दुनिया के राजनीतिक मानचित्र में पश्चिम एशिया हमेशा से संवेदनशील क्षेत्र रहा है। यहाँ की घटनाएँ केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरणों पर पड़ता है। आज जिस तरह से Iran, Israel और United States के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है, उसने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया एक और बड़े युद्ध की ओर बढ़ रही है। यह संघर्ष केवल तीन देशों का विवाद नहीं है; इसके पीछे धार्मिक, राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक हितों का जटिल जाल है, जिसने पूरे क्षेत्र को अस्थिरता की आग में झोंक दिया है। यदि इस संघर्ष की जड़ों को समझना हो तो हमें लगभग आधी सदी पीछे जाना होगा। १९७९ में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति ने पश्चिम एशिया की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। शाह के शासन को हटाकर जब इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, तब से ईरान की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव आया। इस नई व्यवस्था ने पश्चिमी देशों के प्रभाव का विरोध किया और इज़राइल को अपना प्रमुख शत्रु घोषित कर दिया।
दूसरी ओर इज़राइल, जो पहले ही अरब देशों के साथ कई युद्ध झेल चुका था, ईरान की इस नीति को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानने लगा। समय के साथ यह विरोध केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गुप्त सैन्य गतिविधियों और परोक्ष युद्धों तक पहुँच गया। इसी दौरान अमेरिका ने भी क्षेत्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत की और इज़राइल का सबसे बड़ा समर्थक बनकर सामने आया। आज ईरान–इज़राइल तनाव का सबसे बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। ईरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है, लेकिन इज़राइल और अमेरिका का मानना है कि इसके पीछे परमाणु हथियार बनाने की मंशा छिपी हुई है। इज़राइल की रणनीतिक सोच स्पष्ट है—यदि ईरान परमाणु हथियार प्राप्त कर लेता है, तो यह पूरे मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन को बदल देगा। यही कारण है कि इज़राइल समय-समय पर ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की रणनीति अपनाता रहा है। कई बार साइबर हमलों, गुप्त अभियानों और वैज्ञानिकों की रहस्यमय हत्याओं की घटनाएँ भी सामने आई हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इज़राइल की गुप्त कार्रवाई से जोड़ा है।
अमेरिका भी लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहा है। इस संदर्भ में २०१५ में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था, जिसे Joint Comprehensive Plan of Action कहा जाता है। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने का वादा किया था और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई थी। लेकिन बाद में अमेरिका के इस समझौते से अलग हो जाने के बाद स्थिति फिर से जटिल हो गई। ईरान और इज़राइल के बीच सीधा युद्ध अभी तक नहीं हुआ है, लेकिन दोनों देशों के बीच एक तरह का ‘छाया युद्ध’ लंबे समय से चलता रहा है। ईरान ने अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई संगठनों और समूहों को समर्थन दिया है। इनमें सबसे प्रमुख हैं Hezbollah और Hamas। ये संगठन इज़राइल के खिलाफ सक्रिय रहते हैं और कई बार सीमावर्ती क्षेत्रों में संघर्ष की स्थिति पैदा कर देते हैं। इसके जवाब में इज़राइल भी इन संगठनों के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई करता है। परिणामस्वरूप लेबनान, गाज़ा और सीरिया जैसे क्षेत्र इस संघर्ष के मुख्य युद्धक्षेत्र बन गए हैं।
यह प्रॉक्सी युद्ध केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसमें साइबर हमले, खुफिया गतिविधियाँ, आर्थिक प्रतिबंध और राजनीतिक दबाव जैसी रणनीतियाँ भी शामिल हैं। यही कारण है कि यह संघर्ष कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता, बल्कि समय-समय पर नए रूप में सामने आता रहता है। इस पूरे समीकरण में अमेरिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अमेरिका लंबे समय से इज़राइल का प्रमुख सहयोगी रहा है। सैन्य सहायता, आधुनिक हथियारों की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजनीतिक समर्थन—ये सभी इज़राइल को अमेरिका से प्राप्त होते हैं। अमेरिका की रणनीति केवल इज़राइल की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। वह मध्य-पूर्व में अपनी सामरिक उपस्थिति बनाए रखना चाहता है, क्योंकि यह क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों के कारण विश्व अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी कारण अमेरिकी नौसेना और वायुसेना की गतिविधियाँ इस क्षेत्र में लगातार बनी रहती हैं।
ईरान के खिलाफ अमेरिका ने कई आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए हैं, जिनका उद्देश्य उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और उसे परमाणु कार्यक्रम से पीछे हटने के लिए मजबूर करना है। लेकिन इन प्रतिबंधों का एक दूसरा प्रभाव भी हुआ है—ईरान ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ संबंध और मजबूत कर लिए हैं। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। कई अरब देशों ने इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इससे क्षेत्रीय समीकरण बदल गए हैं और ईरान खुद को एक तरह से घिरा हुआ महसूस करता है। दूसरी ओर ईरान ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। उसने इराक, सीरिया और लेबनान जैसे देशों में अपना प्र्ाभाव बढ़ाने की कोशिश की है। इन क्षेत्रों में ईरान समर्थित समूहों की मौजूदगी ने इज़राइल की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है। ईरान–इज़राइल–अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव केवल राजनीतिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। मध्य-पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। यदि इस क्षेत्र में युद्ध की स्थिति पैदा होती है, तो तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। परिवहन, उद्योग और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियाँ सीधे प्रभावित होती हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई देश इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के पक्ष में हैं।
भारत के दोनों देशों—ईरान और इज़राइल—के साथ घनिष्ठ संबंध हैं। इज़राइल भारत का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है, जबकि ईरान ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत की एक बड़ी चिंता यह भी है कि पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि इस क्षेत्र में युद्ध छिड़ता है, तो उनकी सुरक्षा और वापसी एक बड़ी चुनौती बन सकती है। इसके अलावा भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी इस संकट से प्रभावित हो सकती है। भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखे। कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना भारत के लिए आसान नहीं है, लेकिन अब तक उसने काफी हद तक इस संतुलन को कायम रखा है। हालाँकि स्थिति गंभीर है, लेकिन यह भी सच है कि अभी तक कोई भी पक्ष पूर्ण युद्ध नहीं चाहता। एक व्यापक युद्ध पूरे मध्य-पूर्व को अस्थिर कर सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दे सकता है। फिर भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है। यदि किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई या गलत अनुमान की वजह से तनाव अचानक बढ़ जाता है, तो यह संघर्ष नियंत्रण से बाहर जा सकता है। इतिहास बताता है कि कई बार युद्ध अचानक शुरू होते हैं और बाद में उन्हें रोकना बेहद कठिन हो जाता है।
-मंगला नटराजन

