हिंदी मासिक पत्रिका

ऑनलाइन बाबाजी (व्यंग्य कहानी)

शहर में अचानक एक नए संत का नाम गूँजने लगा — ‘ऑनलाइन बाबाजी’।
उनका न तो कोई आश्रम था, न ही मठ। उनका पूरा साम्राज्य बस एक मोबाइल ऐप और यूट्यूब चैनल पर टिका था।
लोग कहते,
‘जिनके पास वाई-फ़ाई है, उनके पास बाबाजी हैं।’
बाबाजी की विशेषता यह थी कि वह किसी को सीधे आशीर्वाद नहीं देते। आशीर्वाद लेने के लिए आपको उनके ऐप में लॉग-इन करना पड़ता और ‘सुपरभक्ति पैक’ खरीदना पड़ता।
गाँव-शहर में लोग लाइन में लगने की बजाय स्क्रीन के सामने बैठ जाते।
कोई बीमार पड़ता तो बाबाजी ऑनलाइन आशीर्वाद भेजते — ‘हे राम! तुम्हारे वायरस का नाश हो।’
कोई बेरोज़गार होता तो बाबाजी सलाह देते — ‘अपना रिज़्यूमे पीडीएफ में कन्वर्ट कर दो, किस्मत चमक जाएगी।’
किसी लड़की की शादी न हो रही हो तो कहते — ‘डेटिंग ऐप पर सच्चा वर ढूँढो, वहीं भाग्य लिखा है।’
भक्तों को लगता कि बाबाजी हर सवाल का जवाब जानते हैं।
एक दिन बाबाजी ने ऑनलाइन महायज्ञ रखा। ज़ूम पर हज़ारों लोग जुड़ गए।
बाबाजी चमचमाते कुर्सी पर बैठे थे, पीछे वर्चुअल बैकग्राउंड में कैलाश पर्वत झलक रहा था।
बाबाजी बोले —
‘हे भक्तों! युग बदल गया है। अब भक्ति भी डिजिटली होगी। दान पेटी का झंझट भूल जाओ। मेरे ऐप पर ‘दान बटन’ दबाओ, पुण्य सीधे तुम्हारे ई-वॉलेट में पहुँचेगा।’
एक भक्त ने डरते-डरते पूछा —
‘बाबाजी, अगर नेटवर्क चला गया तो?’
बाबाजी मुस्कुराए —
‘तो समझो ईश्वर ने तुम्हारा कनेक्शन काट दिया।’
सभी भक्त ठहाका लगाने लगे।
राजनीतिज्ञ भी बाबाजी की लोकप्रियता देखकर चौंक गए।
स्थानीय मंत्री बाबाजी के पास पहुँचे और बोले —
‘गुरुदेव! आपके भक्त वोटरों से ज्यादा हैं। कृपा करके चुनाव से पहले हमें आशीर्वाद दीजिए।’
बाबाजी ने तुरंत लाइव किया —
‘हे भक्तों! मंत्री जी हमारे सच्चे शिष्य हैं। इनके लिए अंगूठा दबाकर वोट देना।’
लोग मंत्रमुग्ध होकर मोबाइल पर ‘👍’ भेजने लगे। मंत्री को लगा कि यह सब वोटों में बदल जाएगा।
लेकिन समय का खेल अजीब होता है।
एक दिन बाबाजी का मोबाइल हैक हो गया।
हैकर ने सारे ‘आशीर्वाद वीडियो’ और ‘भक्ति पैक’ के पैसे के बिल इंटरनेट पर डाल दिए।
सच्चाई सामने आई —
बाबाजी ने करोड़ों रुपये भक्तों से ऐप्प के जरिए वसूले थे।
आशीर्वाद देने के लिए वह पहले से रिकॉर्ड किया हुआ वीडियो चलाते थे।
उनके ‘चमत्कार’ असल में बस गूगल सर्च से उठाए गए थे।
भक्त हतप्रभ रह गए।
एक बूढ़ी औरत बोली —
‘अरे! मैंने सोचा था बाबाजी सचमुच मेरे बेटे को नौकरी दिलाएँगे, पर ये तो मेरे पेंशन वाले पैसे भी खा गए।’
गाँव का मास्टरजी ठहाका लगाकर बोला —
‘भक्ति का नेटवर्क अगर मोबाइल कंपनी पर टिका हो तो विश्वास करना मूर्खता है। असली भगवान ऑफलाइन ही मिलते हैं।’
धीरे-धीरे लोग बाबाजी को भूल गए। पर सोशल मीडिया पर अब भी उनके पुराने वीडियो घूमते रहते हैं, और नए भोले लोग उन पर लाइक और कमेंट करते रहते हैं।
‘ऑनलाइन बाबाजी’ की कहानी यह बताती है कि आजकल भक्ति और विश्वास भी मार्केटिंग और नेटवर्क स्पीड पर टिका हुआ है।
भक्त सोचते हैं कि वह भगवान से जुड़े हैं, पर असल में जुड़ते हैं सिर्फ़ किसी के बैंक खाते से।

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