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February 5, 2026

कोचिंग इंडस्ट्री

शिक्षा अब उद्योग और छात्र उसके ग्राहक…

२०२५ का भारत खुद को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनाने में गर्व महसूस करता है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, कौशल भारत — सरकार हर मंच पर ‘युवा-केंद्रित विकास’ का दावा करती है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आज शिक्षा उम्मीद से ़ज्यादा एक बिज़नेस मॉडल बन चुकी है। विशेषकर जिस जगह सबसे ़ज्यादा पैसा बह रहा है—कोचिंग इंडस्ट्री (Coaching Industry) —वह अब शिक्षा का ‘सपोर्ट सिस्टम’ नहीं, बल्कि उसका ‘मालिक’ बन गई है।
बच्चों के सपनों का बोझ, पैरेंट्स की महत्वाकांक्षाएँ, और सरकारी शिक्षा सिस्टम की कमज़ोर हालत — इन सबका लाभ उठाकर कोचिंग सेंटर एक अलग ही समानांतर व्यवस्था बन चुके हैं। और इस व्यवस्था में छात्रों की भूमिका सीधी है: वे ग्राहक हैं—जिनके सपनों की कीमत लगाई जाती है। यह रिपोर्ट किसी एक ‘विशेष’ को पकड़कर खत्म नहीं कर रही। यह पूरी चेन की परतें उधाड़ रही है— क्योंकि दोष सिर्फ कोचिंग का नहीं है, पूरे सिस्टम का भी है। भारत की शिक्षा व्यवस्था २०२५ में एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ छात्रों के भविष्य का नियंत्रण धीरे-धीरे कोचिंग इंडस्ट्री के हाथों में खिसक चुका है। स्कूल–कॉलेजों की गुणवत्ता पर भरोसा टूट चुका है, सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है, और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव पहले से दस गुना बढ़ चुका है। इसी माहौल में देशभर के बड़े शहर—कोटा, दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई—छात्रों के लिए ‘तैयारी केंद्र’ नहीं, बल्कि एक कठोर सर्वाइवल जोन बन गए हैं। इस रिपोर्ट का उद्देश्य किसी एक शहर या किसी एक कोचिंग संस्था को निशाना बनाना नहीं है। समस्या व्यापक है, फैली हुई है, और सभी जगह लगभग एक ही पैटर्न पर काम कर रही है। इसलिए सभी प्रमुख शहरों का संतुलित विश्लेषण शामिल किया गया है।

१९९०–२००० के दशक में कोचिंग सिर्फ सपोर्ट सिस्टम था। लेकिन २०१० के बाद बोर्ड परीक्षा, व्EE–र्‍EEऊ, ळझ्एण्, बैंकिंग और एएण् जैसी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने एक ऐसा बाजार खड़ा किया जिसे अब कोचिंग इंडस्ट्री कहा जाता है—एक ऐसा उद्योग जिसकी कीमत हजारों करोड़ है, पर विनियमन लगभग शून्य। यह इंडस्ट्री अब सिर्फ पढ़ाती नहीं—फिल्टर करती है, छाँटती है, और छात्रों को नंबरों में बदल देती है।
कोटा: देश का ‘प्रेशर कूकर’ मॉडल जहाँ से पूरी कहानी शुरू हुई। १० लाख से ़ज्यादा छात्र हर साल कोटा आते हैं। टेस्ट–सीरीज, रैंक, बैच परिवर्तन, और हर महीने की स्क्रीनिंग—यहाँ की सिस्टम ने ‘कड़ी मेहनत’ और ‘क्रूर मेहनत’ के बीच की रेखा मिटा दी है।

