बाप्पा की ‘सम्मानपूर्वक विदाई’

गणेशोत्सव महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व भक्तिभाव, संगीत, रंग-रंगीलापन और सामाजिक उत्साह से ओतप्रोत होता है। जब-जब बाप्पा हमारे द्वार आते हैं, घर-घर की रौनक बढ़ जाती है। परिवार और समाज एक साथ मिलकर आराधना करते हैं, भक्ति-संकीर्तन गूंजता है और चौक-चौराहों पर गूंजता नारा – ‘गणपति बाप्पा मोरया!’ सबको जोड़ देता है। लेकिन हर वर्ष की तरह आज भी एक क्षण आता है, जब हमें बाप्पा से विदा लेनी होती है। विसर्जन का यह दिन भावनात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक ओर आस्था और उत्सव का समापन है, तो दूसरी ओर ‘अगले वर्ष पुनः आगमन’ की आशा। यही द्वंद्व हमें इस पर्व की गहराई समझाता है कि जीवन क्षणभंगुर है – हर आरंभ का एक अंत होता है और हर अंत के बाद एक नई शुरुआत।
विसर्जन केवल धार्मिक कर्मकांड भर नहीं है। यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का भी अवसर है। मूर्तियों का समुद्र, नदियों और तालाबों में विसर्जन जहां आस्था का प्रतीक है, वहीं पर्यावरणीय संकट का कारण भी बन सकता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस, रसायनयुक्त रंग और प्लास्टिक सजावट जलचर जीवन और जल की शुद्धता पर गहरा असर डालते हैं। आज आवश्यकता है कि हम बाप्पा के स्वरूप को मिट्टी, शाडू माती या अन्य पर्यावरण मित्र माध्यमों से गढ़ें। साथ ही, कृत्रिम विसर्जन कुंडों का उपयोग करके प्रकृति की रक्षा करें। विसर्जन के क्षण में ही हमारी संवेदनशीलता और अनुशासन का परिचय मिलता है। आस्था तभी सार्थक है जब उसमें प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी झलके।
गणपति विसर्जन का दृश्य जितना भावुक और भव्य होता है, उतना ही चिंताजनक तब हो जाता है जब भक्त मूर्तियों को बिना सोच-समझे पानी में फेंक देते हैं। अनेक स्थानों पर यह देखा गया है कि मूर्तियों को उठाकर सीधे नदी या तालाब में पटक दिया जाता है। यह न केवल आस्था का अपमान है, बल्कि पर्यावरण और संस्कृति दोनों के लिए हानिकारक है। विसर्जन का अर्थ है ‘सम्मानपूर्वक विदाई’। इसका तात्पर्य यह नहीं कि मूर्ति को पानी में फेंक दिया जाए, बल्कि धीरे-धीरे मंत्रोच्चार के साथ, जल को प्रणाम करके, पूरी श्रद्धा से बाप्पा को विदा किया जाए।
सही विसर्जन की प्रक्रिया यह होनी चाहिए – अंतिम पूजन और आरती – बाप्पा को भोग लगाकर, हाथ जोड़कर आशीर्वाद की प्रार्थना करें। मूर्ति को दोनों हाथों से पकड़कर धीरे-धीरे जल में प्रवाहित करें। प्राकृतिक जलस्रोत के बजाय कृत्रिम विसर्जन कुंडों का उपयोग करें। कचरा अलग करें, मूर्ति से जुड़ी प्लास्टिक, थर्माकोल और सजावट जल में न डालें। इन्हें अलग से एकत्रित कर निस्तारित करें। यह न केवल धार्मिक परंपरा का पालन है, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी भी है।
गणेशोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह समाज को एक सूत्र में पिरोता है। बाल गंगाधर तिलक ने जब स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा शुरू की थी, तब उसका उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक चेतना जगाना था। आज भी यह पर्व समाज को एक मंच देता है, जहां जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर लोग एक साथ आते हैं। विसर्जन की शोभायात्रा इस एकता का विराट दृश्य प्रस्तुत करती है। गणपति को विघ्नहर्ता कहा जाता है। बाप्पा की विदाई केवल मूर्ति का विसर्जन नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। हमें सोचना होगा कि हमने दस दिनों की आराधना से क्या सीखा। क्या हमने अपनी कमजोरियों, अहंकार, और कटुता का विसर्जन किया? क्या हमने अपने जीवन में विवेक, ज्ञान और सद्भाव को स्थान दिया? यदि नहीं, तो विसर्जन अधूरा है।
गणेशोत्सव महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कारीगरों, मूर्तिकारों, सजावट के व्यवसायों, संगीत वादन से जुड़े कलाकारों और छोटे व्यापारियों के लिए यह पर्व जीवनयापन का साधन भी है। विसर्जन का दिन इस बात का प्रतीक है कि परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी समाज का सहारा है। गणपति विसर्जन का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह विदाई निराशा नहीं, बल्कि आशा का संदेश देती है। जब हम कहते हैं –‘गणपति बाप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या!’ तो यह हमारी सामूहिक आस्था और आशावाद का प्रतीक है।
यही भाव समाज को जीवंत रखता है। गणेशोत्सव का समापन हमें यह याद दिलाता है कि आस्था के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। बाप्पा की विदाई हमें सिखाती है कि जीवन में हर क्षण का महत्व है, हर अवसर पर कर्तव्य निभाना है और हर अंत एक नई शुरुआत की राह खोलता है। आज जब हम बाप्पा को विदा कर रहे हैं, तो आइए यह संकल्प लें कि उनकी शिक्षा को जीवन में उतारेंगे – ‘ज्ञान से विवेक, आस्था से अनुशासन और भक्ति से समाजहित।’ गणपति बाप्पा मोरया! पुढच्या वर्षी लवकर या

– मंगला नटराजन

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