियंस ज़ोन जैसे इलाक़ों में बने ये विशाल, हरियाली से घिरे, कई कमरे वाले आवास कभी घ्ण्ए अधिकारियों और उच्च ब्रिटिश हुक्मरानों के लिए बनाए गए थे। आज़ादी के बाद ये बंगले सांसदों, मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों और कुछ विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों के लिए आरक्षित हो गए। समस्या तब पैदा हुई जब ये बंगले ‘कुर्सी से जुड़े अस्थायी आवास’ के बजाय ‘स्थायी सुविधा’ का रूप लेने लगे। कई नेता पद छूटने के बाद भी वर्षों तक यह आवास खाली नहीं करते। हर चुनाव, हर कार्यकाल, और हर सरकार बदलने पर यह मुद्दा बार-बार सामने आता है। यह रिपोर्ट बताती है कि सरकारी बंगला होता क्या है, किन नियमों के तहत आवंटित और रद्द होता है, और किन प्रमुख नेताओं को वर्षों में इन्हें खाली करने पड़े या आदेश प्राप्त हुए।
सरकारी बंगले की व्यवस्था क्या है?
केंद्र सरकार (Directorate of Estates) मंत्रियों, सांसदों और उच्च अधिकारियों को पदानुसार आवास देती है। बंगले Type IV से लेकर Type VIII और उससे ऊपर की श्रेणियों में आते हैं—जिनमें लुटियंस क्षेत्र के बड़े बंगले सबसे महंगे और प्रतिष्ठित माने जाते हैं। किराया नाममात्र होता है, इसलिए यह सुविधा भारतीय राजनीति की सबसे आकर्षक ‘‘VIP लूट’ मानी जाती है। पद छूटते ही आवास खाली करने का नियम है—लेकिन व्यवहार में अक्सर नोटिस, कानूनी प्रक्रियाएँ, बिजली-पानी कटौती और महीनों की खींचतान के बाद बंगला खाली होता है।
बंगला खाली करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
- लोकसभा/राज्यसभा सदस्यता समाप्त होना
- मंत्री पद से हटना
- सुरक्षा श्रेणी (जैसे SPG) का हटना
- अदालत का सीधा आदेश
- विभाग द्वारा अवैध कब्जा घोषित करना
सरकार का दावा है कि बार-बार नोटिस देने के बावजूद बड़ी संख्या में पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री बंगला नहीं छोड़ते। यह नया सांसदों/मंत्रियों के आवास aत्त्दूसहू को प्रभावित करता है। अपनी किताब में चंद्रशेखर लिखते हैं कि उन दिनों इंदिरा जी सफदरजंग की अपनी सरकारी कोठी में ही थीं। बात करते हुए उन्होंने महसूस किया कि इंदिरा गांधी बेहद परेशान हैं। उनको अपनी और परिवार की चिंता सता रही है। कहने लगीं कि बहुत परेशानी है, लोग आकर बताते हैं कि संजय गांधी को जलील किया जाएगा। दिल्ली में घुमाया जाएगा। मुझे मकान नहीं मिलेगा। हमारी सुरक्षा खत्म कर दी जाएगी। इंदिरा गांधी की बात सुनकर मुझे हैरानी हुई। मैं सीधे वहां से मोरारजी भाई के पास गया। मैंने उनसे पूछा कि क्या आप इंदिरा जी को मकान नहीं देंगे? मोरारजी भाई ने कहा कि नहीं देंगे क्योंकि नियम में नहीं आता। मैंने उन्हें बताया कि जाकिर हुसैन, लाल बहादुर शास्त्री, ललित नारायण मिश्र के परिवार को मकान मिला हुआ है? मोरारजी भाई ने कहा कि मैं उनका भी कैंसिल कर दूंगा।
मैंने उनसे कहा कि जिस परिवार ने स्वराज भवन और आनंद भवन देश को दे दिया, जो महिला ११ साल प्रधानमंत्री रहीं, उनको रहने के लिए आप मकान तक नहीं देंगे? इसके बाद मोरारजी भाई से मेरी बड़ी बहस हुई। अंत में वह माने, यह कहते हुए कि जब आप कहते हैं तो मकान दे दूंगा। ऐसे इंदिरा परिवार संग पहुंची ‘१२, विलिंग्डन क्रिसेंट’ वैसे मकान खाली करने को लेकर इंदिरा गांधी काफी परेशान थीं। इस मामले पर राशिद किदवई अपनी किताब २४ अकबर रोड में लिखते हैं कि आपातकाल के बाद का समय इंदिरा गांधी के लिए परीक्षा साबित हो रहा था। न केवल वह अपनी सारी पावर गंवा चुकी थी बल्कि पद जाने के साथ ही उनका सरकारी आवास भी हाथ से निकल गया था। उनका महरौली स्थित फार्म हाउस भी अभी अधबना ही था और बहुत तेजी के साथ उनके दोस्त भी साथ छोड़ रहे थे, जिनमें विश्वसनीय दोस्त भी शामिल थे।
जब इंदिरा गांधी की दिक्कतें और बढ़ीं तो उनके पुराने वफादार मोहम्मद युनूस ने अपना १२ विलिंगडन क्रीसेंट सरकारी आवास उनके परिवार को रहने के लिए दिया और खुद दक्षिण दिल्ली स्थित अपने निजी आवास में चले गये। इस तरह १२ विलिंगडन क्रीसेंट गांधी परिवार का नया ठिकाना बना। इंदिरा गांधी वहां राजीव गांधी, सोनिया गांधी, बच्चे राहुल और प्रियंका, संजय गांधी, मेनका गांधी और पांच पालतू कुत्तों के साथ आईं लेकिन इस घर में इतनी जगह नहीं थी कि यहां से किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियां चलाई जा सकें। इसलिए २४ अकबर रोड को कांग्रेस का नया हेडक्वॉर्टर बनाया गया जो कि अगले चार दशक बहुत भाग्यशाली साबित हुआ। इस भवन का एक फायदा यह भी था कि इसका एक दरवाजा १० जनपथ को जोड़ता था, जो उस समय यूथ कांग्रेस का दफ्तर हुआ करता था। कई वर्षों से १०, जनपथ सोनिया गांधी को मिला हुआ बंगला है। यह बंगला प्रधानमंत्री आवास से भी बड़ा है।
- ‘मंत्री पद छूटे, बंगला नहीं’
- बंगले की कीमत यानि राजनीति में बड़ा प्रतीक
- सामान्य किराए की तुलना में सैकड़ों गुना सस्ते
- सुविधाओं से भरपूर,
- करोड़ों की निजी प्रॉपर्टी के बराबर
- मुख्यमंत्री आवासों का विवाद वर्षों से
- मंत्री आते-जाते हैं, पर बंगला जाने नहीं देते।
- हाई कोर्ट की फटकार
राहुल गांधी के घर खाली करने पर Mallikarjun Kharge बोले- मेरे घर में रहेंगे राहुल। मोहम्मद युनुस खान, इंदिरा गांधी के काफी करीबी माने जाते थे। यूनुस साल १९७४ में वाणिज्य मंत्रालय के सचिव के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। उसके बाद १९७५ में उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विशेष दूत के रूप में नियुक्त किया गया था। वहीं १९७५ से १९७७ यााfन आपातकाल के दौरान , यूनुस खान, इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकारों में से एक थे। तब मोहम्मद युनुस इसी सरकारी बंगले १२ विलिंगडन क्रिसेंट में रहते थे। प्रमुख मामले जब नेताओं को बंगला खाली करना पड़ा या आदेश मिला। नीचे उन मामलों का चयन है, जो अधिक चर्चा में रहे—केंद्र से लेकर राज्यों तक।
राहुल गांधी: लोकसभा सदस्यता समाप्त होने के बाद १२, तुग़लक रोड का उनका आधिकारिक आवास छोड़ना पड़ा। यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर सबसे चर्चित रहा।
स्मृति ईरानी : २०२४ लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने लुटियंस का २८ Tughlak Crescent बंगला खाली किया।
Adhir Ranjan Chowdhury — २०१६ में, मंत्री पद छोड़ने के बाद उनके दिल्ली के Type-VIII बंगले से निकाले जाने का मामला सामने आया था।
Ambika Soni Deewj Kumari Selja — २०१५ में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर दोनों को उनके राजकीय बंगले खाली करना पड़ा था।
