मुंबई की राजनीति में युगांत
मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर ठाकरे परिवार का वर्चस्व सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं था, बल्कि शहर की सत्ता, पैसा और प्रशासन पर पकड़ का प्रतीक था। बीएमसी चुनाव 2026: ठाकरे का 30 साल का नियंत्रण ढहा। 2026 के नतीजों ने यह भ्रम तोड़ दिया कि बीएमसी “ठाकरे की जागीर” है। यह हार किसी एक चुनाव की नहीं, लगातार राजनीतिक गलतियों और जमीनी कटाव का नतीजा है।
क्या टूटा है — सिर्फ सत्ता या भरोसा भी?
- 1997 से बीएमसी पर शिवसेना का कब्ज़ा
- ₹90,000 करोड़ से ज़्यादा का बजट
- ठेके, वार्ड सिस्टम, बुनियादी ढांचे पर सीधा नियंत्रण
अब यह सब हाथ से निकल चुका है। यह हार बताती है कि:
- ब्रांड ठाकरे अब वोट की गारंटी नहीं रहा
- “मराठी अस्मिता” का कार्ड शहरी वोटर पर सीमित असर डाल पाया
- मुंबई का मतदाता अब प्रबंधन और डिलीवरी पूछ रहा है, न कि भावनात्मक नारे
हार के असली कारण — बहाने नहीं
ग्राउंड से कटाव
नेता टीवी स्टूडियो में थे, कार्यकर्ता वार्ड में अकेले।
- फूट और भ्रम
असली शिवसेना कौन — यह सवाल पार्टी ने खुद जनता के सामने खड़ा किया। - नकारात्मक राजनीति
हर मुद्दा केंद्र-विरोध तक सीमित रहा, मुंबई के सवाल पीछे छूट गए। - स्थानीय मुद्दों की अनदेखी
सड़क, पानी, कचरा, बाढ़ — समाधान नहीं, सिर्फ बयानबाज़ी।
महायुति की जीत — ताकत या मौका?
साफ कहें तो यह जीत पूरी तरह उपलब्धियों की नहीं, बल्कि ठाकरे की कमजोरी का फायदा भी है।
अब असली परीक्षा शुरू होती है:
- क्या BMC भ्रष्टाचार से मुक्त होगी?
- क्या ठेकेदार-राज खत्म होगा?
- क्या मुंबई सिर्फ रियल एस्टेट नहीं, रहने लायक शहर बनेगी?
अगर यह नहीं हुआ, तो यह जीत भी अस्थायी होगी।
राजनीतिक संकेत — 2029 की झलक
यह नतीजा सिर्फ नगर निगम का नहीं है।
यह संकेत है कि:
- मुंबई में वोट ट्रांसफर हो चुका है
- शहरी मतदाता भावनाओं से निकलकर परफॉर्मेंस मोड में आ गया है
- ठाकरे परिवार को अब आत्ममंथन या अप्रासंगिकता में से एक चुनना होगा

