
बच्चों में सांस संबंधी समस्याएं ज्यादा दिखने लगी हैं। वे एलर्जी, एटोपी व अस्थमा जैसी समस्याओं से पहले की तुलना में ज्यादा जूझ रहे हैं। कुछ साल पहले तक बहुत कम सुनने में आने वाले इन्हेलर व नेब्युलाइजर घर-घर की जरूरत बनते जा रहे हैं। कम उम्र से ही इन पर बढ़ती निर्भरता और उससे जुड़ी कई शंकाओं के बारे में आइए जानते हैं…
अंरराष्ट्रीय अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स के तत्कालीन दक्षिण एशिया संवाददाता गार्डनर हैरिस भारत को किसी आम विदेशी पत्रकार की नजर से ही देखते, अगर वह उस अनुभव से नहीं गुजरते। एक रात अचानक उनके आठ साल के बेटे ब्रैम को सांस की तकलीफ होने लगी। वह दौरा बहुत तेज था और हर बीतते पल के साथ उसकी सांस तेज हो रही थी। आनन-फानन में उसे अस्पताल ले जाया गया। जरूरत बनते नेब्युलाइजर… जांच में पता चला कि उसका फेफड़ा ५० फीसदी तक कमजोर हो गया है। ब्रैम को दवाओं के साथ ही इन्हेलर और नेब्युलाइजर की जरूरत थी। अपने बेटे की गिरती दशा देखकर आखिरकार हैरिस ने भारत छोड़ने का फैसला ले लिया। मगर अमेरिका वापस लौटने से पहले उन्होंने अपना अनुभव बताते हुए एक लेख लिखा कि किस तरह दिल्ली की दूषित आबोहवा से उनके बच्चे की जान पर बन आई थी।
प्रदूषण से जूझते बच्चे और नेब्युलाइजर या इन्हेलर जैसे उपायों पर बढ़ती उनकी निर्भरता का ब्रैम एकमात्र उदाहरण नहीं है। आज देश के कई नौनिहाल (और वयस्क भी) यह जंग लड़ रहे हैं। ‘़ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी’ का आकलन है कि क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनेरी डिजीज (सीओपीडी) यानी खराब फेफड़े (२०,८८४ मौतें) और न्यूमोनिया या ब्रोंकाइटिस जैसे श्वसन रोग (२०,४७८ मौतें) आज भी भारतीयों की मृत्यु की बड़ी वजह बने हुए हैं। तो क्या प्रदूषण ही बच्चों की सांस संबंधी बीमारियों की अकेली वजह है? नहीं, पर बड़ी वजह जरूर है।
डॉक्टरों की मानें, तो अब बच्चों में सांस संबंधी समस्याएं ज्यादा दिखने लगी हैं। वे एलर्जी, एटोपी (एलर्जी उत्पन्न होने की आनुवांशिक स्थिति) या अस्थमा जैसी समस्याओं से पहले की तुलना में ज्यादा जूझ रहे हैं। जहरीली आबोहवा के कारण बच्चा एलर्जिक राइनाटिस, एलर्जिक ब्रोंकियोलाइटिस या चाइल्डहुड अस्थमा की चपेट में आ जाता है।
ब्रोंकियोलाइटिस आरएसवी (रेस्पिरेट्री वायरस) की वजह से भी होती है। जब इसका हमला होता है, तो श्वसन तंत्र की वायु नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जिससे सांस की तकलीफ बढ़ने लगती है।
नवजात शिशु बहुत ही संवेदनशील होता है। सांस संबंधी समस्याएं ज्यादातर प्री-टर्म बेबी यानी कि ३६ ह़फ्ते तक गर्भ में न रहने वाले बच्चो में देखी जाती हैं। डॉक्टरों का मानना है कि प्री-टर्म बेबी का शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता। इस स्थिति में उसका फेफड़ा भी अच्छी तरह काम करने के लिए तैयार नहीं होता।
रेस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम (आरडीएस) कुछ इसी तरह की तकलीफ है। यह समस्या तब होती है, जब फेफड़ा पर्याप्त मात्रा में सरफैक्टेंट पैदा नहीं करते। सरफैक्टेंट ऐसा पदार्थ है, जो फेफड़ों में हवा की थैलियों को खोले रखता है। लिहाजा आरडीएस की वजह से जन्म के महज चार-पांच घंटे में ही नवजात की सांस की तकलीफ बढ़ने लगती है।
इसी तरह दूसरी समस्या मिकोनीयम से पैदा होती है। मिकोनीयम नवजात बच्चे के शुरुआती मल को कहते हैं। प्रसव के दौरान यदि सांस के माध्यम से यह फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो नवजात में सांस संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। इस स्थिति में नवजात को कभी-कभी वेंटीलेटर पर भी रखना पड़ता है।
