अंजलि ने चाय का गिलास रखा— ‘हिसाब बोल रही हूँ, हिसाब-किताब नहीं। घर चलाना है तो साफ़-साफ़ बात जरूरी होती है।’ अंजलि (बिना झुके): ‘ठीक है। लेकिन काम बँटा रहेगा—ये पहले से तय कर दीजिए।’ सास: ‘अभी से ऊँची आवाज़? अंजलि ने चूल्हे की आँच सीधी की, लेकिन अपने शब्दों का ताप और सीधा कर दिया— ‘काम व्यवस्था से चलेगा, दहशत से नहीं।’ इस जवाब ने पूरे घर में हलचल कर दी। देवर, ननदें—सब समझ गए कि ये बहू चुप रहकर नहीं रहने वाली। यह संवाद इस गाँव में ‘तूफान की पहली बूँद’ की तरह फैल गया। वर्मा परिवार का गाँव ‘भीतरपुर’—नाम सुंदर, लेकिन अंदर की राजनीति और ईर्ष्या भरी हवा वैसी नहीं थी।

भीतरपुर—मध्यम आकार का गाँव, जहाँ पुराने मकानों की दीवारें टूट रही हैं, लेकिन अहंकार की दीवारें आज भी मजबूत खड़ी हैं। वर्मा परिवार इसी गाँव के कभी-प्रभावशाली घरों में गिना जाता था। ऊँची दहलीज लेकिन अब घर जर्जर था, लेकिन रौब वैसा ही कायम। और इसी घर में आई थी अंजलि—शहर में पली-बढ़ी, मजबूत शिक्षा वाली, परंपराओं को सम्मान देने वाली, लेकिन अन्याय को सह न पाने वाली।
अंजलि जब वर्मा परिवार के आँगन में उतरी, तो सबसे पहला एहसास यही हुआ— ऊँची दहलीज के इस घर में लोग ज्यादा हैं, अपनापन कम।’
घर पुराने समय की हवेली-जैसा था, पर हालत खराब। कच्चा पोर्च, टूटी चारपाई, और दीवारों पर चूना उखड़ा हुआ।
उसकी सास, शकुंतला देवी, तेज और कड़क आवाज़ वाली औरत—बोलने का तरीका ऐसा जैसे हर वाक्य ताना हो।
कहानी वहीं से शुरू होती है, जहाँ दहलीज़ पार करते ही बहू को ‘बहू’ से पहले ‘नौकरानी’ समझ लिया जाता है।
शादी के अगले सुबह से ही साफ था कि अंजलि को किसी नियम-पुस्तिका की नहीं, बल्कि शकुंतला देवी की तुनक-तुनक मूड की पालना करना प़डा।
पहली ही सुबह— शकुंतला: ‘बहू, चूल्हा जलाने का टाइम यही है। यहाँ शहर के हिसाब से नहीं चलता घर।’
अंजलि (धीमे पर साफ): ‘मुझे समय से दिक्कत नहीं, पर काम बाँटा रहेगा ये पहले तय कर लें।’
सास: ‘अभी से हिसाब? अभी तो पैर भी नहीं सूखे तेरे!’
अंजलि ने चाय का गिलास रखा—
‘हिसाब बोल रही हूँ, हिसाब-किताब नहीं। घर चलाना है तो साफ़-साफ़ बात जरूरी होती है।’
अंजलि (बिना झुके): ‘ठीक है। लेकिन काम बँटा रहेगा—ये पहले से तय कर दीजिए।’
सास: ‘अभी से ऊँची आवाज़?
