तेरे जाने के बाद
कमरा वही है, दीवारें वही हैं,
बस हवा में अब तेरी हँसी नहीं तैरती,
और खिड़की से आती धूप
मुझसे सवाल करती है –
क्या प्यार इतना हल्का था कि चला गया?
रातें अब घड़ी से नहीं,
यादों से चलती हैं,
हर टिक-टिक पर तेरा नाम गिरता है,
और मैं नींद से नहीं,
खुद से जागता हूँ।
हमने वादा किया था
साथ बूढ़े होने का,
पर तुमने आधे रास्ते में
मौसम बदल लिया,
और मैं आज भी उसी मोड़ पर खड़ा हूँ।
तुम्हारी तस्वीरें
अब सिर्फ कागज़ नहीं रहीं,
वे मेरे धैर्य की परीक्षा हैं,
जिन्हें देख कर
मैं हर दिन सीखता हूँ
कैसे मुस्कुरा कर टूटना है।
अगर फिर कभी मिलो,
तो शिकायत नहीं करूंगा,
सिर्फ इतना पूछूंगा —
क्या तुम्हें भी कभी
मेरी कमी
इतनी ही चुपचाप लगी थी?
– एन.निधी

