कृषि ज़मीन का सिकुड़ता दायरा

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था और समाज की रीढ़ है। लगभग आधी से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में एक गंभीर समस्या उभरकर सामने आई है—खेती योग्य ज़मीन का दायरा घटता जाना। यह केवल भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा चिंता है। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और जलवायु संकट ने कृषि भूमि को लगातार दबाव में डाल दिया है। भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कृषि भूमि रखने वाला देश है। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि १९६० के दशक में जहाँ प्रति व्यक्ति ०.५ हेक्टेयर कृषि भूमि उपलब्ध थी, आज वह घटकर ०.१५ हेक्टेयर से भी कम रह गई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, कृषि योग्य भूमि धीरे-धीरे निर्माण कार्य, सड़क, हाइवे और उद्योगों में बदल रही है। लगभग ३०ज्ञ् भूमि का गंभीर क्षरण हो चुका है, जिसमें उपजाऊपन घटने और बंजर होने की समस्या सबसे बड़ी है।
गाँवों और कस्बों की उपजाऊ ज़मीन तेजी से रिहायशी और व्यावसायिक परियोजनाओं में बदल रही है। ‘स्मार्ट सिटी’ और औद्योगिक कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स सीधे खेतों पर कब्ज़ा कर रहे हैं। अत्यधिक रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को कम कर रहा है। भू-जल के अत्यधिक दोहन से मिट्टी में लवणता (ेaत्ग्हग्ूब्) बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन, बाढ़ और सूखा जैसी चरम मौसमी घटनाएँ लगातार उपजाऊ भूमि को प्रभावित कर रही हैं। तापमान बढ़ने से खेती की चक्रवृत्ति गड़बड़ा रही है।
लगातार बढ़ती आबादी और पारिवारिक बँटवारे के कारण खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट गए हैं, जिससे उपज और भूमि प्रबंधन दोनों कठिन हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (इAध्) के अनुसार १९७० के दशक से लेकर अब तक दुनिया में कृषि योग्य भूमि में करीब २०ज्ञ् कमी दर्ज की गई है। अप्रâीका और एशिया के देशों में यह समस्या सबसे गंभीर है, क्योंकि यहाँ जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है। दुनिया भर में लगभग ३३ज्ञ् उपजाऊ भूमि का क्षरण हो चुका है।
जब भूमि घटेगी और आबादी बढ़ेगी, तो भोजन की उपलब्धता पर संकट गहराएगा। खेती योग्य ज़मीन घटने से किसानों की आमदनी भी सिकुड़ेगी। खेती से गुज़ारा न होने पर लोग शहरों की ओर पलायन करेंगे, जिससे शहरी भीड़भाड़ और बढ़ेगी।
सैद्धांतिक रूप से यह बिल्कुल सही है कि औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के लिए बंजर/अनुपजाऊ ज़मीन का उपयोग होना चाहिए, न कि उपजाऊ कृषि योग्य भूमि का। लेकिन व्यवहारिक स्थिति क्यों अलग है? अक्सर बंजर ज़मीनें ऐसी जगह होती हैं जहाँ पानी, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं होतीं। उद्योग और शहर ऐसी जगह चाहते हैं जहाँ परिवहन आसान हो और संसाधन पास मिलें। उपजाऊ ज़मीन आमतौर पर नदियों/सड़कों के पास होती है, इसलिए उस पर कब्ज़ा करना कंपनियों को आसान और सस्ता लगता है। बंजर ज़मीन को रहने योग्य/उद्योग योग्य बनाने में भारी निवेश करना पड़ता है (मिट्टी सुधार, पानी लाना, सड़क बनाना)। इसके मुकाबले उपजाऊ ज़मीन पहले से ही सपाट और उपयोग के लिए सुविधाजनक होती है।
कई बार राजनीतिक दबाव और रियल एस्टेट लॉबी के कारण उपजाऊ खेत ही अधिग्रहित कर लिए जाते हैं। किसान को अगर उद्योग/शहर बनाने वाली कंपनी से मोटी रकम मिलती है, तो वह उपजाऊ ज़मीन बेचने को तैयार हो जाता है। बंजर ज़मीन की कीमतें अपेक्षाकृत कम होती हैं, इसलिए मालिक उसे बेचना नहीं चाहता। कृषि योग्य ज़मीन की रक्षा करने वाला कानून सख्ती से लागू होना चाहिए। सरकार बंजर भूमि को बुनियादी सुविधाओं से लैस करके उद्योगों को उपलब्ध कराए। राज्य सरकारें बंजर ज़मीन का रजिस्टर तैयार करें और उद्योगों/शहर योजनाओं को उसी से ज़मीन आवंटित करें। जिस तरह जंगल बचाने की मुहिम होती है, उसी तरह खेती बचाने का भी आंदोलन चलना चाहिए। यानी, सही विकल्प यही है कि शहरीकरण और औद्योगिकीकरण बंजर ज़मीन पर हो, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि सुविधा, पैसा और नीतिगत कमी के कारण खेती की ज़मीन पर ही बुलडोज़र चल जाता है।
खेती योग्य ज़मीन का दायरा घटता जाना केवल किसानों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ संकट है। अगर आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में भारत सहित पूरी दुनिया में भूख और कृषि संकट गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकारें, समाज और किसान मिलकर भूमि संरक्षण और सतत कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य की गारंटी हो सकती है।
– मंगला नटराजन

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