महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण:

अस्मिता, आंदोलन और राजनीति!

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा सिर्फ़ शिक्षा और नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मराठी समाज की अस्मिता, अवसर और राजनीतिक शक्ति से गहराई से जुड़ा है। इस सवाल ने पिछले तीन दशकों से राज्य की राजनीति को दिशा दी है और आज भी इसका असर हर चुनावी समीकरण पर साफ़ दिखता है। हाल के वर्षों में इस आंदोलन का चेहरा बने हैं मनोज जरांगे, जिन्होंने शांतिपूर्ण लेकिन व्यापक जनआंदोलन खड़ा करके मराठा समाज की माँग को मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में ला दिया।

१९६० में भाषा आधारित आंदोलन से महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ। उस समय से ही मराठी और मराठा समुदाय के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का सवाल उठता रहा। मंडल आयोग (१९९०) के बाद कई समुदायों ने अपने-अपने लिए आरक्षण की माँग तेज़ की। मराठा समाज, जिसकी जनसंख्या लगभग ३०ज्ञ् है, ने बार-बार शिक्षा और सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी की माँग उठाई। १९९७ में मराठा आरक्षण के लिए पहला बड़ा आंदोलन है। मराठा महासंघ और मराठा सेवासंघ ने शुरुआत की। कहा गया कि मराठा कथित उच्च जातियों से नहीं बल्कि कुनबी समुदाय से आते हैं। मराठा को खेती- किसानी वाला समुदाय माना जाता है। २००८ से २०१४ के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्रियों का मराठा आरक्षण की मांग को समर्थन किया। पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार और विलासराव देशमुख ने मराठा आरक्षण की मांग का समर्थन कर दिया। जून २०१४ में पृथ्वीराज चौगान की सरकार ने एक प्रस्ताव स्वीकार किया जिसके तहत सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में मराठों को १६ प्रतिशत आरक्षण दिया गया। नवंबर २०१४ में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस आरक्षण पर रोक लगा दी। 

कमीशन का गठन

जून २०१७ में महाराष्ट्र सरकार ने मराठों की सोशल, एजुकेशनल और फाइनेंशियल स्टेटस की स्टडी के लिए स्टेट बैकवर्ड क्लास कमीशन का गठन किया। नवबंर २०१८ में कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर महाराष्ट्र विधानसभा में मराठा समुदाय को १६ प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित हो गया। दिसंबर २०१८ में इस कानून को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई क्योंकि ये सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन था, जिसके मुताबिक ५० ज्ञ् रिजर्वेशन की सीमा तोड़ी  नहीं जा सकती। 

कोर्ट में तब क्या हुआ

जून २०१९ में मराठों को आरक्षण देने वाले कानून की संवैधानिक वैधता पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने रोक लगा दी। हालांकि इसे १७ प्रतिशत से घटाकर १२ प्रतिशत करने का सुझाव दिया गया। मई २०२१ में सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार  दिया। 