अंजलि ने चूल्हे की आँच सीधी की, लेकिन अपने शब्दों का ताप और सीधा कर दिया—
‘काम व्यवस्था से चलेगा, दहशत से नहीं।’
इस जवाब ने पूरे घर में हलचल कर दी।
देवर, ननदें—सब समझ गए कि ये बहू चुप रहकर नहीं रहने वाली।
यह संवाद इस गाँव में ‘तूफान की पहली बूँद’ की तरह फैल गया।
वर्मा परिवार का गाँव ‘भीतरपुर’—नाम सुंदर, लेकिन अंदर की राजनीति और ईर्ष्या भरी हवा वैसी नहीं थी।
गाँव की गुटबंदी साफ थी—
प्रधान गुट: शिवकुमार—सत्ता उसके पास, अहंकार उसके खून में
वर्मा परिवार: कभी प्रभावशाली, अब आर्थिक रूप से कमजोर है
ओबीसी और दलित टोला: मेहनत से जीने वाली जनता, पर दबाव में औरतों की पंचायत: गॉसिप और ताना मारने वाला नेटवर्क गाँव में बात ऐसे फैलती जैसे आग सूखी घास में लगे।
अंजलि जैसी पढ़ी-लिखी लड़की के लिए ये सब माहौल घुटन थी।
पड़ोस की औरतें शुरू से ही जलन के साथ देखतीं— दबे-कुचले—दलित और पिछड़ा टोला है जो औरतों का गॉसिप करता रहता है, अंजलि की दहलीज़ पर पहली सुबह ने औरतों को मसाला पकड़ा दिया।
भगवती काकी: ‘बड़े घर की लड़की है, दो दिन में नखरे उतर जाएँगे।’
सरोज: ‘या शायद मायके भाग जाएगी, जैसे आजकल की लड़कियाँ करती हैं।’
अंजलि ने बस हल्की मुस्कान दी—
‘मैं भागने वाली नहीं, जो करना है यहीं करूँगी।’
ये जवाब उनके हलक में अटक गया।
अयुष, पढ़ा-लिखा लड़का, पर माँ के आगे दबा हुआ। पत्थर और मोम के बीच फँसा आदमी
उसकी दुविधा— ‘बीवी सही है… पर माँ भी गलत नहीं।’ यानी, क्लासिक रीढ़-विहीन कैरेक्टर।
एक रात खाना खाते समय—
अंजलि: ‘तुम्हें पता है तुम्हारी माँ मुझे नौकरानी की तरह ट्रीट कर रही हैं?’
अयुष (धीमे): ‘तुम गलत समझ रही हो, वो ऐसी ही हैं।’
अंजलि: ‘समझना मेरी जिम्मेदारी नहीं। खड़ा होना तुम्हारी जिम्मेदारी है।’
अयुष: ‘हर बात पर लड़ाई ठीक नहीं…’
अंजलि: ‘हर बात पर चुप रहना भी ठीक नहीं।’
अयुष चुप हो गया—क्योंकि उसके पास तर्क नहीं थे, बस आदतें थीं।
अयुष का कैरेक्टर गाँव में कोई रहस्य नहीं था— शांत, पढ़ा-लिखा, लेकिन माँ के साये से बाहर नहीं निकल पाया था। क्योंकि बहस को ब़ढाना उसकी आदत में नहीं था।
वर्मा परिवार की पुरानी शान को बनाए रखने के लिए पैसा नहीं था, लेकिन झूठा सम्मान बाक़ी था। घर की हालत खराब थी। दो गायें थीं, पर चारा खरीदने तक पैसे नहीं।
सास घर चलाने में अंजलि को ताने देकर भी उसे खर्च का जिम्मा दे देती थी।
एक दिन राशन को लेकर बड़ा झगड़ा हुआ—
सास: ‘बहू हाथ खोलकर खर्च कर रही है। एक महीना भी बजट नहीं संभल रहा।’
अंजलि: ‘आप खुद देख लीजिए कि मैं क्या खरीद रही हूँ। मेरे ऊपर आरोप मत लगाइए।’
सास: ‘बड़े घर से आई है, पैसे की कद्र क्या समझेगी?’