कोटा मॉडल की गंभीर समस्याएँ:
रैंक-आधारित बैच कल्चर: टॉप बैच में आने का दबाव छात्रों की नींद तक खो देता है। लाइन से हट जाना मतलब फेल मान लेना: कई छात्र बताते हैं: अगर दो टेस्ट खराब गए तो हमें लगता है कि ज़िंदगी खत्म हो गई।’ १५–१७ घंटे पढ़ाई की अपेक्षा करना मतलब यह अध्ययन नहीं, बल्कि ‘मैराथन स्ट्रेस’ है। मनोवैज्ञानिक सपोर्ट लगभग नाममात्र, करोड़ों की इंडस्ट्री में मानसिक-स्वास्थ्य काउंसलिंग पर खर्च शर्मनाक रूप से कम है। कोटा की समस्या यह है कि बाकी देश ने भी इसका कॉपी-पेस्ट शुरू कर दिया है।
दिल्ली—मुखर्जी नगर और करोल बाग की ळझ्एण् फैक्टरी
ळझ्एण् का आकर्षण और सरकारी नौकरी की प्रतिष्ठा ने दिल्ली को ‘ळझ्एण् का शहर’ बना दिया है। लेकिन यहाँ की स्थिति रोमांटिक नहीं, बल्कि हकीकत यह है: क्लासें ४००–६०० बच्चों की झ्उ में ३–४ लोग एक छोटे कमरे में, रोज़ १२–१४ घंटे की पढ़ाई, टेस्ट–सीरीज का लगातार दबाव, असफलता की दर लगभग ९७–९८ज्ञ्। यहाँ छात्र सिर्फ ‘पढ़’ नहीं रहे—वे प्रतिस्पर्धा में घुल रहे हैं। सफलता कुछ को मिलती है, लेकिन तनाव, अवसाद और अकेलापन लगभग सभी को।
पुणे—इण् रोड और कोथरुड का इंजीनियरिंग–श्ँA सर्किट
पुणे को अक्सर ‘स्टूडेंट सिटी’ कहा जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि यहाँ भी कई कोचिंग सेंटर डिग्री से ज्यादा टेस्ट-स्कोर पर जोर देते हैं। भारी फीस, हॉस्टल/झ्उ का बढ़ता किराया, छात्रों को टेस्ट-सीरीज की मशीन बना देना, असफल होने पर छात्रों को ‘औसत’ या ‘अनफिट’ करार देना। कई छात्र यहाँ बताते हैं कि उन्हें खुद के लिए एक घंटा भी नहीं मिलता।
बेंगलुरु—Marathahalli/
Koramangala kesâ IT Bootcamps
यहाँ ‘स्किल’ के नाम पर नए कोर्स हर महीने लॉन्च होते हैं—Data Science, Full Stack, AI, Cybersecurity—कुछ सही, कुछ सिर्फ मार्केटिंग। गंभीर समस्या यह है कि १००ज्ञ् प्लेसमेंट का वादा झूठा/अधूरा होता है, बैचों में २००–३०० छात्र, महंगी फीस, प्लेसमेंट सिर्फ टॉप १०–१५ज्ञ् छात्रों तक सीमित बाकी छात्रों पर आर्थिक और मानसिक बोझ। यह भी एक प्रकार का मॉडर्न कोचिंग ट्रैप है।
हैदराबाद—Aसीजू की टेक और गवर्नमेंट जॉब कोचिंग लैब
अमीरपेट अपनी सस्ती और तेज़ कोर्स प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इसका उल्टा पहलू यह है कि क्लासें लाइन-प्रॉडक्शन जैसी गुणवत्ता असमान, छात्र लगातार स्दम्व् ूोू और aेोसहूे से थक जाते हैं।
मुंबई—Da्ar, Aह्प्ीग् और र्‍ील्त् का महंगा लेकिन
दबावपूर्ण मॉडल
मुंबई की कोचिंग समस्या थोड़ी अलग है—यहाँ पढ़ाई से ़ज्यादा संघर्ष जीवन-यापन का है। झ्उ का किराया आसमान छूता है, रोज़ की ट्रैवल थकाने वाली। बैंकिंग, एएण्, रेलवे परीक्षा की भीड़। कोचिंग सस्ते नहीं, लेकिन क्वालिटी हर जगह बराबर नहीं। ऊपर से परिवार से दूर रहने का दबाव और नौकरी की अनिश्चितता। मुंबई में सर्वाइवल का खर्च छात्रों को मानसिक रूप से पहले ही थका देता है। छात्रों की वास्तविक स्थिति (देशभर के हब की कॉमन समस्या) देश के किसी भी बड़े कोचिंग हब में चले जाओ—मानसिक थकान और दबाव की तस्वीर लगभग एक जैसी है:
१२–१६ घंटे पढ़ाई
नींद की कमी
लगातार टेस्ट
रिज़ल्ट का डर
तुलना की संस्कृति
रिश्तों और परिवार से दूरी
हाइपर-कंपटीशन
आर्थिक तनाव
अपराधबोध (ुल्ग्त्ू)
aर्हेगूब् और कई बार ज्rोग्दह की ओर बढ़ाव। कई छात्रों के लिए यह ‘पढ़ाई’ नहीं, बल्कि स्ट्रेस मैनेजमेंट की लड़ाई बन चुका है।
डेटा जो चुभता है — लेकिन अनदेखा किया जाता है
NEET में कुल छात्रों का २–३% ही टॉप कोचिंग से सफल होता है। JEE में टॉप ५००० रैंक में आने वाले छात्रों की संख्या, कुल कोचिंग आबादी की तुलना में नगण्य है।
ड्रॉपआउट रेशियो ३०–४०% तक। कोचिंग फीस साल-दर-साल १०–२०ज्ञ् बढ़ रही है। मानसिक स्वास्थ्य मामलों में कोचिंग शहरों में तीव्र वृद्धि (साइकोलॉजिस्ट्स इसे ‘झ्ीfदrस्aहम Aर्हेगूब् ण्त्ल्ेूी’ कहते हैं)। कोटा में सालाना आत्महत्या मामलों की खबरें लगातार लाइमलाइट में रहती हैं। यह डेटा एक बात स्पष्ट करता है: मांग ़ज्यादा है, पर सफलता बहुत सीमित। तो फिर बच्चे क्यों दौड़ रहे हैं? क्योंकि सिस्टम उन्हें कहीं और विकल्प देता ही नहीं।
छात्रों की आपबीती

