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April 3, 2026

अधूरी कहानी…

अप्रैल की दोपहर थी। धूप तेज थी, लेकिन हवा में एक अजीब सी बेचैनी भी थी—जैसे मौसम को खुद पता हो कि शाम को बारिश होने वाली है। पुराने शहर की तंग गलियों में लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी चल रही थी। चाय की दुकानों से उठती भाप, साइकिलों की घंटियाँ और कहीं-कहीं बच्चों की हँसी।
इन्हीं गलियों के बीच एक छोटा सा पुराना पुस्तकालय था। लकड़ी की अलमारियों में भरी किताबें, जिनकी खुशबू समय के साथ और गहरी हो गई थी। इस पुस्तकालय को चलाता था आदित्य। आदित्य उम्र में लगभग पैंतीस का था। शांत, कम बोलने वाला और किताबों की दुनिया में खोया रहने वाला इंसान।
लोग कहते थे कि वह पहले बहुत हँसमुख था, लेकिन पिछले कुछ सालों में वह बदल गया।
क्यों बदला?
यह कोई ठीक से नहीं जानता था।
उस दिन दोपहर में पुस्तकालय का दरवाज़ा धीरे से खुला।
अंदर आई एक लड़की—नैना।
उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह दुनिया को बहुत ध्यान से देखती हो।
‘क्या यहाँ पुराने उपन्यास मिलेंगे?’ उसने धीरे से पूछा।
आदित्य ने सिर उठाया।
किसी अजनबी को देखकर वह आमतौर पर ज्यादा बात नहीं करता था।
‘मिलेंगे,’ उसने छोटा सा जवाब दिया।
नैना अलमारियों के बीच घूमने लगी।
वह हर किताब को ऐसे देख रही थी जैसे कोई पुराने खज़ाने को ढूँढ रहा हो।
कुछ देर बाद उसने एक किताब उठाई।
‘ये कितने की है?’ उसने पूछा।
आदित्य मुस्कुराया।
‘ये बिकाऊ नहीं है…पढ़ने के लिए है।’
नैना हल्का सा हँस पड़ी।
‘अच्छा है… आजकल लोग किताबें पढ़ने से ज्यादा बेचने में विश्वास रखते हैं।’
आदित्य ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
उसकी बात में हल्की सी सच्चाई थी।
‘आप नई हैं इस शहर में?’ आदित्य ने पूछा।
‘हाँ,’ नैना ने कहा, ‘मैं यहाँ स्कूल में पढ़ाने आई हूँ।’
बात यहीं खत्म हो सकती थी।
लेकिन अजीब बात यह थी कि दोनों के बीच एक अजीब सा सन्नाटा बन गया—ऐसा सन्नाटा जो असहज नहीं था।
जैसे दोनों के पास बहुत कुछ कहने को हो, लेकिन शब्द अभी तैयार न हों।
तभी बाहर तेज हवा चलने लगी।
कुछ ही मिनटों में आसमान पर काले बादल छा गए। और फिर…
अचानक बारिश शुरू हो गई।
नैना खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
‘मुझे बारिश बहुत पसंद है,’ उसने धीरे से कहा।
आदित्य चुप रहा।
बारिश की आवाज़ कमरे में भर गई।
कुछ पल बाद आदित्य बोला—
‘कभी-कभी बारिश अधूरी कहानियों की तरह होती है।’
नैना ने मुड़कर उसकी तरफ देखा।
‘मतलब?’
आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—
‘कभी बारिश शुरू तो होती है…
लेकिन पूरी नहीं हो पाती।’
उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था।
नैना ने महसूस किया कि इस आदमी की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है—शायद शुरू ही नहीं हुई।
बारिश धीरे-धीरे तेज होती जा रही थी।
और उसी बारिश के बीच दो अजनबी लोगों की ज़िंदगी की कहानी भी धीरे-धीरे शुरू हो रही थी। लेकिन दोनों को यह नहीं पता था कि यह कहानी उन्हें कहाँ ले जाएगी।
क्योंकि हर प्रेम कहानी का अंत सुखद नहीं होता… कुछ कहानियाँ सिर्फ सिखाने के लिए होती हैं। और शायद यह भी ऐसी ही एक कहानी थी। अगले कुछ दिनों में एक अजीब सी बात होने लगी।
नैना लगभग हर शाम पुस्तकालय आने लगी।
कभी किसी उपन्यास के बहाने, कभी किसी कविता की किताब के लिए। लेकिन सच यह था कि अब उसका उद्देश्य केवल किताबें नहीं रह गया था। और शायद आदित्य भी यह समझने लगा था।
पुस्तकालय के बाहर अप्रैल की शामें धीरे-धीरे बदल रही थीं। गर्मी की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन शाम को हवा में अभी भी हल्की ठंडक बची हुई थी।
नैना अलमारी से किताब निकालते हुए बोली—
‘आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग किताबों जैसे होते हैं?’