जरांगे की एंट्री 

२०२३ में इसमें एक अहम पड़ाव आया। जरांगे ने २९ अगस्त २०२३ को जालना के अपने गांव में पहली बार अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की। तब से ये उनका सातवां विरोध प्रदर्शन था। जरांगे ने अनशन और गाँव-गाँव जनसभाओं के माध्यम से आंदोलन को जनता तक पहुँचाया। उन्होंने मराठा समाज के लिए ओबीसी श्रेणी में समावेश की माँग उठाई, जिससे यह मुद्दा और संवेदनशील हो गया। उनके आंदोलन ने मराठा युवाओं में नई ऊर्जा पैदा की और सरकार को बार-बार वार्ता और आश्वासन देने के लिए मजबूर किया। जरांगे की बढ़ती लोकप्रियता ने राजनीतिक दलों को सतर्क कर दिया है, क्योंकि यह आंदोलन चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। जरांगे ने २०२४ के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले कई विरोध रैलियां और भूख हड़तालें की थी। २० फरवरी २०२४ को एकनाथ शिंदे सरकार ने मराठों को ५० प्रतिशत की सीमा से उपर १० प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक विधेयक पेश किया। इस साल जनवरी में भी राज्य सरकार की ओर से भाजपा विधायक के हस्तक्षेप के बाद जरांगे ने छठे दिन भूख हड़ताल समाप्त कर दी। मराठा आरक्षण आंदोलन को लेकर मनोज जरांगे पाटिल सड़कों पर उतरे तो लेकिन उसमें उन्हें सिर्फ विपक्षी पार्टी के नेताओं का मिला। आम जनता को इस बात का पता है कि देवेंद्र फडणवीस की सरकार पहले से ही आरक्षण दे रही है। २०२४ की बात है। फडणवीस ने १० फीसदी मराठा आरक्षण का बिल पास करवाया था। सुप्रीम कोर्ट में ये चैलेंज भी हो चुका है। जरांगे की मुख्य मांग ओबीसी कैटेगरी के तहत कुनबी स्टेटस थी। इससे मराठाओं को ओबीसी कोटा यानी २७ फीसदी में शामिल किया जा सकता है, जो ज्यादा फायदेमंद हैं। फडणवीस ने जरांगे को राजनीतिक बताते हुए उनकी आलोचना की थी। लेकिन इस बार कैबिनेट सब कमेटी ने इन मांगों को मान लिया। 

विपक्ष को मिला मुद्दा 

महाराष्ट्र में बीएमसी के चुनाव होने हैं और उससे पहले अभी कोई मुद्दा हाल फिलहाल नजर नहीं आ रहा। महाराष्ट्र में तमाम हिंदुओं ने विधानसभा चुनाव में साबित कर दिया था। जो मौलाना ये चाहते थे कि जहां जहां बीजेपी का कैंडिडेट खड़ा हो वहां हराया जाए, उन सब को जवाब दिया। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में महायुति को जो प्रचंड बहुमत मिला। उद्धव ठाकरे को निराशा हाथ लगी। वो बताने के लिए काफी था कि महाराष्ट्र की जनता किसके साथ है। विपक्षी दलों की नेताओं की टेंशन बढ़ गई। बाला साहेब के सिद्धांतों को लेकर कहीं न कहीं मौजूदा सरकार आगे बढ़ती हुई नजर आ रही है। महाराष्ट्र कई चीजों में आगे बढ़ता नजर आ रहा है। शायद यही वजह है कि विपक्षी दल को लगा कि चाहे लोकल लेवल के मुद्दे हो या बड़े स्तर के मसले हो, कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे सरकार को घेरा जा सके। 

मराठी बनाम हिंदी बनाने की कोशिश 

कुछ दिन पहले मराठी बनाम हिंदी देखा गया। इसे जबरदस्त तरीके से मुद्दा बनाया गया। लेकिन उस मुद्दे को बहुत ही होशियारी के साथ देवेंद्र फडणवीस सरकार ने हैंडल कर लिया। उस मुद्दे को ज्यादा हाइप नहीं मिल पाया। जिस फैसले पर तंज कसा जा रहा था और मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही थी। उस फैसले वâो वापस लेते हुए फडणवीस सरकार ने मास्टर स्ट्रोक खेल दिया। विपक्षी दलों के सारे मुद्दे धराशायी हो गए। फिर मैदान में जरांगे की एंट्री होती है। वो ये बताने की कोशिश में हैं कि मराठाओं की लड़ाई वही लड़ रहे हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि लड़ लड़ाकर २०२४ में खुद फडणवीस सरकार ने १० प्रतिशत आरक्षण का बिल पास कराया था।

वर्तमान परिदृश्य

शिक्षा और नौकरी: मराठा युवा चाहते हैं कि उन्हें ओबीसी की तरह आरक्षण का लाभ मिले ताकि प्रतियोगिता में उनका प्रतिनिधित्व बढ़े। 

निजी क्षेत्र: उद्योग और निजी कंपनियों में भी स्थानीय मराठी युवाओं को प्राथमिकता देने की माँग लगातार होती रही है।