अरविंद केजरीवाल : दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपना सरकारी आवास खाली कर दिया. राजनीति में आने से पहले दिल्ली से सटे गाजियाबाद में अरविंद केजरीवाल परिवार के संग रहते थे. जब वे पहली बार २०१३ में दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, तब आईटीओ के समीप तिलक लेन के सरकारी फ्लैट मैं कुछ समय तक रहे. दोबारा वर्ष २०१५ में जब पूर्ण बहुमत से आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तब से लेकर अभी तक अरविंद केजरीवाल सिविल लाइंस स्थित इसी सरकारी आवास में रह रहे थे. इसी आवास के एक हिस्से में मुख्यमंत्री कार्यालय भी चल रहा था. लेकिन वर्ष २०२० में जब तीसरी बार केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने तब इस सरकारी आवास के सौंदर्यीकरण का फैसला लिया गया. उसके बाद से यह सरकारी आवास विवादों के चलते सुर्खियों में आ गया. विपक्ष ने इसे शीशमहल का नाम दिया. इसके सौंदर्यीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च हुए और तब से आम आदमी पार्टी में केजरीवाल के करीबी नेताओं को ही इस आवास में एंट्री थी. बाहर से आए आगंतुकों के लिए एक क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रखा गया था. आज आखिरकार यह आवास छोड़कर अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी के सांसद अशोक मित्तल को नई दिल्ली के फिरोजशाह रोड स्थित बंगला नंबर ५ में परिवार संग शिफ्ट हुए. १६वीं लोकसभा समाप्त होने पर लगभग २०० से अधिक पूर्व MPs को बंगला खाली करने के नोटिस जारी हुए। कईयों के बिजली-पानी कनेक्शन तक काटने पड़े।
पूर्व केंद्रीय मंत्री
A. राजा, दयानिधि मारन, एस. एम. कृष्णा, ण्झ् जोशी, पवन बंसल आदि—ये सभी मंत्री पद छोड़ने के बाद भी बंगले में बने रहे, जिन्हें अंततः खाली करना पड़ा।
उत्तर प्रदेश के ६ पूर्व मुख्यमंत्री
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ आदेश दिया कि कोई भी पूर्व ण्श् स्थायी रूप से सरकारी बंगला नहीं रख सकता। इसे खाली करना पड़ा-
- मुलायम सिंह यादव
- अखिलेश यादव
- मायावती
- राजनाथ सिंह
- कल्याण सिंह
- नारायण दत्त तिवारी
महाराष्ट्र: सरकारी बंगले–संबंधी विवाद
महाराष्ट्र उन राज्यों में है जहाँ पूर्व मंत्रियों द्वारा बंगले नहीं छोड़ने की समस्या बार-बार सामने आती है। कई मंत्री पद छोड़ने के बाद भी महीनों तक सरकारी आवास में टिके रहते हैं। वजह: राजनीतिक पहुँच, विभागों की ढीली कार्रवाई और व्यवस्था में ‘VIP स्थायी अधिकार’ वाला मानसिकता।
एक बार में २२ पूर्व मंत्रियों को नोटिस (२०१४)
राज्य सरकार ने एक साथ २२ पूर्व मंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने का नोटिस दिया था। ये मंत्री नई सरकार आने के बाद भी महीनों तक अपने आवास में जमे रहे थे। यह मामला मीडिया में खूब उछला, क्योंकि कुछ मंत्री लगभग एक साल तक बंगले में रहे। महाराष्ट्र में आवास विभाग (GAD + PWD) ये मान चुका है कि हर कार्यकाल खत्म होते ही २०–३०% पूर्व मंत्री बंगला खाली नहीं करते। कई बार राज्य सरकार को बिजली-पानी कनेक्शन काटने जैसी कार्रवाई तक करनी पड़ी। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री आवासों—जैसे ‘वर्षा’, ‘राजभवन के पास के बंगले’, ‘सागर’ और ‘रामटेक’—को लेकर भी विवाद रहे हैं कुछ CMs के परिवार पद छोड़ने के बाद भी लंबे समय तक परिसर में रह गए, जिसके कारण नए ण्श् को वैकल्पिक आवास से काम शुरू करना पड़ा। लुटियंस दिल्ली की तरह, मुंबई के मालाबार हिल, पेडर रोड और नरीमन पॉइंट जैसे सरकारी आवास भी राजनीति में प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं।