आदित्य ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा—
‘किताबों जैसे?’
‘हाँ,’ नैना मुस्कुराई,
‘पहली नज़र में साधारण लगते हैं, लेकिन जैसे-जैसे उन्हें पढ़ते जाओ, उनकी गहराई बढ़ती जाती है।’
आदित्य हल्का सा मुस्कुराया, लेकिन उसने जवाब नहीं दिया।
असल में, वह खुद भी महसूस कर रहा था कि नैना का आना अब उसे अच्छा लगने लगा है।
पहले वह शाम होते ही पुस्तकालय बंद कर देता था।
अब वह अनजाने में थोड़ा देर तक इंतज़ार करने लगा था।
एक दिन नैना ने अचानक पूछा—
‘आपने शादी क्यों नहीं की?’
सवाल अचानक था।
आदित्य कुछ पल चुप रहा।
उसने खिड़की के बाहर देखा,
जैसे जवाब वहीं कहीं छिपा हो।
‘हर कहानी का अंत शादी नहीं होता,
’ उसने धीमे स्वर में कहा।
नैना ने महसूस किया कि यह सिर्फ एक सामान्य जवाब नहीं था।
उसके पीछे कुछ छिपा हुआ था।
‘अगर आप बताना न चाहें तो मत बताइए,’ नैना ने धीरे से कहा।
आदित्य कुछ देर चुप रहा।
फिर वह धीरे-धीरे बोलने लगा।
‘आज से करीब दस साल पहले…
इस पुस्तकालय में कोई और भी आया करती थी।’
नैना चुपचाप सुन रही थी।
‘उसका नाम रिया था,’ आदित्य ने कहा।
उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कंपन थी।
‘वह भी किताबों की बहुत शौकीन थी। हर हफ्ते नई किताब ले जाती थी। धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।
किताबों से शुरू हुई बातें…
ज़िंदगी तक पहुँच गईं।’
पुस्तकालय में एक गहरा सन्नाटा फैल गया।
‘हमने सोचा था कि शादी करेंगे,
’ आदित्य ने कहा।
‘पिâर क्या हुआ?’ नैना ने धीरे से पूछा।
आदित्य ने गहरी साँस ली।
‘एक दिन रिया अपने घर जा रही थी… रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो गया।’
नैना का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।
‘डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की… लेकिन वह बच नहीं सकी।’
कमरे में कुछ देर तक सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।
आदित्य की आँखों में नमी थी, लेकिन उसने आँसू गिरने नहीं दिए।
‘उसके बाद… सब कुछ बदल गया,’ उसने कहा।
‘मैंने खुद को किताबों में छुपा लिया।
लोगों से मिलना कम कर दिया।’
नैना को अचानक समझ में आ गया कि आदित्य इतना चुप क्यों रहता है।
उसके जीवन में सिर्फ एक प्रेम कहानी थी—और वह अधूरी रह गई थी।
कुछ देर बाद नैना धीरे से बोली—
‘लेकिन क्या ज़िंदगी सिर्फ एक ही कहानी लिखती है?’
आदित्य ने उसकी तरफ देखा।
उसके सवाल में एक सच्चाई थी।
नैना आगे बोली—
‘कभी-कभी भगवान हमें दूसरी कहानी भी देता है… ताकि हम जीना फिर से सीख सकें।’
आदित्य ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके मन में जैसे कोई बंद दरवाज़ा हल्का सा खुल गया था।
उस शाम जब नैना पुस्तकालय से बाहर निकली तो आसमान बिल्कुल साफ था।
बारिश नहीं थी।
लेकिन हवा में फिर भी वही एहसास था—
जैसे कोई नई कहानी धीरे-धीरे जन्म ले रही हो।
और शायद इस बार यह कहानी
अधूरी न रहे।
लेकिन ज़िंदगी इतनी आसान भी नहीं होती।
क्योंकि कभी-कभी
अतीत सिर्फ याद बनकर नहीं रहता…
वह वापस भी आ जाता है।
और जब अतीत लौटता है
तो वह वर्तमान को बदल देता है।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
अब नैना का पुस्तकालय आना केवल आदत नहीं, आदित्य के दिन का एक जरूरी हिस्सा बन गया था।
दोनों के बीच बातें भी अब पहले से अधिक खुलने लगी थीं।
कभी कविता, कभी ज़िंदगी, कभी सपनों पर चर्चा।
नैना की हँसी से पुस्तकालय का सन्नाटा जैसे थोड़ा हल्का हो जाता था।
और आदित्य…
जो कभी लोगों से दूर रहता था, अब खुद को थोड़ा बदलता हुआ महसूस कर रहा था।
एक शाम नैना ने कहा—
‘आप जानते हैं, मैंने बचपन में एक सपना देखा था।’
आदित्य ने पूछा—
‘कैसा सपना?’