बढ़ता प्रदूषण बच्चों का दुश्मन
बड़ों की तुलना में बच्चों की सांस लेने व छोड़ने की दर अधिक होती है। बड़ों की तुलना में वे अपने वजन के अनुपात से अधिक हवा अंदर लेते हैं। जहां स्वस्थ वयस्क आराम की स्थिति में एक मिनट में १२ से १६ सांसें लेता है, एक साल से कम उम्र के बच्चे एक मिनट में २४ से ३० बार व पांच साल से कम के बच्चे २० से ३०, व ६ से १२ साल के बच्चे १२ से २० बार सांस लेते हैं।
चूंकि बच्चे बड़ों की तुलना में घर या स्कूल में अधिक सक्रिय रहते हैं, ऐसे में सांस दर और तेज हो जाती है। जिससे उनके प्रतिकिलो वजन की तुलना में अधिक प्रदूषक तत्व शरीर में जाते हैं। चूंकि शरीर में ८०% वायु कोष (जहां से ऑक्सीजन रक्त में मिलती है) जन्म के बाद विकसित होते हैं, इसीलिए बच्चों के फेफड़े संवेदनशील होते हैं।ऐसे में टॉक्सिन्स के संपर्क में आना संक्रमण की आशंका बढ़ा देता है।
इन्हेलर या नेब्युलाइजर
बच्चों में सांस की समस्या बढ़ने पर न सिर्फ ओरल मेडिसिन दी जाती है, बल्कि सुधार न होने की स्थिति में इन्हेलर और नेब्युलाइजर का भी इस्तेमाल किया जाता है। माना यह भी जाता है कि अगर खान-पान दुरुस्त हो और बच्चे में रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ाई जाए, तो उम्र बढ़ने के साथ सांस संबंधी समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है।
इन्हेलर और नेब्युलाइजर का प्रयोग तब किया जाता है, जब रोग अपेक्षाकृत जटिल हो। इन्हेलर व नेब्युलाइजर का सही प्रयोग अस्थमा के दौरे को जल्दी शांत करता है। इसमें मास्क या फिर नेब्युलाइजर के ही साथ आने वाले एक किट के सहारे दवा को नाक और मुंह के रास्ते अंदर खींचा जाता है।
इससे दवाएं सीधे फेफड़े तक पहुंचाने की कोशिश होती है। नेब्युलाइजर कमोबेश इन्हेलर की तरह ही काम करता है, पर इन्हेलर का इस्तेमाल, रख-रखाव आसान है। यह सामान्य तौर पर मीटर्ड डोज इन्हेलर और ड्राई पाउडर इन्हेलर के रूप में बाजार में दिखता है। मगर नेब्युलाइजर बिजली या बैटरी से चलने वाला उपकरण है। यह तरल दवा को सीधे फेफड़े तक पहुंचाता है। इसलिए सबसे प्रभावी माना गया है।
दवा और उसकी मात्रा डॉक्टर के कहे अनुसार ही लें
ज्यादा नहीं यही कोई सात-आठ साल पहले तक दिल्ली जैसे महानगर में बहुत कम मेडिकल स्टोर्स को ही नेब्युलाइजर के बारे में जानकारी होती थी। इसके साथ इस्तेमाल में लाई जाने वाली दवा (ड्योलिन-बुडेकोर्ट, सालसोल रेप्स्यूल्स आदि) तो मिलती ही बहुत कम जगहों पर थी। बीते पांच-छह सालों में बड़े शहरों की हालत तेजी से बिगड़ी है। खासतौर से प्रदूषण के मद्देनजर।
नेब्युलाइजर्स न केवल घर-घर में दिखाई देने लगे हैं, बल्कि मेडिकल स्टोर्स पर ये आज आसानी से किराए (सिक्योरिटी या उसके बिना २५ से ४० रु. रोज) पर उपलब्ध हैं। डॉक्टर मानते हैं कि नेब्युलाइजर बच्चों को (मौसमी बीमारियों या संक्रमण) ठीक करने में सहायक है। वे इससे आसानी से दवा इनहेल कर लेते हैं। हलांकि इसके साइड इफेक्ट्स और दवाओं को लेकर अभिभावकों में कई शंकाएं भी देखने को मिलती है।
कितने सुरक्षित हैं नेब्युलाइजर?
डॉ. संगीता मेहंदीरत्ता (सलाहकार-पल्मोनोलॉजिस्ट, सरोज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, रोहिणी) बताती हैं, ‘अगर किसी को एलर्जी है या संक्रमण हुआ है तो उसे ठीक करने के लिए ट्रीटमेंट तो देना ही
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