कानूनी अड़चनें: सुप्रीम कोर्ट ने २०२१ में मराठा आरक्षण को रद्द कर दिया था, यह कहते हुए कि ५०ज्ञ् आरक्षण की सीमा पार नहीं की जा सकती। इस वजह से राजनीतिक दलों के लिए आरक्षण का स्थायी हल निकालना आसान नहीं है।

राजनीतिक समीकरण

ङ  बीजेपी

बीजेपी का सबसे बड़ा डर यह है कि मराठा आरक्षण अगर ओबीसी कोटे से दिया गया तो उसका मजबूत ओबीसी वोटबैंक नाराज़ हो जाएगा। इसलिए पार्टी समिति और उपवर्ग बनाने जैसे कानूनी रास्ते सुझाती है, ताकि मराठा भी संतुष्ट रहें और ओबीसी भी न बिखरें। सत्ता में रहते हुए बार-बार घोषणाएँ और अध्यादेश लाकर समय खरीदने की रणनीति अपनाई जाती है।

Ncp (अजित पवार गुट)

सत्ता का हिस्सा होने के कारण अजित पवार ने सरकार के साथ खड़े होकर आरक्षण का समर्थन किया। लेकिन वे भी बीजेपी लाइन पर चल रहे हैं—यानी कानूनी सीमा का हवाला देकर समाधान खोजने की कोशिश। उनकी छवि ‘मराठा समाज को न्याय दिलाने वाले’ नेता की बजाय ‘सत्ता संतुलन साधने वाले’ नेता की है।

NCP (शरद पवार गुट)

शरद पवार लंबे समय से मराठा राजनीति का चेहरा रहे हैं। विपक्ष में रहकर वे सरकार को घेरते हैं कि मराठा समाज को सिर्फ़ बहलाया जा रहा है। जरांगे आंदोलन को नैतिक समर्थन देकर वे अपने पुराने वोटबैंक को फिर से मजबूत करना चाहते हैं।

ङ शिवसेना (शिंदे और ठाकरे गुट)

दोनों गुट मराठा अस्मिता के सवाल पर एकजुट दिखते हैं। शिंदे गुट (सत्ता पक्ष) खुद को ‘मराठा हितैषी’ दिखाने की कोशिश करता है। ठाकरे गुट विपक्ष में रहकर सरकार पर हमला करता है कि ‘जरांगे के साथ धोखा हो रहा है’।

मराठा बनाम ओबीसी समीकरण

यह पूरा विवाद इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि मराठा समाज आरक्षण चाहता है, लेकिन ओबीसी समाज अपने हिस्से में किसी भी तरह की कटौती स्वीकार नहीं करेगा। अगर मराठा समाज नाराज़ हुआ तो ग्रामीण महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की पकड़ ढीली हो सकती है। अगर ओबीसी समाज नाराज़ हुआ तो शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की सबसे मज़बूत रीढ़ टूट सकती है।

सामाजिक और आर्थिक असर

आंदोलन ने ग्रामीण युवाओं को जोड़ा है, जिससे शिक्षा और रोजगार की माँग और तेज़ हो गई है। औद्योगिक निवेशक कभी-कभी आशंकित रहते हैं कि स्थानीय बनाम बाहरी विवाद उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। इससे यह मुद्दा सिर्फ़ सामाजिक न्याय का नहीं, बल्कि आर्थिक विकास बनाम क्षेत्रीय राजनीति का भी बन जाता है। मराठा आरक्षण का सवाल महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा इश्यू बन चुका है। मनोज जरांगे ने इसे आंदोलन से उठाकर सत्ता के गलियारों तक पहुँचा दिया। बीजेपी, र्‍ण्झ् और शिवसेना सभी इसे अपने-अपने ढंग से साधने की कोशिश में हैं। लेकिन असली चुनौती है — मराठा समाज को न्याय दिलाते हुए ओबीसी वर्ग को नाराज़ न करना और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी सीमा का समाधान खोजना। यह तय है कि जब तक इस मसले का ठोस हल नहीं निकलता, तब तक महाराष्ट्र की राजनीति और चुनावी समीकरण इसी के इर्द-गिर्द घूमते रहेंगे।                        -सीमा सिंह

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *