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May 31, 2026

अमेरिका-ईरान ऐतिहासिक समझौता: ₹25 लाख करोड़ का रीकंस्ट्रक्शन फंड और ट्रम्प का दावा

अमेरिका ईरान समझौता डोनाल्ड ट्रम्प

अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहा तनाव अब एक बड़े समझौते की तरफ बढ़ता दिख रहा है। न्यू यॉर्क टाइम्स और वैश्विक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों के राजनयिकों ने एक ऐसे शांति समझौते (MOU) का मसौदा तैयार किया है, जिसके तहत ईरान को युद्ध के बाद अपने देश को दोबारा खड़ा करने के लिए 300 बिलियन डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम रीकंस्ट्रक्शन और इन्वेस्टमेंट फंड मिल सकता है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य फारस की खाड़ी में स्थित ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) के समुद्री रास्ते को व्यापार के लिए पूरी तरह सुरक्षित और टैक्स-फ्री खोलना है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी प्रशासन के बयानों में परमाणु कार्यक्रम को लेकर अभी भी भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है, जिससे इस डील पर सस्पेंस बना हुआ है।

अमेरिका डायरेक्ट कैश नहीं देगा: खाड़ी देश उठाएंगे 25 लाख करोड़ का खर्च

इस समझौते की सबसे दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका इस 25 लाख करोड़ रुपये के फंड में सीधे तौर पर अपनी जेब से कोई नकद (Direct Cash) मदद नहीं देगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सलाहकारों और व्हाइट हाउस की सिचुएशन रूम मीटिंग में साफ कर दिया है कि अमेरिका ईरान को सीधे कोई पैसा ट्रांसफर नहीं करेगा। दरअसल, ट्रम्प पहले की ओबामा सरकार द्वारा ईरान को दिए गए ‘कैश’ की आलोचना करते रहे हैं, इसलिए इस बार उन्होंने एक नया रास्ता निकाला है। इस योजना के तहत सऊदी अरब, यूएई, कतर और तुर्की जैसे अमीर खाड़ी देशों (Gulf Countries) को मिलाकर एक ‘इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट फंड’ बनाया जाएगा, जो ईरान में बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए निवेश करेगा। इसके अलावा कतर और ओमान जैसे देशों में फ्रीज (जब्त) पड़े ईरान के करीब 12 बिलियन डॉलर (96,000 करोड़ रुपये) भी जारी किए जा सकते हैं, जिसका इस्तेमाल ईरान केवल दवाइयां और मानवीय जरूरत का सामान खरीदने के लिए कर सकेगा।

ट्रम्प का परमाणु डील पर दावा बनाम ईरान का इनकार

इस पूरी डील के बीच सबसे बड़ा विवाद दोनों देशों के बयानों को लेकर खड़ा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया (Truth Social) पर दावा किया है कि ईरान के साथ शांति समझौते की शर्तों को लगभग अंतिम रूप दे दिया गया है और ईरान को अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करना होगा और अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) का भंडार अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को सौंपना होगा। ट्रम्प का कहना है कि वे ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत ही कोई डील साइन करेंगे। दूसरी तरफ, ईरान के विदेश मंत्रालय ने ट्रम्प के इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि अभी तक किसी भी अंतिम मसौदे को मंजूरी नहीं दी गई है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलें उसकी संप्रभुता का हिस्सा हैं और वे इस पर कोई समझौता नहीं करेंगे।

60 दिनों का सीजफायर और आगे की राह

फिलहाल, इस प्रस्तावित समझौते के तहत दोनों देशों के बीच 60 दिनों के लिए एक अस्थायी सीजफायर (युद्धविराम) लागू किया जाएगा। इस दौरान ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सभी समुद्री बारूदी सुरंगों (Mines) को हटाना होगा और अंतरराष्ट्रीय जहाजों से कोई टैक्स नहीं वसूलने का वादा करना होगा। बदले में अमेरिका अपनी नौसेना की नाकेबंदी को धीरे-धीरे हटाएगा और ईरान को तेल बेचने के लिए प्रतिबंधों में कुछ ढील देगा। यह 60 दिनों का समय दोनों देशों के लिए एक टेस्टिंग पीरियड होगा, जिसमें यदि ईरान परमाणु हथियारों से दूरी बनाने की शर्तों को पूरा करता है, तभी उसे 25 लाख करोड़ रुपये के अंतरराष्ट्रीय निवेश फंड का लाभ मिलना शुरू होगा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है, लेकिन अंतिम फैसला राष्ट्रपति ट्रम्प की अंतिम मुहर के बाद ही होगा।

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