अंजलि ने पहली बार तीखा जवाब दिया—
अंजलि: ‘बड़े घर की बेटी हूँ, पर हिसाब-किताब वहीं सीखा है।
अगर जिम्मेदारी दे रही हैं तो अधिकार भी दीजिए।
नहीं दे सकतीं, तो मैं साइड हो जाती हूँ—आप संभालिए।’
कमरे में ऐसा सन्नाटा छाया कि बर्तन गिरने की आवाज भी तेज लगती।
देवर धीरे से बोला—
‘भाभी गलत नहीं बोल रहीं माँ…’
राशन को लेकर झगड़ा उस घर की असली हालत का आईना था।
इस एक वाक्य ने घर की दशकों पुरानी सत्ता को झटका दे दिया। यानी पहली दरार पड़ चुकी थी।
गाँव की राजनीति में प्रधान शिवकुमार एक अघोषित तानाशाह था। दलितों की जमीन पर नज़र गड़ाना उसकी आदत थी।
अंजलि ने देखा कि शिवकुमार प्रधान गरीब लोगों पर धौंस जमाता है। वर्मा परिवार कभ्ाी इस धौंस के खिलाफ खड़ा होता था, पर अब हिम्मत नहीं बची थी।
एक दिन पंचायत में विवाद हुआ—
दलित टोले की जमीन पर प्रधान की नजर थी।
अंजलि भीड़ के किनारे खड़ी थी।
शिवकुमार ताना मारकर बोला—
‘अरे, शहर वाली बहू भी पंचायत में आने लगी?’
अंजलि ने सीधा जवाब दिया—
‘पंचायत गाँव की है, आपकी विरासत नहीं। औरतें आएँ तो आपको दिक्कत क्यों?’
लोग हँस पड़े। शिवकुमार का चेहरा उतर गया। उस दिन से गाँव की औरतों में उसके लिए सम्मान बढ़ गया।
शिवकुमार के चेहरे पर तमतमाहट साफ थी।
उस दिन से वर्मा परिवार को उसने टार्गेट करना शुरू कर दिया। घर में पहली बार चुप रहने वाली नहीं बोलने वाली बहू है …
उस रात वर्मा घर का ड्रामा अपने चरम पर था।
उस रात घर में खूब बवाल हुआ।
सास नाराज—
‘तू पंचायत में बोलेगी? नाम डूबा दिया घर का!’
अयुष घबराया—
‘तुम हर जगह लड़ने क्यों जाती हो?’
अंजलि ने थाली हटाई—
‘मैं किसी से पंगा नहीं लेती। लेकिन गलत को सही नहीं कहूँगी।
और हाँ—तुम दोनों जब तक डर के साए में जियोगे, घर की हालत यही रहेगी।’
अंजलि का तर्क इतना सख्त था कि कोई जवाब नहीं दे पाया।
अयुष पहली बार बोला—
‘माँ, बहू की बात गलत नहीं। हमें डरना बंद करना होगा।’
ये अयुष का पहला सीधा वाक्य था।
यही वह क्षण था जिसने घर की दिशा बदल दी। ये उस घर की राजनीति का असली मोड़ था।
धीरे-धीरे, अंजलि ने घर का बजट संभाला
ट्यूशन शुरू किए
गायों का चारा खुद मैनेज किया
राशन में फालतू खर्च बंद किया
गाँव की औरतों के साथ छोटी लाइब्रेरी जैसी जगह शुरू की
पंचायत में महिलाओं की आवाज़ जगह बनाने लगी
सास अब भी चखती रहती, पर दबी आवाज़ में।
क्योंकि परिणाम सामने थे—
घर पटरी पर आने लगा था।
अंजलि ने अभियान की तरह घर संभाला—
सास के ताने कम हो गए।
अयुष का कद थोड़ा बढ़ा।
और वर्मा परिवार, पहली बार सालों बाद, संभलना शुरू हुआ।
यह कहानी किसी फिल्मी ‘सास-बहू मेल-मिलाप’ पर खत्म नहीं होती।
सास कभी पूरी तरह नहीं बदली।
पति भी सौ प्रतिशत खड़ा नहीं हुआ।
लेकिन—
घर चल पड़ा
बहू ने अपनी जगह बनाई
गाँव में उसकी आवाज़ को ताकत मिली
प्रधान का दबदबा टूटा और वर्मा परिवार की खोई इ़ज्ज़त धीरे-धीरे वापस आई
अंजलि ने जीत का दावा कभी नहीं किया।
उसे बस इतनी उम्मीद थी—
‘घर में बराबरी की दहलीज़ बने—ऊँचाई की नहीं।’

