स्वर्गीया नीलिमारानी:माई मदर, माई हीरो

संतान चाहे अमीर हो या गरीब, प्रत्येक संतान के जीवन में और उसकी सभी प्रकार की कामयाबी में उसकी अपनी मां का विशेष महत्त्व होता है, दिव्य आशीर्वाद होता है, उसका संस्कार होता है, उसका परवरिश और कठोर अनुशासन होता है। यह बात मेरे साथ भी लागू है। मेरी मां ऐसे धनाढ्य परिवार से थी जहां पर उसकी परवरिश बडे ला़ड-प्यार से हुई थी। उस देदीप्यमान कन्या का विवाह किसी धनी लडके के साथ होना चाहिए था लेकिन उसके भाग्य ने उसका विवाह मेरे दादाजी के चलते एक साधारण, सौम्य तथा ईमानदार गरीब लडके के साथ हो गया। मेरे पिताजी, स्वर्गीय अनादि चरण सामंत बहुत गरीब थे लेकिन वे आजीवन एक नेक, स्वच्छ मन वाले और सदाचारी इंसान थे।
आप अवश्य सोच रहे होंगे कि मैंने यह पुस्तक- नीलिमारानी : माई मदर,माई हीरो, क्यों लिखी- सच मानिए इसके लेखन का मूल कारण मेरा मां की अलौकिक दूरदर्शिता तथा उसकी निःस्वार्थ जनसेवा और समाजसेवा थी जिससे वह आजीवन संकल्पित भाव से जुडी रही। सच कहूं तो यथार्थ रुप में वह भारतीय नारी-जाति की गौरव थी जो नारी सशक्तिकरण को नया आयाम देना चाहती थी।
मेरी मां स्वर्गीया नीलिमा रानी सामंत जब मात्र ४० वर्ष की थी तभी मेरे पिताजी का एक रेलदुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। मेरे परिवार के भरण-पोषण के साथ-साथ स्वयं के साथ-साथ कुल ७ बच्चों की परवरिश तथा उनकी शिक्षा –दीक्षा की पूरी जिम्मेदारी मेरी विधवा मां के कमजोर कंधों पर आ गई।
मेरे पिताजी निःस्वार्थ जनसेवा, समाजसेवा तथा लोकसेवा के लिए अपने जीवनकाल में काबुलीवालों से ऋण लिया था। हमलोग इतने गरीब थे कि जब मेरे पिताजी का निधन हुआ तो मेरी मां ने मेरे बडे भाई से यह कहा कि वे अपने पिताजी का अंतिम संस्कार कर के ही कलराबंक, मेरे पैतृक गांव लौटे। मेरी मां अपने जीवन के उन सबसे बुरे दिनों में काफी संघर्ष करके बडे धीरज और साहस के साथ अकेले ही अपनी कुल ७ संतानों को अच्छी शिक्षा प्रदानकर उन्हें नेक तथा स्वावलंबी बनाया।
जब मैंने १९२-९३ में ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर में कीट-कीस की स्थापना की नींव डाली और जब उसके निर्माण कार्य बडी तेजी के साथ आरंभ हुआ उस वक्त भी मेरी मां ने मेरे पैतृक गांव कलराबंक को भी स्मार्ट विलेज के रुप में विकसित करने की सलाह मुझे दी। उसने कहा कि कलराबंक गांव की अपनी झोपडी की मरम्मत तथा अपने परिवार की खुशी के लिए पैसे-संग्रह करने की जगह कलराबंक गांव के सर्वांगीण विकास के लिए पैसे लगाना। उसने मुझसे अपने लिए कोई आभूषण खरीदने तथा जगह-जमीन खरीदने के लिए नहीं कहा। मेरे भाइयों को पैसे देने के लिए भी नहीं कहा। उसके अनुसार हम जो कुछ भी कमायें उसका इस्तेमाल हमें अपनी मातृभूमि अपने पैतृक गांव कलराबंक की सेवा में ही लगाना चाहिए।
मैंने आज जो कुछ भी अपने जीवन में असाधारण कामयाबी के रुप में हांसिल किया है, वह सबकुछ अपनी मां के द्वारा प्राप्त बाल-संस्कारों तथा उसके नैतिक जीवन-मूल्यों का प्रतिफल है, जिसे मैंने उसकी आजीवन सेवा करके उसके दिव्य आशीर्वाद के रुप में प्राप्त किया है। मेरी मां की देन मेरी अच्छी परवरिश तथा अच्छे दिव्य संस्कार हैं जिनका अक्षरशः पालन मैं अपने जीवनकाल में करते आ रहा हूं। उसीने मुझे एक नेक, भद्र, परोपकारी, सजाचारी, धार्मिक तथा अच्छा इंसान बनाया है। इसलिए मेरे विदेह जीवन की उन तमाम उपलब्धियों को आज मैं अपनी स्वर्गीया मां नीलिमारानी, माई मदर: मेरी हीरो को समर्पित करता हूं।
मैं जीवनभर अपनी स्वर्गीया मां नीलिमारानी सामंत के जीवन से अपनाये गये शाश्वत नैतिक और सामाजिक मूल्यों, सिद्धांतों, आध्यकत्मिक विवेक व चेतना तथा उसके शुद्ध जीवन आदि के प्रति ऋणी हूं जिनके बदौलत मैं भी आज पिछले लगभग ६० सालों से एक निःस्वार्थ जननायक, महान् शिक्षाविद् तथा आध्यात्मिक जीवन यापन कर रहा हूं । आज मैं जो कुछ भी हूं, वह सबकुछ मेरी मां स्वर्गीया नीलिमारानी सामंत की ही देन है। यह पुस्तकः स्वर्गीया नीलिमारानी: माई मदर, माई हीरो मैंने जो लिखी है वह निश्चित रुप से अपने जैसे लाखों-करोड़ों युवाओं तथा समस्त नारी-जाति के सशक्तिकरण के लिए ही लिखी है।

–अच्युत सामंत

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