ये बंगले:
- सामान्य किराए की तुलना में सैकड़ों
- गुना सस्ते
- सुविधाओं से भरपूर,
- और लोकेशन के कारण करोड़ों की निजी प्रॉपर्टी के बराबर माने जाते हैं।
- इसीलिए महाराष्ट्र हो या दिल्ली में ‘बंगला न छोड़ने’ का लालच सबसे ़ज्यादा दिखाई देता है।
महाराष्ट्र हाई कोर्ट ने कई बार सरकार को चेताया कि ‘पूर्व अधिकारी और पूर्व नेता सरकारी बंगले को निजी हक़ समझकर वर्षों तक दम्म्ल्ज्ब् नहीं कर सकते।’ कोर्ट ने इसे ‘टैक्सपेयर्स के साथ धोखा’ बताया। इसके बाद कुछ बड़े बंगले खाली करवाए गए, लेकिन आदत पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई। महाराष्ट्र सरकार के आवास विभाग ने खुद माना कि हर सरकार बदलने पर कम से कम १०–१५ बड़े बंगले गैरकानूनी कब्ज़े में मिलते हैं। मंत्री आते-जाते हैं, पर बंगला जाने नहीं देते।
बंगला ट्रांसफर का असली सिस्टम
सीधा नियम है नया ण्श् पद संभाले तो पुराना ण्श् १५–३० दिन में आधिकारिक बंगला खाली करे। पूरा आवास सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चेक किया जाता है।फिर चाबियाँ नए ण्श् को मिलती हैं। लेकिन कई पूर्व ण्श् ‘परिवार अभी शिफ्ट हो रहा है’, ‘रिनोवेशन चल रहा है’, ‘सिक्योरिटी इंतज़ार में है’ जैसे बहाने लगाकर ३–६ महीने तक टिके रहते हैं। महाराष्ट्र और यूपी इस मामले में सबसे बदनाम हैं।
नया CM जब बंगला नहीं मिल पाता तब?
यह हिस्सा आम जनता को पता ही नहीं होता। वे अस्थायी सरकारी गेस्ट हाउस में रहते हैं। या सचिवालय के पास बने ट्रांज़िट आवास में। कई बार होटल को ‘अस्थायी सरकारी सुविधा’ घोषित किया जाता हैर्। Z+ सुरक्षा टीमों को बिना मुख्यालय के अस्थायी कैंप लगाना पड़ता है। इससे राज्य सुरक्षा मशीनरी हफ्तों तक अस्थिर रहती है। वे निकलने में जान-बूझकर देर करते हैं।
३६ पूर्व सांसद — ‘अवैध कब्जाधारी सूची’
जिनमें जॉर्ज फर्नांडिस, शंकरसिंह वाघेला, विनोद खन्ना सहित कई नाम आए—जिन्हें सरकारी सूची में ‘unauthorized occupants’ कहा गया।
२०२२–२३ के पूर्व केंद्रीय मंत्री
रमेश पोखरियाल निशंक
प्रकाश जावड़ेकर
हर्षवर्धन
इन सबको बंगला छोड़ना पड़ा जब वे मंत्री नहीं रहे।
बिहार — राबड़ी देवी केस (२०२५)
पटना के १०, सर्कुलर रोड वाला आवास २०+ साल उपयोग में था—लेकिन २०२५ में इसे खाली करने का आदेश जारी हुआ।
यह समस्या क्यों बनी रहती है?
VIP संस्कृति की पकड़ इतनी मजबूत है कि बंगला पद से अधिक व्यक्ति-विशेष की ‘शान’ बन जाता है। कई नेता बंगला छोड़ने को अपनी प्रतिष्ठा में गिरावट मानते हैं। नियम स्पष्ट हैं, लेकिन उनका पालन राजनीतिक ताकत के अनुसार अलग-अलग होता है। नया सांसद/मंत्री आने पर कई महीनों तक आवास संकट बना रहता है। हर चुनाव के बाद राज्य और केंद्र, दोनों स्तर पर यह समस्या दोहराई जाती है।
सरकारी बंगले कभी अस्थायी, पद-आधारित सुविधा होने चाहिए थे, लेकिन समय के साथ वे सत्ता-संस्कृति का प्रतीक बन गए। कोर्ट और केंद्र सरकार ने कई बार सख्ती दिखाई, पर असल समस्या यह है कि राजनेताओं में ‘सरकारी सुख-सुविधा छोड़ने की आदत’ कम दिखाई देती है। जो बंगला जनता के टैक्स से चलता है, वह बंगला जनता के काम आना चाहिए, न कि किसी पूर्व नेता की निजी जायदाद की तरह वर्षों तक कब्जे में रखा जाए।

