भारत में अरबी की खेती…

अरबी जिसे अंग्रेज़ी में तारो के नाम से भी जाना जाता है. भारत के अलग-अलग हिस्से में अरबी को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, और कुछ लोग इसके पत्तों की पकौड़ी बनाकर खाना पसंद करते हैं तो कुछ इसकी सब्जी. कई जगहों पर तो इसे व्रत में फलाहार के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. अरबी में फाइबर और कार्बोहाइड्रेट भरपूर मात्रा में होता है. इसके अलावा इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई, विटामिन बी ६ और फोलेट भी अधिक मात्रा में होता है. इसमें मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, जिंक,फॉस्फोरस, पोटैशियम और मैंगनीज जैसे तत्व भी पाए जाते हैं जो शरीर को कई समस्याओं से बचाने में मदद कर सकते हैं. अरबी के सेवन से इम्यूनिटी को मजबूत बनाया जा सकता है… 

 अरबी की खेती पूरे भारत में की जाती है। अरबी के पत्तों और इसके फलों को सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। अरबी दो तरह की होती है। एक एडिन और दूसरी डेसिन आदि। इसमें से एडिन को अरबी कहा जाता है और डेसिन को बणडा कहा जाता है। अरबी की सबसे अधिक खेती अफ्रीका में की जाती है। अरबी में चिडचिडाहट या एक्रीडीटी पाई जाती है। जो पकने के बाद खत्म हो जाती है। अरबी को कच्चा नहीं खाया जाता।

अरबी की खेती के लिए शीतोष्ण और सम शीतोष्ण जलवायु उत्तम मानी जाती है। इसके आलावा अरबी को नम जगहों पर भी उगाया जाता है। अरबी को पहाड़ी और मैदानी दोनों ही भागों में उगाया जाता है। इसकी खेती करने के लिए बलुई दोमट मिटटी अच्छी होती है। इसे भारी किस्म की मिट्टी में भी उगाया जा सकता है। लेकिन उस मिटटी में उचित जल निकास की सुविधा होनी आवश्यक है। तभी उसमे सफलतापूर्वक खेती की जा सकती है। जिस भूमि में अरबी की खेती की जा रही हो उस भूमि का पी. एच . मान ५. ५ से ७ के बीच का हो तो उत्तम माना जाता है। अरबी की फसल में पानी का भराव नहीं होना चाहिए। इससे अरबी की फसल खराब हो सकती है।  खेत की मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करें। इसके बाद देसी हल का प्रयोग करके लगभग ३ या ४ बार खेत को जोते। इसके आलावा आप इसमें केल्टिवेटर का भी प्रयोग कर सकते है। इससे मिटटी भुरभुरी हो जायेगी। खेत में अंतिम जुताई करते समय में १०० से १५० क्विंटल सड़ी हुई खाद को मिला दें। इसके बाद ही खेत की जुताई करें। ताकि मिटटी और खाद आपस में अच्छी तरह से मिल जाये। खाद की यह मात्रा एक हेक्टेयर भूमि के लिए पर्याप्त है। भूमि के अनुसार इसकी मात्रा को घटाया और बढ़ाया जा सकता है। अरबी के लिए बीच की मात्रा :- अरबी की खेती के लिए मध्यम आकार के कंदों का चुनना चाहिए। इसके लिए लगभग ७. ५ से ९. ५ क्विंटल बीज एक हेक्टेयर भूमि के लिए पर्याप्त है।  अरबी को उत्तर भारत में दो बार बुआई की जाती है। पहली बुआई मार्च से अप्रैल के महीने में कंदों की बुआई या रोपाई की जाती है। बारिश के मौसम में या खरीफ की फसल लेने के लिए इसकी बुआई जून से जुलाई के महीने में की जाती है। यह समय इसकी खेती के लिए उपयुक्त होता है।

अरबी की बुआई कतारों में करनी चाहिए। इसकी बुआई करते समय कतारों की दूरी का ध्यान रखे। एक कतार से दूसरी कतार के बेच की दूरी लगभग ४५ सेंटीमीटर की होनी चाहिए और एक पौधे से दूसरे पौधे को ३० सेंटीमीटर की दूरी पर ही लगायें। अरबी के कंदों को ६ से ७ सेंटीमीटर का गड्डा खोदकर बोना चाहिए। इस प्रकार की विधि को अपनाकर बुआई करने से अंकुरण और पौधे की वृद्धि सही प्रकार से होती है।

अरबी की बुआई के ४ या ५ दिन के बाद सिंचाई करनी चाहिए। यदि अरबी के कंदों में अंकुरण भलीभांति हो रहा हो तो इसकी सिंचाई ८ से १० दिन के अंतर पर करनी चाहिए। सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान जरुर रखे की इसकी फसल में पानी का भराव नहीं हों। अरबी की फसल में खरपतवार को दूर करने के लिए अरबी की बुआई के एक या दो दिन के बाद पेंडामेथलिन की ३ .३ लीटर की मात्रा में ६०० से ८०० लीटर पानी की मात्रा मिला दें। इस मिश्रण की किसी पम्प में डालकर स्प्रे करें। स्प्रे करने के एक दिन के बाद मलीचिंग करनी चाहिए। ऐसा करने से खरपतवार को दूर किया जा सकता है। मलच को हटाने के बाद एक या दो बार हल्की – हल्की निराई गुड़ाई करनी चाहिए। ताकि छोटे – छोटे खरपतवार नष्ट हो जाये। निराई करने के बाद पौधे पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। इससे अरबी के कंद अच्छे बनते है और उपज भी अच्छी प्राप्त होती है।

 अरबी की फसल में लीफ ब्लाइट या पिथियम गलन जैसी बीमारी लगती है। जो अरबी के कंदों को नुकसान पंहुचाती है। इसकी रोकथाम करने के लिए डाईथेंन एम. ४५ की ८ से १० ग्राम की मात्रा में १० लीटर पानी मिलाकर के घोल बनाएं। इस घोल को किसी पम्प में डालकर फसलों पर तर – बतर करके छिडकाव करें। इसके आलावा अरबी की रोग प्रतिरोधी किस्मों की बुआई करें। पिथियम गलन नामक रोग से बचने के लिए भूमि को फफूंदी नाशक दवा से शोधन करना चाहिए और अच्छी किस्मों की बुआई करें। जो रोगों से लड़ने में सक्षम हों। 

अरबी की फसल पर लीफ हापर और लीफ ईटर नामक कीटों का प्रकोप होता है। लीफ होपर नामक कीट से पौधे को बचाने के लिए बी. एच. सी. डस्ट की एक ज्ञ् की मात्रा को पानी में मिलाकर फसलों पर छिडकें जबकि लीफ इटर के रोकने के लिए लेड एनिसेट का छिडकाव करना चाहिए। 

अरबी की बुआई के १२० से १५० दिन के बाद पककर तैयार हो जाती है। जब इसके फसल की पत्तियां पीली होकर जमीन पर गिरने लगें तो उसी समय अरबी की खुदाई करनी चाहिए। 

अरबी की खेती के लिए गर्म और आद्र जलवायु उत्तम होती है। इसे उष्ण और उपउष्ण दोनों ही देशो में उगाया जाता है। अरबी को साल में दो बार उगाया जाता है। गर्मी के मौसम में और बारिश के मौसम में। उत्तरी भारत की जलवायु अरबी की खेती के लिए उत्तम मानी जाती है। इस प्रकार की जलवायु में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। अरबी की खेती के लिए रेतीली दोमट मिटटी अच्छी होती है।  

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