केस १: आदित्य (गाजियाबाद, १७ वर्ष) र्‍EEऊ की तैयारी कर रहा है। पिता प्राइवेट नौकरी में, माँ गृहिणी। कोचिंग, हॉस्टल, रहने-खाने में लगभग २.७ लाख/वर्ष खर्च।
आदित्य की असली समस्या उसकी बुद्धि नहीं बल्कि वह सपना जो उसका नहीं, उसके पिता का है। हर हफ्ते टेस्ट में रैंक गिरने पर कोचिंग की सलाह — ‘बैच अपग्रेड लो, रिवीज़न पैक लो।’
मतलब और पैसा।
आदित्य हर रात यही सोचकर सोता है कि
‘अगर मैं नहीं बना, तो पापा क्या कहेंगे?’

केस २: शालिनी (छपरा, बिहार; १८ वर्ष) एएण् और बैंक की तैयारी करने दिल्ली आई। कमरे में तीन लड़कियाँ रहती हैं, सब पार्ट-टाइम काम करती हैं। क्योंकि कोचिंग फ़ीस २०–३० हज़ार है, और टेस्ट सीरीज़ अलग। उसकी समस्या सिर्फ गरीबी नहीं— उसकी समस्या यह है कि कोचिंग बाज़ार उसे एक कम-कमाने वाली ग्राहक समझता है। उसका विकल्प है, सस्ते यूट्यूब चैनल, टॉपर्स के नोट्स, सेकेंड-हैंड गाइड, और दिन में ५ घंटे की पार्ट-टाइम नौकरी। यह कहानी उस भारत की है जहाँ पैसा ही असली सिलेबस बन चुका है।

केस ३: राहुल (नागपुर, १७ वर्ष) व्EE की तैयारी कर रहा है। उसने कोचिंग जॉइन नहीं की—एात्f एूल््ब् और ध्हत्ग्हा Rोदल्rमे पर भरोसा करता है। वह स्पष्ट मानता है: ‘कोचिंग सिर्फ स्ट्रक्चर देती है, दिमाग नहीं।’ लेकिन उसकी समस्या यह है— समाज उसे ‘कम सीरियस’ समझता है। दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी, सब पूछते हैं: ‘कोचिंग नहीं जॉइन की? फेल हो जाएगा!’ उसके लिए कोचिंग कल्चर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है— आपकी मेहनत को लोग तब तक वैल्यू नहीं देंगे जब तक आपके पास एक ‘ब्रांडेड कोचिंग’ की रसीद न हो।

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मुंबई के छात्रों की असली सच्चाई यह है कि झ्उ का किराया पढ़ाई से बड़ा स्ट्रेस बन चुका है, दादर–परैल–वडाला में एक छोटा कमरा: १८,०००–२५,००० सिर्फ बेड स्पेस, किचन + वॉशरूम शेयर्ड। ३–४ लड़के एक ही कमरे में भरे हुए। कई छात्र सीधा कहते हैं: ‘एडमिशन से ज्यादा डर झ्उ खरीदता है।’ श्ल्स्ंra, ख्aत्ब्aह, न्न्aेaग्, न्न्ग्rar से आने वाले छात्र रोज़ २–३ घंटे सिर्फ खड़े रहकर सफर करते हैं। कई छात्र कहते हैं: ‘क्लास पहुँचे-पहुँचे ही आधी ऊर्जा खत्म हो चुकी होती है।’
मुंबई में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा है। समस्या यह है कि बैचों में १५०–३०० छात्र Dदल्ूं-ेदत्न्ग्हु सिर्फ नाम का। श्दम्व् ूोूे पर इतना जोर कि छात्र ेूraूाुब् बना ही नहीं पाते।
मुंबई में कई छात्र ेल्rन्ग्न्aत् के लिए काम भी करते हैं: ण्afé रदें, अत्ग्न्ीब्, Rाूaग्त् ेप्ग्fूे,ण्aत्त् महूीे, र्‍ग्ुप्ू ेप्ग्fूे ये बच्चे ८–१० घंटे काम करने के बाद क्लास में पहुँचते हैं तो उनकी हालत क्या होती है? ‘नींद पूरी नहीं होती, दिमाग सुन्न रहता है, लेकिन क्लास मिस करने का डर ज्यादा है।’
मुंबई में छोटे घरों में पढ़ने की जगह नहीं होती। इसलिए लाइब्रेरी पर निर्भरता बहुत अधिक है, सुबह ६ बजे से लाइन, ८००–२००० रुपए प्रति महीना। कई लाइब्रेरी पूरी तरह भर जाती हैं एक छात्र के शब्दों में ‘लाइब्रेरी में सीट मिल गई तो दिन सफल, नहीं मिली तो पूरा दिन खराब।’
कई छात्रों के परिवार सोचते हैं कि ‘मुंबई भेज दिया मतलब सब सेट हो जाएगा’ लेकिन हकीकत उलटी है। छात्र खुद कहते हैं कि ‘घर सोचता है मैं सिर्फ पढ़ रहा हूँष्ठ उनको नहीं पता मैं आधा समय सर्वाइव करने में खर्च करता हूँ।’
श्ल्स्ंaग् में म्दस्जूग्ूग्दह सिर्फ पढ़ाई का नहीं — ेल्rन्ग्न्aत्, ूraनत्, fग्हaहमे, त्दहात्ग्हो और ज्ीfदrस्aहमष्ठ सब एक साथ लड़ाई बन जाते हैं। कई छात्र ये बोलते हैं: ‘यहाँ कोई रोए भी, तो किसी के पास सुनने का समय नहीं।’

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