हिंदी मासिक पत्रिका

जमी हुई झील

पार्टी देर रात तक चली, शायद ढाई बज गए होंगे। बस, कुछ गिने-चुने घंटे बचे होंगे सुबह होने में। मैंने मनसा के स्टूडियो में पडे दीवान पर बस कमर सीधी भर की होगी कि भिनसारे की रोशनी चमकने लगी। कैट भी चाय पीती दिखाई दी और कुछ देर बाद ही हम चल दिये। मनसा ने इस बार फिर बस तक छो़ड। बस में च़ढकर वह मेरे पास आया और फुसफुसा कर बोला,’माफ करना दोस्त। तुम दोनों को अलग कमरा नहीं दे पाया। मेहमान कुछ ज्यादा ही रुक गए थे।’ ‘नहीं यार, ‘ मैंने कहा, ‘अलग कमरे की कोई जरूरत ही नहीं थी। ‘

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