‘मैं एक दिन ऐसा घर बनाना चाहती हूँ जहाँ बहुत सारी किताबें हो… और लोग आकर उन्हें पढ़ सकें।’
आदित्य मुस्कुराया।
‘तो आप वही सपना पूरा कर रही हैं। यह पुस्तकालय तो वैसे ही है।’
नैना ने उसकी तरफ देखा।
‘लेकिन यह आपका सपना है… मेरा नहीं।’
उसकी आँखों में एक अनकही बात थी।
आदित्य उस नजर को समझने लगा था, लेकिन शायद अभी स्वीकार करने से डरता था।
उसी समय पुस्तकालय का दरवाज़ा खुला।
अंदर एक बुजुर्ग व्यक्ति आए।
‘क्या आप आदित्य हैं?’ उन्होंने पूछा।
‘जी,’ आदित्य ने जवाब दिया।
उन्होंने एक पुराना लिफाफा उसके हाथ में दिया।
‘यह आपके लिए है।’
आदित्य ने लिफाफा खोला।
अंदर एक पत्र था।
पत्र पढ़ते ही उसका चेहरा अचानक बदल गया।
नैना ने महसूस किया कि कुछ ठीक नहीं है।
‘क्या हुआ?’ उसने पूछा।
आदित्य ने धीरे से कहा—
‘यह… रिया के घर से आया है।’
नैना चौंक गई।
‘लेकिन इतने साल बाद?’
आदित्य ने पत्र फिर से पढ़ा।
पत्र में लिखा था कि रिया की माँ बहुत बीमार हैं और वह आदित्य से मिलना चाहती हैं।
कई सालों से वह उससे मिलना चाहती थीं, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाईं।
अब शायद समय कम था।
आदित्य का मन अचानक अतीत में चला गया।
रिया की हँसी…
उसकी बातें…
और वह आखिरी दिन।
इतने सालों बाद भी कुछ घाव वैसे ही थे।
नैना चुपचाप उसे देख रही थी।
कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा—
‘आपको जाना चाहिए।’
आदित्य ने उसकी तरफ देखा।
‘क्यों?’
नैना ने शांत स्वर में कहा—
‘क्योंकि कुछ रिश्ते अधूरे रह जाएँ तो मन हमेशा बोझ लेकर जीता है।’
आदित्य कुछ पल सोचता रहा।
फिर उसने तय किया कि वह जाएगा।
अगले दिन वह रिया के घर पहुँचा।
घर पहले जैसा ही था, लेकिन अब उसमें एक अजीब सी खामोशी थी।
रिया की माँ बिस्तर पर लेटी थीं।
आदित्य को देखते ही उनकी आँखों में आँसू आ गए।
‘तुम इतने सालों बाद आए…’ उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा।
आदित्य के पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ देर बाद उन्होंने एक छोटा सा डिब्बा उसे दिया।
‘यह रिया ने तुम्हारे लिए रखा था,’ उन्होंने कहा। आदित्य के हाथ काँपने लगे।
उसने डिब्बा खोला।
अंदर एक छोटी सी डायरी थी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
‘अगर कभी आदित्य यह पढ़े… तो उसे कहना कि वह ज़िंदगी से भागे नहीं।’
आदित्य की आँखें नम हो गईं।
उसने आगे पढ़ा—
‘अगर मैं कभी उसके साथ न रह सकूँ…
तो भी मैं चाहूँगी कि वह फिर से प्यार करे।
क्योंकि सच्चा प्यार किसी एक इंसान के जाने से खत्म नहीं होता।’
उस क्षण जैसे आदित्य के अंदर कुछ टूटकर फिर से जुड़ गया।
उसे पहली बार लगा कि शायद वह इतने सालों से गलत कर रहा था।
वह सिर्फ यादों को पकड़कर बैठा हुआ था।
जब वह शाम को वापस पुस्तकालय पहुँचा तो नैना वहाँ खड़ी थी।
जैसे उसे पहले से पता हो कि वह आएगा।
आदित्य ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में पहली बार एक
नई चमक थी।
‘नैना,’ उसने धीरे से कहा,
‘शायद तुम सही कहती थीं… ज़िंदगी दूसरी कहानी भी लिखती है।’
नैना मुस्कुराई।
लेकिन उसी पल उसके फोन की घंटी बज उठी। उसने कॉल उठाय्ाा।
कुछ सेकंड बाद उसका चेहरा अचानक बदल गया।
‘क्या हुआ?’ आदित्य ने पूछा।
नैना ने धीमी आवाज़ में कहा—
‘मेरा ट्रांसफर हो गया है… अगले हफ्ते मुझे यह शहर छोड़ना होगा।’
यह सुनकर जैसे समय एक पल के लिए रुक गया।
आदित्य कुछ बोल नहीं पाया।
जिस कहानी ने अभी शुरू होने की हिम्मत की थी… क्या वह फिर से अधूरी रह जाएगी?

– माला झा

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