“नारीशक्ति”—यह शब्द आज हर मंच पर गूंजता है। भाषणों में, सरकारी अभियानों में, और सोशल मीडिया पर इसे ऐसे पेश किया जाता है जैसे देश में महिलाओं की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी हो। लेकिन अगर इस चमक के पीछे झांका जाए, तो तस्वीर उतनी साफ नहीं दिखती। सवाल सीधा है—क्या यह सशक्तिकरण सच में जमीन पर उतरा है, या सिर्फ एक सुनियोजित कहानी है? शहरों में कुछ सफल महिलाओं को सामने रखकर एक पूरी पीढ़ी को यह विश्वास दिलाया जाता है कि अब बराबरी हासिल हो चुकी है। कॉर्पोरेट दफ्तरों में “women leadership” की बात होती है, लेकिन हकीकत यह है कि निर्णय लेने वाली कुर्सियों पर आज भी पुरुषों का दबदबा है। और जहां महिलाएं पहुंचती भी हैं, उन्हें अक्सर “exception” की तरह पेश किया जाता है—जैसे यह सामान्य नहीं, बल्कि एक विशेष घटना हो।
अब राजनीति की तरफ देखिए, जहां महिला आरक्षण को बड़े समाधान के रूप में पेश किया जाता है। कागज़ पर यह व्यवस्था पूरी तरह सही लगती है—सीटें तय, प्रतिनिधित्व सुनिश्चित। लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इसके उलट होती है। पंचायतों और स्थानीय निकायों में “सरपंच पति” जैसा शब्द यूं ही नहीं बना। नाम महिला का होता है, लेकिन फैसले अक्सर कोई और ले रहा होता है। यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित औपचारिकता है—जहां नियम भी पूरे हो जाते हैं और नियंत्रण भी नहीं छूटता। यह समस्या सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है। बड़े स्तर की राजनीति में भी कई बार महिलाओं को आगे लाकर असली नियंत्रण पीछे ही रखा जाता है। परिवारवाद और सत्ता संरचना के भीतर यह एक सामान्य रणनीति बन चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है—क्या महिला आरक्षण असली नेतृत्व तैयार कर रहा है, या सिर्फ चेहरे बदल रहा है?
एक और सच्चाई यह है कि आरक्षण का फायदा हर महिला तक बराबरी से नहीं पहुंचता। जो महिलाएं पहले से सामाजिक, आर्थिक या शैक्षिक रूप से थोड़ी मजबूत हैं, वे इस अवसर का लाभ उठा लेती हैं। लेकिन जो महिलाएं वास्तव में हाशिये पर हैं—गांवों में, गरीब परिवारों में—वे आज भी उसी स्थिति में खड़ी हैं। यानी, सशक्तिकरण का दायरा सीमित रह जाता है। असल समस्या कहीं गहरी है। यह केवल अवसरों या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि सोच की समस्या है। जब तक घर के भीतर बेटियों को बराबरी का हक नहीं मिलेगा, जब तक उनकी स्वतंत्रता को शक की नजर से देखा जाएगा, और जब तक कार्यस्थलों पर उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाएगा—तब तक कोई भी नीति पूरी तरह असरदार नहीं हो सकती।
समाधान आसान नहीं है, लेकिन स्पष्ट है। महिलाओं को केवल अधिकार देने की बात नहीं, बल्कि उन्हें उस स्थिति में लाने की जरूरत है जहां वे खुद अपने फैसले ले सकें। इसके लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण आधार है—ऐसी शिक्षा जो केवल डिग्री न दे, बल्कि सोच और निर्णय क्षमता विकसित करे। इसके साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि बिना आर्थिक स्वतंत्रता के कोई भी सशक्तिकरण अधूरा है। सबसे बड़ा बदलाव सामाजिक मानसिकता में आना चाहिए। यह वही क्षेत्र है जहां हर नीति आकर अटक जाती है, क्योंकि यहां कोई कानून सीधे काम नहीं करता। जब तक समाज महिलाओं को बराबरी से स्वीकार नहीं करेगा, तब तक हर प्रयास अधूरा ही रहेगा।अंत में, यह समझना जरूरी है कि “नारीशक्ति” कोई नारा नहीं, बल्कि एक वास्तविक स्थिति होनी चाहिए। और महिला आरक्षण केवल संख्या बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि असली नेतृत्व तैयार करने का जरिया बनना चाहिए। जब तक महिलाएं खुद अपने फैसले लेने की स्थिति में नहीं आएंगी, तब तक सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा।
Aslo Read: सरोगेसी के नियम में बदलाव

